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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उत्तम जीवन पाने का रक्षा कवच कैसे धारण करें

उत्तम जीवन पाने का रक्षा कवच कैसे धारण करें अथर्व 19/19
Sustained Welfare- Atharv: 19/19
Refrain line- ध्रुव पंक्ति

“ तां पुरं प्र णयामि व:! तामा विंशत तां प्र विंशत सा व: शर्म च वर्म च यच्छ्तु !!“
Achieve and live life that provides armor of sustained welfare
वह जीवन प्राप्त करो जो तुम्हे शरण और सुरक्षा कवच प्रदान करे
वह स्थान कैसा है?

मित्र: पृथिव्योदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व: ! अथर्व 19/19/1
जहां मित्र रूप अग्निदेव पृथ्वी पर अपने पुर (पालन करने वाली नगरी) को उत्तम बनाने के लिए ऊपर उठते हैं. ( अग्निहोत्र होता है)

वायुरन्तरिक्सेणोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व: 1 अथर्व 19/19/2
पृथ्वी से वायु अंतरिक्ष मे जा कर परिमार्जित हो कर पुन: हमारे (पर्यावरण) को उत्तम बनाने के लिए उठते हैं .
सूर्यो दिवोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व: ! अथर्व 19/19/3
सूर्य देवता हमारी व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए ऊपर व्याप्त हैं
.
चन्द्रमा नक्षत्रैरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व:! अथर्व 19/19/4
चन्द्रमा नक्षत्रों सहित हमारी व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए ऊपर व्याप्त हैं.

सोम ओषधीभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व:! अथर्व 19/19/5.
ओषधी रूप हमारे ज्ञान विज्ञान के अनुरूप हमारी रक्षा के लिए उपलब्ध हैं.

यज्ञो दक्षिणाभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व:! अथर्व 19/19/6
यज्ञ अपनी दक्षिणा रूप उपहार हमारी व्यवस्था को उत्तम बनने के लिए स्थापित होते हैं.

समुद्रो नदीभिरुदकरामत् तां पुरं प्र णयामि व:! अथर्व 19/19/7
समुद्र नदी इत्यादि हमारी व्यवस्था को उत्तम बनने के लिए ऊपर उठते हैं.

ब्रह्मं ब्रह्मचारिभिरुदक्रमत् तां पुरं प्र णयामि व:!अथर्व 19/19/8
ब्रह्म( वेद और परमेश्वर) तथा ब्रह्मचारी (जिन्होंने वेदाध्ययन के निमित्त व्रताचरण किया है) हमारी व्यवस्था को उत्तम बनने मे उद्यत्त होते हैं.

इन्द्रो वीर्येणोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व: ! अथर्व 19/19/9
ऊर्ध्वरेता बन कर इन्द्र जैसा शौर्य धारण करने से हमारी व्यवस्था उन्नत हो कर ऊपर उठती है.

देवा अमृतेनोदक्रामंस्तां तां पुरं प्र णयामि व: ! अथर्व 19/19/10
देवा = साध्या: ऋषयश्च, “ तेन देवा अयजंत साध्या ऋषयश्च ये” यजु0 31/9. “यस्यच्छायाSमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम” यजु0 25/13=परमेश्वरकी छाया ही अमृत होती है)
परमेश्वर की कृपा का अमृत आच्छादन ही हमारी व्यवस्था को उन्नत बनाता है.

प्रजापति: प्रजाभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि व: ! अथर्व 19/19/11
प्रजापति:= उत्तम सन्तानों का रक्षक सद् गृहस्थी, प्रजाभि: =उत्तम सन्तानों के द्वारा समाज की व्यवस्था को उन्नत बनाते हैं

आइये इन‌

आइये इन‌ वैदिक मन्त्रों को एक साथ पढ़‌ कर इनका आनन्द लें

उत्तम जीवन पाने का रक्षा कवच कैसे धारण करें ?

वह जीवन प्राप्त करो जो तुम्हे शरण और सुरक्षा कवच प्रदान करे

वह स्थान कैसा है? जहां मित्र रूप अग्निदेव पृथ्वी पर अपने पुर (पालन करने वाली नगरी) को उत्तम बनाने के लिए ऊपर उठते हैं. ( अग्निहोत्र होता है)

पृथ्वी से वायु अंतरिक्ष मे जा कर परिमार्जित हो कर पुन: हमारे (पर्यावरण) को उत्तम बनाने के लिए उठते हैं .

सूर्य देवता हमारी व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए ऊपर व्याप्त हैं
.
चन्द्रमा नक्षत्रों सहित हमारी व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए ऊपर व्याप्त हैं.

ओषधी रूप हमारे ज्ञान विज्ञान के अनुरूप हमारी रक्षा के लिए उपलब्ध हैं.

यज्ञ अपनी दक्षिणा रूप उपहार हमारी व्यवस्था को उत्तम बनने के लिए स्थापित होते हैं.

समुद्र नदी इत्यादि हमारी व्यवस्था को उत्तम बनने के लिए ऊपर उठते हैं.

ब्रह्म( वेद और परमेश्वर) तथा ब्रह्मचारी (जिन्होंने वेदाध्ययन के निमित्त व्रताचरण किया है) हमारी व्यवस्था को उत्तम बनने मे उद्यत्त होते हैं.

ऊर्ध्वरेता बन कर इन्द्र जैसा शौर्य धारण करने से हमारी व्यवस्था उन्नत हो कर ऊपर उठती है.

परमेश्वरकी छाया ही अमृत होती है

परमेश्वर की कृपा का अमृत आच्छादन ही हमारी व्यवस्था को उन्नत बनाता है.

उत्तम सन्तानों का रक्षक सद् गृहस्थी, प्रजाभि: =उत्तम सन्तानों के द्वारा समाज की व्यवस्था को उन्नत बनाते हैं

subodhkumar धन्यव

subodhkumar
धन्यवाद प्रिय आनंद जी.