Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' द्वितीय साधनपादः (9)

(गतांक से आगे)

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः ||43||

[काया-इन्द्रियसिद्धिः] शरीर तथा इन्द्रियाँ अनुकूल (= बलवान्) बन जाते हैं [अशुद्धिक्षयात्] अशुद्धि का नाश होने से [तपसः] तप के अनुष्ठान से |

तपस्या का अनुष्ठान करने वाले का शरीर, मन तथा इन्द्रियाँ बलवान् एवं दृड़ होते हैं | तथा वे उस तपस्वी के अधिकार में आ जाते हैं |

स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगाः ||44||

[स्वाध्यायात्] स्वाध्याय करने से [इष्टदेवतासंप्रयोगाः] ईश्‍वर के साथ सम्बन्ध होता है |

स्वाध्याय करनेवाले व्यक्ति की आध्यात्मिक पथ पर चलने की श्रद्धा, रुचि बढ़ती है तथा वह ईश्‍वर के गुण, कर्म, स्वभावों को अच्छी प्रकार जानकर उसके साथ सम्बन्ध भी जोड़ लेता है |

समाधिसिद्धीरीश्‍वरप्रणिधानाद् ||45||

[समाधिसिद्धीः] समाधि की प्राप्ति होती है [रीश्‍वरप्रणिधानात्] ईश्‍वर प्रणिधान करने से |

ईश्‍वर को अपने अन्दर बाहर उपस्थित मानकर तथा ईश्‍वर मुझे देख, सुन, जान रहा हैं, ऐसा समझने वाले की समाधी शीघ्र ही लग जाती है | (देखें सूत्र 2/32)

स्थिरसुखमासनम् ||46||

[स्थिरसुखम्] जिसमें सुखपूर्वक शरीर की स्थिरता हो [आसनम्] वह आसन है |
ईश्‍वर के ध्यान के लिए जिस स्थिति में सुखपूर्वक, स्थिर होकर बैठा जाय, उस स्थिति का नाम 'आसन' है | जैसे पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन आदि |

प्रयत्न‌शैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ||47||

[प्रयत्न‌शैथिल्य-अनन्तसमापत्तिभ्याम्] शारीरिक चेष्टाओं को रोक देने से और अनन्त ईश्‍वर में ध्यान लगाने से (आसन की सिद्धि होती है) |

हाथ, पैर, गर्दन, सिर, आदि अङ्गों को न हिलाने डुलाने से तथा अनन्त (= सर्वव्यापक) परमात्मा में मन को स्थिर करने से आसन सिद्ध=स्थिर होता है |

ततो द्वन्द्वानभिघातः ||48||

[ततः] आसन के दृढ़‌ होने से [द्वन्द्व-अनभिघातः] द्वन्द्वों से बाधा नहीं होती (= कम होती है) |

आसन का अच्छा अभ्यास हो जाने पर योगाभ्यासी को उपासना काल में तथा व्यवहार काल में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि द्वन्द्व कम सताते हैं, तथा योगाभ्यास की आगे की क्रियाओं को करने में सरलता होती है |

तस्मिन् सति श्‍वासप्रश्‍वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ||49||

[तस्मिन् सति] आसन के सिद्ध (=दृढ़) हो जाने पर [श्‍वासप्रश्‍वासयोः] श्‍वास प्रश्‍वास की [ग‌तिविच्छेदः] गति को यथाशक्ति रोकना [प्राणायामः] प्राणायाम कहलाता है |

किसी आसन पर स्थिरतापूर्वक बैठने के पश्चात मन की चंचलता को रोकने के लिए श्‍वास-प्रश्‍वास की गति को विधिपूर्वक, विचार से, यथाशक्ति रोकने स्वरूप जो क्रिया की जाती है, उसका नाम प्राणायाम है |

(क्रमशः)

[सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित
लेखक - श्री ज्ञानेश्वरार्यः - M.A. दर्शनाचार्य, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़, गुजरात के सौजन्य से प्रेषित]