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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'उपासना विषयः' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से (1)

यह ईश्वर की उपासना का विषय जैसा वेदों में लिखा है उसमें से कुछ संक्षेप से यहां भी लिखा जाता है | - (युञ्जते मन.) इसका अभिप्राय यह है कि जीव को परमेश्वर की उपासना नित्य करनी उचित है अर्थात् उपासना समय में सब मनुष्य अपने मन को उसी में स्थिर करें |

और जो लोग ईश्वर के उपासक (विप्राः) अर्थात् बड़े बड़े बुद्धिमान् (होत्राः) उपासनायोग के ग्रहण करनेवाले हैं वे (विप्रस्य) सबको जाननेवाला (वृहतः) सबसे बड़ा (विपिश्चितः) और सब विद्याओं से युक्त जो परमेश्वर है , उसके बीच में (मनः युञ्जते) अपने मन को ठीक ठीक युक्त करते हैं तथा (उत) (धियः) अपनी बुद्धिवृत्ति अर्थात ज्ञान को भी (युञ्जते.) सदा परमेश्वर ही में स्थिर करते हैं जो परमेश्वर इस सब जगत् को (विदधे) धारण और विधान करता है (वयुनाविदेक इत्) जो सब जीवों के ज्ञानों तथा प्रजा का भी साक्षी है, वही एक परमात्मा सर्वत्र व्यापक है कि जिससे परे कोई उत्तम पदार्थ नहीं है | (देवस्य) उस देव अर्थात् सब जगत् के प्रकाश और (सवितुः) सबकी रचना करनेवाले परमेश्वर की (परिष्टुतिः) हम लोग सब प्रकार से स्तुति करें | कैसी वह स्तुति है कि (मही) सबसे बड़ी अर्थात् जिसके समान किसी दूसरे की हो ही नहीं सकती ||1||

(युञ्जानः.) योग को करने वाले मनुष्य (तत्त्वाय) तत्त्व अर्थात् ब्रह्मज्ञान के लिये, (प्रथमं) (मनः) जब अपने मन को पहिले परमेश्वर में युक्त करते हैं, तब (सविता) परमेश्वर उनकी (धियम) बुद्धि को अपनी कृपा से अपने में युक्त कर लेता है | (अग्नेर्ज्यो.) फिर वे परमेश्वर के प्रकाश को निश्चय करके (अध्याभरत्) यथावत् धारण करते हैं | (पृथिव्याः) पृथिवी के बीच में योगी का यही प्रसिद्ध लक्षण है ||2||

सब मनुष्य इस प्रकार की इच्छा करें कि (वयम्) हम लोग (स्वर्ग्याय) मोक्षसुख के लिये, (शक्तधा) यथायोग्य सामर्थ्य के बल से (देवस्य) परमेश्वर की सृष्टि में उपासनायोग करके , अपने आत्मा को शुद्ध करें कि जिससे (युक्तेन मनसा) अपने शुद्ध मन से परमेश्वर के प्रकाशरूप आनन्द को प्राप्त हों ||3||

इसी प्रकार वह परमेश्वर देव भी (देवान्) उपासकों को (स्वर्यतो धिया दिवम्) अत्यन्त सुख को देके (सविता) उनकी बुद्धि के साथ अपने आनन्दस्वरूप प्रकाश को करता है तथा (युक्त्वाय) वही अन्तर्यामी परमात्मा अपनी कृपा से उनको युक्त करके उनके आत्माओं में (बृहज्ज्योतिः) बड़े प्रकाश को प्रकट करता है | और (सविता) जो सब जगत् का पिता है वही (प्रसुवा.) उन उपासकों को ज्ञान और आनन्दादि से परिपूर्ण कर देता है परन्तु (करिष्यतः) जो मनुष्य सत्य प्रेम भक्ति से परमेश्वर की उपासना करेंगे, उन्हीं उपासकों को परमकृपामय अन्तर्यामी परमेश्वर मोक्षसुख देके सदा के लिये आनन्दयुक्त कर देगा ||4||

उपासना का उपदेश देनेवाले और ग्रहण करनेवाले दोनों के प्रति परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि जब तुम (पूर्व्यम्) सनातन ब्रह्म की (नमोभिः) सत्यप्रेमभाव से अपने आत्मा को स्थिर करके नमस्कारादि रीति से उपासना करोगे तब मै तुमको आशीर्वाद देऊंगा कि (श्लोकः) सत्यकीर्ति (वां) तुम दोनों को (एतु) प्राप्त हो | किसके समान ? (पथ्येव सूरेः) जैसे परम विद्वान को धर्ममार्ग यथावत् प्राप्त होता है , इसी प्रकार तुमको सत्यसेवा से सत्यकीर्ति प्राप्त हो | फिर भी मैं सबको उपदेश करता हूँ कि (अमृतस्य पुत्राः) हे मोक्षमार्ग के पालन करनेवाले मनुष्यो ! (शृण्वन्तु विश्वे) तुम सब लोग सुनो कि (आ ये धामानि.) जो दिव्यलोकों अर्थात् मोक्षसुखों को (आतस्थुः) पूर्व प्राप्त हो चुके हैं, उसी उपासनायोग से तुम लोग भी उन सुखों को प्राप्त हो, इसमें सन्देह मत करो | इसीलिये (युजे) मैं तुमको उपासनायोग में युक्त करता हूँ ||5||