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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अमर शहीद धर्मवीर पण्डित लेखराम आर्य मुसाफिर जी के कुछ उद्‍गार

Dear Friends,

The 6th March is the martyrdom day of Pt Lekh Ram, the Arya Missionary, who was assassinated by a fanatic for propagating Vedic ideals. Let us pay homage to this great martyr.

संसार के नानाविध परिवर्तन, समुद्रों के ज्वारभाटे, वृक्षों का उत्पादन एवं विकास, ग्रहों-उपग्रहों की गतियां-प्रगतियां, धूमकेतु का उदय और अस्त, सूर्य और चन्द्रमा का उदय और अस्त, भूमि का परिभ्रमण, वाष्प का ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना, प्रभृति नानाविध दैवी घटनाओं को देखकर जब हम मनुष्य की अवस्था पर विचार करते हैं, तब इस बड़े संसार का यह छोटा सा नक्शा अर्थात् मनुष्य शरीर भी, अपने सम्पूर्ण तानेबाने सहित वही चित्र संसार के सम्मुख प्रस्तुत करता हुआ द्दृष्टिगोचर होता है | इसका प्रत्येक रूप दूसरे से निराला और तीसरे व चौथे से पृथक है | इसकी नस-नस और नाड़ी-नाड़ी में रक्त का प्रवाह और उसकी न्यून्ता वा अधिकता, अथवा उन्नति या अवनति का एक अद्भुत चक्र हमारे दर्शन-पथ में आता है | शरीर में मन और हृदय नामक जो दो अद्भुत उपकरण विद्यमान हैं, और जिनकी अवस्था प्रतिक्षण गिरगट के समान परिवर्तित होती रहती है, उनके विषय में निजामी ने कैसा उत्तम उल्लेख किया है, सो देखिये :-

गरविन्दः रहस्त व मन दरीं राह | गह बर सरे तख्त व गह दर चाह ||1||

गर पीर शुदम् व गर जवानम् | हम बर बर्के अव्वलीन नवरदम् ||2||

अजहाल बहाल अगर बगरदम् | हम बर बर्के अव्वलीन नवरदम् ||3||

ई मर्ग न बाग बोस्तानस्त | ई राह सराय दोस्तानस्त ||4||

गर बनिगरम् आंचुनां कि रायस्त | आं मर्ग नमर्गे नकल जायेस्त ||5||

अज खुर्द गहे बखाब गाहे | व जे खाब गहे ब बज्मे शाहे ||6||

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1. मार्ग बहुत टेढ़ा-मेढ़ा है | इस मार्ग में कभी तो ऊँचे सिंहासन पर जा बैठता हूं, और कभी गहरे कुएं में उतर जाता हूं |
2. कभी मैं बूढ़ा बन जाता हूं, और कभी जवान | मार्ग पृथक पृथक हैं; पर मैं तो वही हूं |
3. यदि मैं इस संसार को छोड़ कर, किसी दूसरे संसार में भी चला जाउं, तब भी यही प्रतीत होता है कि मानो मैं प्रथम पृष्ठ पर ही चल रहा हूं |
4. यह मृत्यु का बाग संसार के अन्य बाग-बगीचों जैसा नहीं है | यह तो मित्रों की विश्राम-शाला का मार्ग है |
5. यदि मैं उसी प्रकार से देखूं, जैसा कि कुछ विद्वानों का कथन है, तब तो यह मृत्यु, मृत्यु ही नहीं है | यह तो एक स्थान परिवर्तनमात्र ही है |
6. मैं कभी रसोई से शयनागार में जाता हूं, और कभी शयनागार से राजदरबार में जा पहुंचता हूं |
- अनुवादक |
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जब ऐसा हाल देखा, तब इच्छा हुई और मन में यह विचार समाया कि सत्य तथा असत्य का अनुसन्धान करके, सत्य को ग्रहण करना चाहिये | क्योंकि मैंने आरम्भ में फारसी-भाषा और साहित्य की शिक्षा प्राप्त की थी, इसलिये मुझे बहुत समय तक तो यही सिद्धान्त उचित प्रतीत होता रहा कि " जो कुछ मैंने जाना और पढ़ा है, वही सत्य है |"

फिर बहुत वर्षों तक विचार-विमर्श करने पर यह जाना कि इस विचार में बहुत से दोष वर्त्तमान हैं | और, वे दोष भी ऐसे-ऐसे हैं, कि उनसे बचकर चलना मनुष्य की शक्ति से बाहिर की बात है | इस प्रकार मेरा मन बहुत समय तक विभ्रम में उलझा पड़ा रहा | उन्हीं दिनों में मुझे 'मूर्त्ति पूजा' का विचार सूझा | मैं कईं वर्ष तक कृष्ण जी और महादेव जी की मूर्त्तियों की पूजा करता रहा | और उनको ही अपना स्वामी तथा उपास्य देव समझ कर, उनके साम‌ने माथा रगड़ता रहा | बीमारी के दिनों में कईं बार खानकाहों=मुसलमानों के समाधि-स्थलों में जाकर मनौतियां भी मांगनीं पड़ीं | साथ ही देवताओं से भी बारम्बार प्रार्थनायें कीं | परन्तु वहां सुनता ही कौन था ? किसी पूछने वाले के अभाव में इसलामी वजीफे रटता रहा | और, कुरान की कईं आयतों का पाठ भी किया | परन्तु मन को शन्ति की प्राप्ति कहां से होती ?

