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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (12)

.. और कोई कोई आर्य्य लोग किंवा यूरोप आदि देशों में रहने वाले अंगरेज कहते हैं कि प्राचीन आर्य्य लोग अनेक देवताओं और भूतों की पूजा करते थे, यह उनका कहना व्यर्थ है, क्योंकि वेदों और उनके प्राचीन व्याख्यानों में अग्नि आदि नामों से उपासना के लिये एक परमेश्वर का ही ग्रहण किया है, जिसकी उपासना आर्य्य लोग करते थे | इससे पूर्वोक्त शंका किसी प्रकार से नहीं आ सकती |

(अब गतांक से आगे)

इसी विषय में डाक्टर मोक्षमूलर साहेब ने अपने बनाये संस्कृत साहित्य ग्रन्थ में ऐसा लिखा है कि आर्य्य लोगों को क्रम से अर्थात् बहुत काल के पीछे ईश्वर का ज्ञान हुआ था, और वेदों के प्राचीन होने में एक भी प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु उनके नवीन होने में तो अनेक प्रमाण पाये जाते हैं | इसमें एक तो 'हिरण्यगर्भ' शब्द का प्रमाण दिया है कि छन्दोभाग से मन्त्रभाग दो सौ वर्ष पीछे बना है, और दूसरा यह है कि वेदों में दो भाग हैं, एक तो छन्द और दूसरा मन्त्र | उनमें से छन्दोभाग ऐसा है जो सामान्य अर्थ के साथ सम्बन्ध रखता है, और दूसरे की प्रेरणा से प्रकाशित हुआ मालूम पड़ता है, कि जिसकी उत्पत्ति बनाने वाले की प्रेरणा से नहीं हो सकती, और उसमें कथन इस प्रकार का है, जैसे अज्ञानी के मुख से अकस्मात् वचन निकला हो | उसकी उत्पत्ति में (3100) इकतीस सौ वर्ष व्यतीत हुए हैं | उसमें (अग्निः पूर्वेभिः) इस मन्त्र का भी प्रमाण दिया है |

सो उनका यह कहना ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि उन्होंने (हिरण्यगर्भः.) और (अग्निः पूर्वेभि.)इन दोनों मन्त्रों का अर्थ यथावत् नहीं जाना है | तथा मालूम होता है कि उनको 'हिरण्यगर्भ) शब्द नवीन जान पड़ा होगा, इस विचार से कि हिरण्य नाम है सोने का, वह सृष्टि के बहुत पीछे उत्पन्न हुआ है, अर्थात् मनुष्यों की उन्नति, राजा और प्रजा के प्रबन्ध होने के उपरान्त पृथिवी में से निकाला गया है | सो यह बात भी उनकी ठीक नहीं हो सकती, क्योंकि इस शब्द का अर्थ यह है कि - ज्योति कहते हैं विज्ञान को, सो जिसके गर्भ अर्थात् स्वरूप में है, ज्योति
अमृत अर्थात् मोक्ष है सामर्थ्य में जिस के और ज्योति जो प्रकाशस्वरूप सूर्य्यादि लोक जिसके गर्भ में हैं तथा ज्योति जो जीवात्मा जिस के गर्भ अर्थात् सामर्थ्य में है, तथा यशः सत्कीर्ति जो धन्यवाद जिसके स्वरूप में है, इसी प्रकार ज्योति=इन्द्र अर्थात् सूर्य, वायु और अग्नि ये सब जिसके सामर्थ्य में हैं, ऐसा जो परमेश्वर है उसी को हिरण्यगर्भ कहते हैं |

इस हिरण्यगर्भ शब्द के प्रयोग से वेदों का उत्तमपन और सनातनपन तो यथावत् सिद्ध होता है, परन्तु इससे नवीनपन सिद्ध कभी नहीं हो सकता | इससे डाक्टर मोक्षमूलर साहेब का कहना जो वेदों के नवीन होने के विषय में है सो सत्य नहीं है | और जो उन्होंने (अग्निः पूर्वेभि:.) इसका प्रमाण वेदों के नवीन होने में दिया है, सो भी अन्यथा है, क्योंकि इस मन्त्र में वेदों के कर्त्ता, त्रिकालदर्शी ईश्‍वर ने भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान तीनों कालों के व्यवहारों को यथावत् जान के कहा है कि वेदों को पढ़ के जो विद्वान हो चुके हैं वा जो पढ़ते हैं, वे प्राचीन और नवीन ऋषि लोग मेरी स्तुति करें | तथा ऋषि नाम मन्त्र, प्राण और तर्क का भी है, इनसे ही मेरी स्तुति करनी योग्य है | इसी अपेक्षा से ईश्‍वर ने इस मन्त्र का प्रयोग किया है | इससे वेदों का सनातनपन और उत्तमपन तो सिद्ध होता है, किन्तु उन हेतुओं से वेदों का नवीन होना किसी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता | इसी हेतु से डाक्टर मोक्षमूलर साहेब का कहना ठीक नहीं |

(क्रमशः)

subodhkumar आदरणी

subodhkumar
आदरणीय आनंद जी,
परमेश्वर और वेदों के बारे में के बारे में अंग्रेज़ो को समझाने की बात तो तब करें जब हम अपने स्वदेश में ही शंकराचार्य जैसे विद्वानों और उन के कोटिष: अनुयायियों को ही पहले समझा सकें. उन्हे वेदों मे आस्था तो है. जिन आर्य परिवारों को महर्षि ने स्वयं वैदिक धर्म की दीक्षा दी थी उन के उत्तराधिकारि तीसरी पीढि के ही बच्चे तक अब रुढिवादि मूर्तिपूजक हो चले हैं.पाखण्डी धोंगी बाबा सन्यासियो और टेलिविज़न पर ज्योतिषियों रत्नों के उपचार चमत्कार के भ्रष्ट प्रचार भी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है जिस के सामने हमे कुछ सकारात्मक सोच को बढावा देने की भी आवश्यकता है.
और क्या आर्यसमाज की मार्किटिंग नीति में कुछ कमी रह गई जो हमारे प्रेमी हमें छोड कर चले जा रहे हैं?