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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (50|51)

***ओउम्***

प्रार्थना विषय

मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् |
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं
मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः ||50||
ऋ. 1|8|6|7||

मा नस्तो के तनये मा न आयौ
मा नो गोषु मा नो अश्‍वेषु रीरिषः |
वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधी-
र्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ||51||‌
ऋ. 1|8|6|8||

व्याख्यान - हे "रुद्र" दुष्‍टविनाशकेश्‍वर‌ ! आप हम पर कृपा करो | "मा, नो, व." हमारे ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध पिता इनको आप नष्ट मत करो | तथा "मा नो अर्भकम्" छोटे बालक और "उक्षन्तम्" वीर्यसेवनसमर्थ जवान तथा जो गर्भ में वीर्य को सेवन किया है , उसको मत विनष्‍ट करो | तथा हमारे पिता, माता, और प्रिय तनुओं (शरीरों) का "मा रीरिषः" हिंसन मत करो | "मा, नः, तोके" कनिष्‍ठ, मध्यम और ज्येष्‍ठ पुत्र, "आयौ" उमर "गोषु" गाय आदि पशु "अश्‍वेषु" घोड़ा आदि उत्तम यान हमारी सेना के शूरों में "हविष्मन्तः" यज्ञ के करने वाले इनमें "भामितः" क्रोधित और "मा रीरिषः" रोषयुक्त होके कभी प्रवृत मत हो | हम लोग आपको "सदमित्त्वा, हवामहे" सर्वदैव आह्वान करते हैं ! हे भगवन् रुद्र परमात्मन् ! आपसे यही प्रार्थना है कि हमारी और हमारे पुत्र धनैश्‍वर्यादि की रक्षा करो ||50||51||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'