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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

त्रिकालज्ञ

ओउम् | अतो विश्‍वान्दभुता चिकित्वाँ अभि | कृतानि या च कर्त्वा ||
ऋग्वेद 1|25|11

श‌ब्दार्थ -

अतः.......................इस कारण, वह सबसे स्वीकारणीय भगवान्
विश्वानि...................सभी
अद्भुता....................अद्भुत,अभूतपूर्व पदार्थों को
चिकित्वाऩ्................जानता हुआ
कृतानि....................किये हुए पदार्थों को
च..........................और
या.........................जो
कर्त्त्वा......................किये जाते हैं उन सबको
अभिपश्यति...............सम्मुख देखता है |

व्याख्या ‍

जितनी सृष्टि है भगवान् उसे जानता है, जो उसे भी जानता था और जानता है | भावी सृष्‍टि का भी उसे ज्ञान है, इसका एक हेतु इसी मन्त्र में दिया है - विश्‍वान्दभुता चिकित्वान् वह सम्पूर्ण अद्‍भुत विलक्षण पदार्थों को जानता है अर्थात् वह सर्वज्ञ है | 'सर्व' से भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान तीनों आते हैं | ईश्वर की सृष्टि में तो कोई भूत, भविष्यत् आदि नहीं है | ईश्वर का ज्ञान सदा रहता है | ऋषि दयानन्द ने बहुत सुन्दर ही कहा है - ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता का काम है, क्योंकि जो होकर न रहे वह भूतकाल और न होकर होवे वह भविष्यत्काल कहलाता है | क्या ईश्वर को कोई ज्ञान होके नहीं रहता तथा न होके होता है | ? इसलिए परमेश्वर का ज्ञान सदा एकरस अखण्डित वर्त्तमान रहता है |भूत, भविष्यत् जीवों के लिए है | हाँ जीवों के कर्म की अपेक्षा से त्रिकालज्ञता ईश्‍व‌र में है, स्वतः नहीं |" (स. प्र. सप्‍त‌म समुल्लास) मन्त्र में त्रिकालज्ञता का जो निरूपण है, वह जीवों की अपेक्षा से है | चूँकि वह सबको जानता है, अतः अभि कृतानि या च कर्त्वा - जो किये जा चुके और जो किये जाने हैं, उन सब पदार्थों को सम्मुख ही देखता है | इस सम्मुखदर्शन का हेतु इससे पूर्वमन्त्र में कहा गया है -

निषसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा | साम्राज्याय सुक्रतुः | - ऋ. 1|25|10

नियमों का धारक, श्रेष्‍ठकर्म्मा, वरणीय भगवान् साम्राज्य के लिए = एकरस प्रकाश के लिए प्रजाओं में, प्रकृति तथा जीवों में पूर्णरूप से निरन्तर और नितरां रहता है | सभी स्थानों में रहता है, ज्ञानवान् है, सर्वत्र है और साथ ही 'सुक्रतु'=उत्तम कारीगर, श्रेष्‍ठकर्त्ता | सीधा-‍साधा भाव निकला कि वही सृष्‍टिकर्त्ता है तब उसे अपनी सृष्‍टि का ज्ञान क्यों न होगा ? वह कालातीत है | नित्य में काल की कल्पना ? असम्भव ! किन्तु शरीरस्थ‌ जीव की परीक्षा तो भूत, भविष्यत् काल हैं | शरीरस्थ‌ जीव के तीन काल और उनका एक काल या वह अकाल | 'सुक्रतु' शब्द तो एक रहस्य का भण्डार है | भगवान् श्रेष्‍ठ उत्तम, भले कर्म्म ही करता है | उसकी कृति में, रचना में कोई दोष नहीं हो सकता | हमारे दृष्‍टि दोष के कारण ही इसमें दोष प्रतीत होते हैं | वह भगवान् धृतव्रत‌ है | नियमों का निर्माता ही नहीं, वरन् वह नियमों का धारण करनेवाला भी है, अतः वह वरुण है, चाहने योग्य है, आदर्श है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)

subodhkumar आदरणी

subodhkumar
आदरणीय आनन्द जी द्वारा ऋग्वेद 1/25/11 एवम् 1/25/12 के मंत्रों को प्रस्तुत करने का निर्णय अत्यन्त श्लाघ्य है.
इस विषय पर ऋ1/25/11 मन्त्र का महर्षि दयानन्द भाष्य और सायन भाष्य दोनो को स्वामी वेदानन्द जी के उद्धरित भाष्य के साथ मिला कर पढ कर समझने का प्रयास करने पर कहीं अपनी समझ की कमी दीखती है. इस लिए वेदाध्ययन मे वेदों को समझने के लिए , मेरी अल्प बुद्धि से किसी सूक्त के एक दो मन्त्रों को देखने की बजाए पूरे एक सूक्त का अध्ययन
करना अधिक लाभकारी सिद्ध होता है. सूक्त का दृष्टा ऋषि और देवता को लक्ष्य मे रख कर पूरे सूक्त का आशय एक साथ समझ मे आने लगता है.