दैवयोग से उन्हीं दिनों में बाइबिल की एक प्रति भी मुझे मिल गई | मैंने उसे आरम्भ से अन्त तक पढ़ डाला | ईश्वर से प्रार्थनायें भी करता रहा, कि हे प्रभो ! जो सत्यपथ है, उस पर चलने की शक्ति मुझे प्रदान कर | परन्तु प्रमात्मा मेरा साक्षी है, उससे मुझे कुछ भी सन्तोष न हो सका | नास्तिक-पन से मेरा जी घबराता था | और नवीन वेदान्त से भी मुझे हार्दिक घृणा हो गई थी | अन्त में मेरे अनुभव में यह बात आई कि "जो खोज करता है वह प्राप्त भी कर लेता है |"

एक दिन "विद्या प्रकाशक" नामक मासिक-पत्र पढ़कर मैंने जाना कि एक महात्मा, संन्यासी स्वामी दयानन्द नामी सत्य-धर्म का उपदेश कर रहे हैं | और वे धार्मिक सिद्धान्तों को विद्या तथा बुद्धि की कसौटी पर , युक्तियों और प्रमाणों से भलीप्रकार परख करवा कर मानव जीवन में धारण करवाते हैं | इस सूचना का पढ़ना था कि मेरा मन तुरन्त ही जागृत एवं सावधान हो गया | मैंने उनकी सेवा में पत्र लिखा | और उनके सभी ग्रन्थ मंगवाये | इसके साथ मैं उस "विद्या प्रकाशक" नामक पत्र का ग्राहक भी बन गया | अस्तु, फिर क्या था ? उनके ग्रन्थों के स्वाध्याय से, और उनकी प्रबल युक्तियों से मेरे मन का अन्धकार भाग गया | और, उसके स्थान में प्रकाश आ गया | मेरे भ्रान्ति-जाल और अन्ध-विश्‍वास मिट गये | सारी घबराहट दूर हो गई | सत्य मार्ग सूझ पड़ा| उनके सभी ग्रन्थों का स्वाध्याय करके, और श्री स्वामी जी के उपदेशों को ग्रहण करके मैनें प्रसन्नता पूर्वक सच्चे ह्रदय से वैदिक धर्म को ग्रहण कर लिया |

11 अप्रैल सन् 1881 ई. है, और आज का दिन | उस के पश्चात फिर कभी भी मैं उन अन्ध-विश्वासों और मिथ्या-वादों में नहीं फंसा और न ही कभी मेरा मन सत्य की और से डांवाडोल हुआ | जून 1881 ई. में मैंने अजमेर जाकर, श्री स्वामी जी महाराज के दर्शन प्राप्त किये | एक सप्ताह तक मैं उनकी सेवा में उपस्थित रहा, और एक-एक करके मैं ने अपने सभी सन्देह दूर किये | इस के पश्चात मेरी यही कामना और यही चेष्ठा रही कि मैं यथाशक्ति सत्यधर्म का मण्डन और असत्य एवं अधर्म का खण्डन निरन्तर करता रहूँ | मेरी यही अभिलाषा है कि मैं आजीवन सत्य का ही उपदेश करूं |

पुनर्जन्म का सिद्धान्त, उन प्रसिद्ध सिद्धान्तों में से एक है, जिनके विषय में विभिन्न नवीन-मत-मतान्तरों से आर्य समाज का मतभेद वर्त्तमान है | जितनी पुस्तकें आज तक पुनर्जन्म के सिद्धान्त के खण्डन में प्रकाशित हुई हैं, मैंने यथा सम्भव वे सभी विचार पूर्वक पढ़ी हैं | विदेशी भाषा में होने के कारण जिन पुस्तकों को मैं स्वयं नहीं पढ़‌ सका, अपने सहधर्मी भाईयों की सहायता से मैंने उनका अनुवाद किया है | मैं ने देखा कि इतना जोर व शोर होने, और पुनर्जन्म के सिद्धान्त के विरुद्ध कई पुस्तकों के प्रकाशित होने पर भी कोई ऐसा अकाट्य तर्क या प्रमाण पुनर्जन्म के सिद्धान्त के खण्डन में प्रस्तुत नहीं किया गया है कि जिसका आर्य समाज की ओर से कोई उचित उत्तर ही न दिया जा सके |

हमारे हिन्दू-आर्य भाई चिरकाल तक आलस्य-निद्रा में सोये रहने के कारण अपने विरोधी और सहयोगी की पहिचान करना भी मानो भूल गये हैं | धर्म और अधर्म का विवेक भी वे छोड़ बैठे हैं | और अब वे ऐसी गई-बीती-स्थिति में जा पहुँचे हैं कि अपने पवित्र वेदों का आश्रय, उन का पठन-पाठन श्रवण-श्रावण एवं उनसे शिक्षा-ग्रहण करना भी उन्होंने सर्वथा ही छोड़ दिया है | विरोधी लोग सर्वथा निराधार तथा असभ्यतापूर्ण आक्षेप कर-करके, आर्य सन्तान को सत्पथ से पतित करते जाते हैं | आये-दिन उनके उत्पात अधिकाधिक ही बढ़ रहे हैं | परन्तु ये कुपात्रों को दान देने के अभ्यस्त लोग देखते हुए भी अपने सर्वनाश को नहीं देखते | ये सर्वदा मौन साधे बैठे हैं | और जरा भी आँखें नहीं खोलते | न ही वे अपने मन एवं मस्तिष्क से ही कुछ काम लेते हैं |

('पुनर्जन्मप्रमाण' 'पुस्तक-रचना का उद्देश्‍य', 'कुलियात आर्य मुसाफिर' से उद्‍धृत‌)