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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (11)

...इससे यह सिद्ध हुआ कि 'दिवु' धातु के जो दश अर्थ हैं वे व्यवहार और परमार्थ इन दोनों अर्थों में यथावत् घटते हैं, क्योंकि इनके दोनों अर्थों की योजना वेदों में अच्छी प्रकार से की है | इनमें इतना भेद है कि पूर्वोक्त वसु आदि देवता परमेश्वर के ही प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, और परमेश्वर देव तो अपने ही प्रकाश से सदा प्रकाशित हो रहा है | इससे वही सब का पूज्यदेव है | और दिवु धातु के दश अर्थ ये हैं कि - एक क्रीड़ा जो खेलना, दूसरा विजिगीषा जो शत्रुओं को जीतने की इच्छा होना, तीसरा व्यवहार जो कि दो प्रकार का है एक बाहर और दूसरा भीतर का, चौथा निद्रा और पांचवां मद | ये पांच अर्थ मुख्य करके व्यवहार में ही घटते हैं, क्योंकि अग्नि आदि ही पदार्थ व्यवहारसिद्धि के हेतु हैं | परन्तु परमेश्वर का त्याग इसमें भी सर्वथा नहीं होता, क्योंकि वे देव उसी की व्यापकत्ता और रचना से दिव्य गुण वाले हुए हैं | तथा द्युति जो प्रकाश करना, स्तुति जो गुणों का कीर्तन करना, मोद प्रसन्नता, कान्ति जो शोभा, गति जो ज्ञान गमन और प्राप्ति है, ये पांच अर्थ परमेश्वर में मुख्य करके वर्त्तते हैं | क्योंकि इन‌से भिन्न अर्थों में जितने जितने जिन जिन में गुण है उतना उतना ही उनमें देवतापन लिया जाता है | परमेश्वर में तो सर्वशक्‍तिमत्त्वादि सब गुण अनन्त हैं, इससे पूज्यदेव एक वही है |

(अब गतांक से आगे)

प्र. - इस विषय में कोई कोई मनुष्य ऐसा कहते हैं कि वेदों में प्रतिपादन से एक ईश्‍वर की पूजा सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि उनमें जड़ और चेतन की पूजा लिखी है | इससे वेदों में संदेह सहित कथन मालुम पड़ता है |

उ. - ऐसा भ्रम मत करो क्योंकि ईश्‍वर ने सब पदार्थों के बीच में स्वतन्त्र गुण रक्खे हैं जैसे उसने आंख में देखने का सामर्थ्य रक्खा है तो उससे दीखता है, यह लोक में व्यवहार है | इसमें कोई पुरुष ऐसा कहे कि ईश्‍वर नेत्र और सूर्य के बिना रूप को क्यों नहीं दिखलाता है, जैसे यह शङ्का उसकी व्यर्थ है, वैसे ही पूजा-विषय में भी जानना | क्योंकि जो दूसरे का सत्कार, प्रियाचरण अर्थात् उसके अनुकूल काम करना है, इसी का नाम पूजा है सो सब मनुष्यों को करनी उचित है | इसी प्रकार अग्नि आदि पदार्थों में जितना जितना अर्थ का प्रकाश, दिव्यगुण, क्रियासिद्धि और उपकार लेने का सम्भव है , उतना उतना उन में देवपन मानने से कुछ भी हानि नहीं हो सकती | क्योंकि वेदों में जहां जहां उपासनाव्यवहार लिया जाता है, वहं वहां एक अद्वितीय परमेश्वर का ही ग्रहण किया है |

(तत्रापि ..)
भाषार्थ - इस देवता विषय में दो प्रकार का भेद है | एक मूर्त्तिमान और दूसरा अमूर्त्तिमान् | जैसे माता, पिता, आचार्य, अतिथी ये चार तो मूर्त्तिमान् देवता हैं और पांचवां परब्रह्म अमूर्त्तिमान् है, अर्थात् उसकी किसी प्रकार की मूर्त्ति नहीं है | इस प्रकार से पांच देव की पूजा में यह दो प्रकार का भेद जानना उचित है |