ओउम् | अतो विश्‍वान्दभुता चिकित्वाँ अभि | कृतानि या च कर्त्वा ||
ऋग्वेद 1|25|11
श‌ब्दार्थ -
अतः.......................इस कारण, वह सबसे स्वीकारणीय भगवान्
(महर्षि दयानन्द भाष्य..इसी कारण वह न्यायाधीश होने को समर्थ होता है.,सायन भाष्य यहां से ),
विश्वानि...................सभी
(दयानन्द भाष्य .सब, सायन भाष्य.. सब को )
अद्भुता....................अद्भुत,अभूतपूर्व पदार्थों को
(दयानन्द भाष्य ..आश्चर्यरूप वस्तुओं को , सायन भाष्य..घटनाऑं को )
चिकित्वाऩ्................जानता हुआ
(दयानन्द भाष्य .. सब को चेताने वाला धार्मिक सकल विद्याऑं को जानने न्याय करने वाला मनुष्य , सायन भाष्य.. बुद्धिमान )
कृतानि....................किये हुए पदार्थों को
( दयानन्द भाष्य .. अपने किये हुए, सायन भाष्य...की गई हैं)
च..........................और
(दयानन्द भाष्य... और, सायन भाष्य .. और )
या.........................जो
(दयानन्द भाष्य .. जो, सायन भाष्य.. जो)
कर्त्त्वा......................किये जाते हैं उन सबको
(दयानन्द भाष्य ..जो आगे करने योग्य कर्मों और , सायन भाष्य ..करनी हैं).
अभिपश्यति...............सम्मुख देखता है |
(दयानन्द भाष्य..सब प्रकार से देखता है, सायन भाष्य ..सब ओर से देखता है.)
व्याख्या ‍
जितनी सृष्टि है भगवान् उसे जानता है, जो उसे भी जानता था और जानता है | भावी सृष्‍टि का भी उसे ज्ञान है, इसका एक हेतु इसी मन्त्र में दिया है - विश्‍वान्दभुता चिकित्वान् वह सम्पूर्ण अद्‍भुत विलक्षण पदार्थों को जानता है अर्थात् वह सर्वज्ञ है | 'सर्व' से भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान तीनों आते हैं | ईश्वर की सृष्टि में तो कोई भूत, भविष्यत् आदि नहीं है | ईश्वर का ज्ञान सदा रहता है | ऋषि दयानन्द ने बहुत सुन्दर ही कहा है - ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता का काम है, क्योंकि जो होकर न रहे वह भूतकाल और न होकर होवे वह भविष्यत्काल कहलाता है | क्या ईश्वर को कोई ज्ञान होके नहीं रहता तथा न होके होता है | ? इसलिए परमेश्वर का ज्ञान सदा एकरस अखण्डित वर्त्तमान रहता है |भूत, भविष्यत् जीवों के लिए है | हाँ जीवों के कर्म की अपेक्षा से त्रिकालज्ञता ईश्‍व‌र में है, स्वतः नहीं |" (स. प्र. सप्‍त‌म समुल्लास) मन्त्र में त्रिकालज्ञता का जो निरूपण है, वह जीवों की अपेक्षा से है | चूँकि वह सबको जानता है, अतः अभि कृतानि या च कर्त्वा - जो किये जा चुके और जो किये जाने हैं, उन सब पदार्थों को सम्मुख ही देखता है | इस सम्मुखदर्शन का हेतु इससे पूर्वमन्त्र में कहा गया है –
{दयानन्द भावार्थ .. जिस प्रकार ईश्वर सब जगह व्याप्त और सर्वशक्तिमान होने से सृष्टि रचनादि रूपी कर्मों और जीवों के तीनों कालों के कर्मों को जान कर इन को उन उन कर्मों के अनुसार फल देने योग्य है! इसी प्रकार जो विद्वान मनुष्य पहले हो गये उन के कर्मों और आगे अनुष्ठान करने योग्य कर्मों के करने मे युक्त होता है वही सब को देखता हुआ सब के उपकार करने वाले उत्तम से उत्तम कर्मों को कर सब का न्याय करने को योग्य होताहै.
सायन भाष्य ....बुद्धिमान (वरुण) इस (स्थान) से सब घटनाओं को देखते हैं जो की गई हैं और जो करनी है !1 इस सृष्टि में जो आलोक हो चुके हैं और जो आगे होने वाले जो हैं! उन सब को वरुण ऐसे देखते हैं जैसे हम वर्तमान किसी आलोक को देख रहे हों! भूत भविष्यत वर्तमान केवल हमारी अल्प दृष्टि के लिए हैं वरुण की दृष्टि में सब काल एक रस है.!! }

निषसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा | साम्राज्याय सुक्रतुः | - ऋ. 1|25|10
नियमों का धारक, श्रेष्‍ठकर्म्मा, वरणीय भगवान् साम्राज्य के लिए = एकरस प्रकाश के लिए प्रजाओं में, प्रकृति तथा जीवों में पूर्णरूप से निरन्तर और नितरां रहता है | सभी स्थानों में रहता है, ज्ञानवान् है, सर्वत्र है और साथ ही 'सुक्रतु'=उत्तम कारीगर, श्रेष्‍ठकर्त्ता | सीधा-‍साधा भाव निकला कि वही सृष्‍टिकर्त्ता है तब उसे अपनी सृष्‍टि का ज्ञान क्यों न होगा ? वह कालातीत है | नित्य में काल की कल्पना ? असम्भव ! किन्तु शरीरस्थ‌ जीव की परीक्षा तो भूत, भविष्यत् काल हैं | शरीरस्थ‌ जीव के तीन काल और उनका एक काल या वह अकाल | 'सुक्रतु' शब्द तो एक रहस्य का भण्डार है | भगवान् श्रेष्‍ठ उत्तम, भले कर्म्म ही करता है | उसकी कृति में, रचना में कोई दोष नहीं हो सकता | हमारे दृष्‍टि दोष के कारण ही इसमें दोष प्रतीत होते हैं | वह भगवान् धृतव्रत‌ है | नियमों का निर्माता ही नहीं, वरन् वह नियमों का धारण करनेवाला भी है, अतः वह वरुण है, चाहने योग्य है, आदर्श है |
स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)