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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदाध्ययन

ऋषि दयानन्द का अपने वेद भाष्य के बारे में

1 “जिस समय चारों वेदों का भाष्य बन और छपकर सब बुद्धिमानों के ज्ञानगोचर होगा, तब किसी को उत्तम विद्यापुस्तक वेद का परमेश्वररचित होना भूगोल भर मे विदित हो जावेगा!
ईश्वरकृत सत्य पुस्तक वेद ही है वा कोई दूसरा भी हो सकता है, ऐसा निश्चय जान के सब मनुष्यों की वेदों में परम प्रीति होगी इत्यादि अनेक उत्तम प्रयोजन इस वेद भाष्य के बनाने में जान लेना.”
ऋषि दयानन्द
ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका से

2. “परमात्मा की कृपा से मेरा शरीर बना रहा और कुशलता से वह दिन देख मिला कि वेद भाष्य सम्पूर्ण हो जाये तो निस्सन्देह इसा आर्यावर्त्त देश मे सूर्य का सा प्रकाश हो जावेगा”
3. “मैं अपने निश्चय और परीक्षा के अनुसार ऋग्वेद से ले कर पूर्व मीमांसा पर्यन्त अनुमान से तीन हज़ार ग्रंथों के लगभग [प्रमाण] मानता हूं.”

ऋषि दयानन्द
भ्रान्तिनिवारण से
[दयानन्दीय लघु ग्रन्थ सन्ग्रह]

वेदार्थ की कसौटियां
(पण्डित ब्रह्मदत्तजिज्ञासु यजुर्वेद भाष्य टीका से)
यह पहले बताया जा चुका है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान,अपौरुषेय, नित्य तथा सृष्टिनियमों के अनुकूल हैं. अत: उस का अर्थ करते समय भी उन्ही कसौटियों
को यथार्थ समझना अनिवार्य है, जो कि इन पूर्वोक्त बातों का विरोध न करती हों,अत: वेदार्थ की दृष्टि से संक्षेपत:उन का निरूपण करते हैं....
1.वेद में सार्वभौम नियमों का प्रतिपादन होना चाहिये.
2.किसी देश या जाति विशेष का सम्बन्ध उस में न होना चाहिये.
3.ईश्वर के गुण,कर्म तथा सृष्टि नियमों के विरुद्ध न हो.
4.”सर्वज्ञानमयो हि स:” वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है, उस से यह अवश्य विदित हो.
5.मानव जीवन के प्रत्येक अङ्ग पर प्रकाश डालता हो,अर्थात मानव की ज्ञाना सम्बा न्धी सभी आवश्यकताओं को पूरा करतआ हो.
6.न्यायादि शास्त्रों के नियमों के विपरीत न हो, दूसरे शब्दों में तर्क की कसौटी पर ठीक उतरे, अर्थात तर्क सम्मत हो.
7.जिस में किसी व्यक्ति विशेष का इतिहास न हो.
8.त्रिविध अर्थों का ज्ञान कराता हो.
9.आप्त सम्मत हो,ऋषि मुनियों की धारणाएं भी जिस के अनुरूप हों.
10.जिस की एक आज्ञा दूसरी आज्ञा को न काटती हो.

स्वामि

स्वामि विद्यानन्द सरस्वती रचित 'वेदार्थ भूमिका' वेद परिचय के लिये उत्तम ग्रन्थ है. उसे अँग्रेजी मेँ अनूदित करने योग्य है.
= भावेश मेरजा

subodhkumar यह

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यह जानकारी प्रदान करने के लिए अनेक धन्यवाद.