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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (24)

आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब |
नव्यमायुः प्र सू तिर कृधि सहस्त्रसामृषिम् ||11||
ऋग्वेद 1|10|11||

पदार्थ -

हे, कौशिक..............हे सब विद्याओं के उपदेशक और उनके अर्थों के निरन्तर प्रकाश करनेवाले
इन्द्र.....................सर्वानन्दस्वरूप परमेश्‍वर !
मन्दसानः................आप उत्तम उत्तम स्तुतियों को प्राप्त हुए और सब को यथायोग्य जानते हुए
नः.......................हम लोगों के
सुतम्....................यत्‍न‌ से उत्पन्न किये हुए सोमादि रस वा प्रिय शब्दों से की हुई स्तुतियों का
आ.......................अच्छी प्रकार
पिब......................पान कराइये
तु........................और कृपा करके हमारे लिये
नव्यम्..................नवीन
आयुः.....................अर्थात् निरन्तर जीवन को
प्रसूतिर..................दीजिये, तथा
नः.......................हम लोगों में
सहस्त्रसाम्................अनेक‌ विद्याओं के प्रकट करनेवाले
ऋषिम्...................वेदवक्‍ता पुरुष को भी
कृधि..................... कीजिये ||11||

भावार्थ ‍-

जो मनुष्य अपने प्रेम से विद्या का उपदेश करनेवाले होकर जीवों के लिये सब विद्याओं का प्रकाश सर्वदा शुद्ध परमेश्‍वर की स्तुति के साथ आश्रय करते हैं, वे सुख और‌ विद्यायुक्त पूर्ण आयु तथा ऋषि भाव को प्राप्त होकर सब विद्या चाहनेवाले मनुष्यों को प्रेम के साथ उत्तम उत्तम विद्या से विद्वान करते हैं ||11||

परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वत: |
वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ||12||
ऋग्वेद 1|10|12||

पदार्थ -

हे,गिर्वणः................हे वेदों तथा विद्वानों की वाणियों से स्तुति को प्राप्त होने योग्य परमेश्‍वर !
विश्‍वतः..................इस संसार में
इमाः.....................जो वेदोक्‍त वा विद्वान पुरुषों की कही हुई
गिरः.....................स्तुति हैं, वे
परि......................सब प्रकार से सबकी स्तुतियों से सेवन करने योग्य जो आप हैं, उनको
भवन्तु...................प्रकाश करनेहारी हों, और इसी प्रकार
वृद्धयः....................वृद्धि को प्राप्त होने योग्य
जुष्‍टाः....................प्रीति की देनेवाली स्तुतियां
जुष्‍टयः...................जिनसे सेवन करते हैं, वे
वृद्धायुम्..................जो कि निरन्तर‌ सब कार्य्यों में अपनी उन्नति को आप ही बढ़ाने वाले आप का
अनुभवन्तु................अनुभव करें ||12||

भावार्थ ‍-

हे भगवन् परमेश्‍वर ! जो जो अत्युत्तम प्रशंसा है सो सो आपकी ही हैं, तथा जो जो सुख और आनन्द की वृद्धि होती है सो सो आप ही को सेवन करके विशेष वृद्धि को प्राप्त होती है | इस कारण जो मनुष्य ईश्‍वर तथा सृष्‍टि के गुणों का अनुभव करते हैं, वे ही प्रसन्न और विद्या की वृद्धि को प्राप्त होकर संसार में पूज्य होते हैं ||12||

जो लोग क्रम से विद्या आदि गुणों को ग्रहण और ईश्‍वर की प्रार्थना करके अपने उत्तम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर परमेश्‍वर की प्रशंसा और धन्यवाद करते हैं, वे ही अविद्या आदि दुष्‍ट गुणों की निवृत्ति से शत्रुओं को जीतकर तथा अधिक अवस्थावाले और विद्वान होकर सब मनुष्यों को सुख उत्पन्न करके सदा आनन्द में रहते हैं | इस अर्थ से इस दशम् सूक्त की संगति नवम सूक्त के साथ जाननी चाहिये ||12||10||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (24)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)