(तथैव ..)
भाषार्थ - इसी प्रकार पूर्वोक्त आठ वसुओं में से अग्नि, पृथिवी, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र ये पांच मूर्त्तिमान् देव हैं | और ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, मन, अन्तरिक्ष, वायु, द्यौ और मन्त्र, ये मूर्त्तिरहित देव हैं | तथा पांच ज्ञानेन्द्रिया, बिजुली और विधियज्ञ ये सब देव मूर्त्तिमान् और अमूर्त्तिमान् भी हैं |* इससे साकार और निराकार भेद से दो प्रकार की व्यवस्था देवताओं में जाननी चाहिये | इनमें से पृथिवी आदि का देवपन केवल व्यवहार में, तथा माता, पिता, आचार्य और अतिथियों का व्यवहार में उपयोग और परमार्थ का प्रकाश करनामात्र ही देवपन है और ऐसे ही मन और इन्द्रियों का उपयोग व्यवहार और परमार्थ करने में होता है | परन्तु सब मनुष्यों को उपासना करने योग्य एक परमेश्वर ही देव है |

प्र. - कितने ही आजकल के आर्य्य और यूरोपदेशवासी अर्थात् अंगरेज आदि लोग इस में ऐसी शंका करते हैं कि वेदों में पृथिव्यादि भूतों की पूजा कही है | वह लोग यह भी कहते हैं कि पहिले आर्य्य लोग भूतों की पूजा करते थे, फिर पूजते पूजते बहुत काल पीछे उन्होंने परमेश्वर को भी पूज्य जाना था |

उ. - यह उनका कहना मिथ्या है, क्योंकि आर्य्य लोग सृष्‍टि के आरम्भ से आज पर्यन्त इन्द्र वरुण और अग्नि आदि नामों करके वेदोक्‍त प्रमाण से एक परमेश्‍वर की ही उपासना करते चले आये हैं | इस विषय में अनेक प्रमाण हैं, उनमें से थोड़े से यहां भी लिखते हैं -

..भाषार्थ - (इन्द्रं मित्रम्.) इसमें चारों वेद, शतपथ आदि चारों ब्राह्मण, निरुक्‍त और छः शास्त्र आदि के अनेक प्रमाण हैं कि जिस सद्वस्तु ब्रह्म के इन्द्र, ईशान, अग्नि आदि वेदोक्‍त नाम हैं और 'अणोरणीयान्' इत्यादि उपनिषदों के विशेषणों से जिसका प्रतिपादन किया है , उसी की उपासना आर्य्य लोग सदा से करते आये हैं | इन मन्त्रों में से जिनका अर्थ भूमिका में नहीं किया है, उनका आगे वेदभाष्य में किया जायेगा | और कोई कोई आर्य्य लोग किंवा यूरोप आदि देशों में रहने वाले अंगरेज कहते हैं कि प्राचीन आर्य्य लोग अनेक देवताओं और भूतों की पूजा करते थे, यह उनका कहना व्यर्थ है, क्योंकि वेदों और उनके प्राचीन व्याख्यानों में अग्नि आदि नामों से उपासना के लिये एक परमेश्वर का ही ग्रहण किया है, जिसकी उपासना आर्य्य लोग करते थे | इससे पूर्वोक्‍त शंका किसी प्रकार से नहीं आ सकती |
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* इन्द्रियों की शक्‍तिरूपद्रव्य अमूर्त्तिमान् ओर गोलक मूर्त्तिमान् तथा विद्युत् और विधियज्ञ में जो जो शब्द तथा ज्ञान अमूर्त्तिमान् और दर्शन तथा सामग्री मूर्त्तिमान् जानना चाहिये |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)