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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - द्वितीय वल्ली (1)

अन्यच्छ्र योSन्यदुतैव प्रेय-
स्ते उभे नानार्थे पुरुषं. सिनीतः |
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति
हीयतेSर्थांद्य उ प्रेयो वृणीते ||1||

अर्थ -

(श्रेयः) मोक्ष मार्ग (अन्यत्) और हैं (उत) और (प्रेयः) लोकोन्नति का मार्ग (अन्यत्, एव) और ही है (ते) वे (उभे) दोनों (नानार्थे) भिन्न-भिन्न अर्थ में (पुरुषम्) मनुष्य को (सिनीतः) बाँधते हैं (तयोः) उन दोनों में से (श्रेयः) श्रेय (आददानस्य) ग्रहण करनेवाले का (साधु) कल्याण (भवति) होता है (यः उ) और जो (प्रेयः वृणीते) प्रेय को ग्रहण करता है वह (अर्थात्) उद्देश्य से (हीयते) गिर जाता है ||1||

व्याख्या - प्रवृति (प्रेय) और निवृति (श्रेय) अर्थात् लोक और परलोकोन्नति, ये दो मार्ग में प्रेय को इस प्रकार व्यतीत करना चाहिये जिससे वह श्रेय का साधन बन जाय | इसलिये कहा गया है कि उद्देश्य तो श्रेय बनाना चाहिए परन्तु जो लोग विषय-भोग की द्दृष्टि से केवल लोकोन्नति को अपना लक्ष्य (ध्येय) बना लेते हैं और श्रेय की चिन्ता नहीं करते वे दुखों की अत्यन्त निवृति रूप असली ध्येय से गिर जाते हैं |

उदाहरण - इस सम्बन्ध में नारद की एक बड़ी शिक्षाप्रद आख्यायिका प्रसिद्ध है | नारद की युवावस्था ही थी जब वह श्रीकृष्ण के पास आत्मज्ञान प्राप्त करने आया | कृष्ण जी ने उसे अनधिकारी समझकर उपदेश नहीं दिया, परन्तु नारद उनके सिर रहा | एक दिन कृष्ण और नारद सैर करने चल दिये रास्ते से कुछ ही दूरी पर एक गाँव दिखाई दिया | कृष्ण को प्यास लगी | नारद गाँव से पानी लेने गया | कुएँ पर एक सुन्दर युवति जल भर रही थी | नारद को उसने पानी दिया परन्तु नारद उसके रूप पर इतना मोहित हुआ कि युवति के पीछे पीछे उसके घर चला गया और वह अविवाहित थी इसलिए उसके पिता से विनय की कि उसका विवाह उससे कर दिया जावे | विवाह के बाद गृहस्थी बनकर नारद वहीं रहने लगा | उनके क्रमशः तीन पुत्र हुए | पिता मर चुका था | कुछ समय बाद ग्राम में बाढ़ आई और नारद ने अपनी स्त्री और तीनों बच्चों को लेकर ग्राम के चारों ओर भरे पानी में प्राण-रक्षार्थ निकलने का यत्न किया परन्तु पानी वेग से बढ़‌ता ही जाता था इसलिए सावधानी करने पर भी एक एक करके तीनों पुत्र और स्त्री पानी में बह गये | कठिनता से नारद अपने प्राण बचाकर वहाँ पहुँचने पर उसको स्मरण आया कि वह अपने उद्देश्य से पतित होकर किस जगङ्वाल में फँस गया था |

श्रेयश्‍च‌ प्रेयश्‍च‌ मनुष्यमेत-
स्तौ सम्परीत्य विविनक्‍ति धीरः |
श्रेयो हि धीरोSभि प्रेयसोवृणीते,
प्रेयो मंद योगक्षेमग्द् वृणीते ||2||
स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्‍च‌ कामा-
नभिध्यायन्नचिकेतोSत्यस्त्राक्षीः
नैतां.सृङ्काँ वित्तमयीमवाप्‍तो,
यास्याम्मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ||3||

अर्थ - (श्रेयः) श्रेय (च) और (प्रेयः) प्रेय (मनुष्यम्) मनुष्य को (एतः) प्राप्त होते हैं (धीरः) बुद्धिमान् (तौ) उन दोनों को (सम्परीत्य) प्राप्‍त‌ होकर (विविनक्‍ति) विचार करता है (धीरः) विद्वान् (हि) निश्च‌य (प्रेयसः) प्रवृ त्ति मार्ग से (श्रेयः) निवृत्ति मार्ग को (अभिवृणीते) स्वीकार करता है (मन्दः) मूर्ख (योगक्षेमात्) सांसारिक सुखों से प्राप्त करने और उनको रक्षित रखने के विचार से (प्रेयः) प्रवृत्ति मार्ग को (वृणीते) ग्रहण करता है ||2||

(नचिकेतः) हे नचिकेता ! (सः) जो (त्वम्) तूने (प्रियान्) पुत्रादि, (प्रियरूपान्) सुन्दर स्त्री आदि (कामान्) भोगों को (अभिध्यायन्) निस्सार समझते हुए (अत्यस्त्राक्षीः) छोड़ दिया (एताम्) इस (भोग की)(सुङ्काम्) श्रंखला में (न, अवाप्तः) नहीं फंसा (यस्याम्) जिसमें (बहव) बहुत (मनुष्याः) मनुष्य (मज्जन्ति) फंस जाते हैं ||3||

व्याख्या - यम नचिकेता से कहता है कि धीर पुरुष श्रेय कौ और मन्द अज्ञानी पुरुष सांसारिक सुख की द्दृष्‍टि से केवल प्रेय को अपना ध्येय बनाते हैं परन्तु तूनें विषयभोग की निस्सारता पर विचार करके उन्हे छोड़ दिया जिनमें बहुत लोग फंस जाया करते हैं |

(क्रमशः)