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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्राणरक्षित सर्वथा रक्षित रहता है

ओउम् |
न स जीयते मरुतो न हन्यते न स्त्रेधति न व्यथते न रिष्यति |
नास्य राय उप दस्यन्ति नोतय ऋषिम वा यं राजानं वा सुषूदथ ||
(ऋग्वेद 5.54.7)

शब्दार्थ -
मरुत: = प्राणो
यम् = जिस
ऋषिम् = ज्ञ।नी को
वा = अथवा
राजानम् = रक्षाकर्मपरायण , कर्मशील को
वा = अथवा किसी अन्य को
सुषूदथ = सुख देते हो
स: = वह
न = नहीं
जीयते = हानि उठाता , आयु में कम होता है
न+ हन्यते = न मारा जाता है
न+ स्त्रेधति = न दुख देता है
न + व्यथते = न डरता - काँपता है
न + रिष्यति = न रिस करता है , क्रोध करता है
न = न ही
अस्य = इसके
राय: = धन
उपदस्यन्ति = क्षीण होते हैं
न = न ही इसकी
ऊतय: = प्रीतियाँ , रक्षाएँ तथा व्यवहार नष्ट होते हैं

हे प्राणो ! जिस ज्ञ।नी को अथवा रक्षाकर्मपरायण , कर्मशील को अथवा किसी अन्य को सुख देते हो वह न हीं हानि उठाता , आयु में कम होता है , न मारा जाता है , न दुख देता है , न डरता - काँपता है , न रिस करता है , क्रोध करता है , न ही इसके धन क्षीण होते हैं , न ही इसकी प्रीतियाँ , रक्षाएँ तथा व्यवहार नष्ट होते हैं |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :

मनुष्य को अनेकों भय लगे रहते हैं , कभी आयु घटने का , कभी मरने का , कभी किसी से प्रताड़ित‌ होने का ; कभी किसी रोग आदि से शरीर में कँपकँपी हो जाती है, कभी धन नाश का भय उसे सताता है , तो कभी प्रीतिनाश की भीति उसे व्याकुल करती है | वेद कहता है , इन सब उपद्रवों से बचना चाहते हो तो प्राण की शरण में आओ | यदि प्राणो को अपने त्राण में लगा सको तो तुम्हें किसी प्रकार का भय विह्वल नहीं करेगा |

सभी जानते हैं कि प्राण के अभ्यास से आयु बढ़ती है , अत: जो प्राण का साधन करेगा , उसकी आयु बढ़ेगी ,घटेगी नहीं | प्राण का साधन करने से मृत्यु का क्लेश भी नहीं हो सकता | मरना तो अवश्यंभावी है , जो जन्मा वह अवश्य मरेगा - जातस्य हि ध्रुवो मत्यु: = उत्पन्न की मौत निश्चित है , किन्तु मरणसमय में प्राण निकलने से मुमुक्षु को जो पीड़ा होती हे , प्राणाभ्यासी उससे बच जाता है | मत्यु सन्निहित देखकर वह तत्काल आयास के बिना प्राण को बाहर निकाल देता है | प्राणानुष्ठान से उसे आत्म‌ज्ञ।न होता है और वह अनुभव करता है कि सब में मेरे आत्मा के समान आत्मा का वास है , तब वह हिंसा और क्रोध से हट जाता है | किसी की त्रुटि के कारण क्रोध आया करता है | प्राणो ने अपनी त्रुटियों का ज्ञ।न करा दिया है , अब वह अपनी त्रुटियों के निवारण में संलग्न है | उसे अवकाश ही नहीं कि दूसरों के दोष‌ देखे | है तो अब भी वह दोषदर्शी , किन्तु स्वदोषदर्शी ; न कि परदोषदर्शी | डर या कँपकँपी पदार्थ नाश की सम्भावना से होते हैं ; जब वह सम्भावना ही न रही , तब डर काहे का ?
ऐसे संयमी का धन कभी नष्ट नहीं हो सकता , क्योंकि प्राणसाधक को अत्यन्त संयम से जीवन बिताना होता है | सबको आत्मसमान जानने से सभी से प्रीति की रीति से नीतियुक्त व्यवहार क्रता है , अत: वह सबका प्रीतिभाजन बन जाता है |
प्र नू स मर्त: शवसा जनाँ अति तस्थौ व ऊती मरुतो यमावत |
हे मरुतो = प्राणो ! सचमुच वह मनुष्य बल के कारण जनसाधारण से बढ़कर रह्ता है जिसकी तुम प्रीति से रक्षा करते हो |
प्राण में बड़ा बल है | भूमि से कोई भार उठाते समय यदि बीच में में श्वास निकल जाए तो वह भार हाथ से गिर पड़ता है , क्योंकि बल का आधार प्राण बाहर चला गया , अत: बल के इच्छुकों को प्राणसाधन का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए |