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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (52|53) ,(इति प्रथमः प्रकाशः)

***ओउम्***

प्रार्थना विषय
उद्‍गातेव शकुने साम गायसि
ब्रह्मपुत्र इव सवनेषु शंससि |
वृषेव वाजी शिशुमतीरपीत्या
सर्वतो नः शकुने भद्रमा वद
विश्‍व‌तो नः शकुने पुण्यमा वद ||52||
ऋ. 2|8|12|2||

आवदंस्त्वं शकुने भद्रमा वद
तूष्णीमासीनः सुमति चिकिद्धि नः |
यदुत्पतन् वदसि कर्करिर्यथा
बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ||53||
ऋ. 2|8|12|3||

व्याख्यान - हे "शकुने" सर्वशक्तिमन्नीश्‍वर ! आप सामगान को गाते ही हो | वैसे ही हमारे हृदय में सब विद्या का प्रकाशित गान करो | जैसे यज्ञ में महापंडित सामगान करता है वैसे आप भी हम लोगों के बीच में सामादि विद्या का प्रकाश कीजिये | "ब्रह्मपुत्र इव सवनेषु" आप कृपा से सवन (पदार्थ विद्याओं) की "शंससि" प्रशंसा करते हो वैसे हमको भी यथावत् प्रशंसित करो | जैसे "ब्रह्मपुत्र इव" वेदों का वेत्ता विज्ञान से सब पदार्थों की प्रशंसा करता है वैसे आप भी हम पर कृपा कीजिये | आप "वृषेव वाजी" सर्वशक्ति का सेवन करने और अन्नादि पदार्थों के देने वाले तथा महाबलवान् और वेगवान् होने से वाजी हो | जैसे कि वृषभ के समान आप उत्तम गुण और उत्तम पदार्थों की वृष्‍टि करने वाले हो वैसे हम पर उनकी वृष्‍टि करो | "शिशुमतीः" हम लोग आप की कृपा से उत्तम शिशु (सन्तानादि) "अपीत्य" प्राप्‍त‌ होके आपको ही भजें | "आ सर्वतो नः शकुने" हे शकुने ! सर्व सामर्थ्यवान् ईश्वर ! सब ठिकानों से हमारे लिये "भद्रम्" कल्याण को "आ वद" अच्छे प्रकार कहो अर्थात् कल्याण की ही आज्ञा और कथन करो जिससे अकल्याण की बात भी कभी हम न सुनें | "विश्‍व‌तो, नः श." हे सब को सुख देने वाले ईश्‍व‌र ! सब जगत् के लिये "पुण्यम्" धर्मात्मा के कर्म करने को "आ वद" उपदेश कर जिससे कोई मनुष्य अधर्म करने की इच्छा भी न करे और सब ठिकानों में सत्यधर्म की प्रवृत्ति हो | "आवदंस्त्वं शकुने" हे शकुने जगदीश्वर ! आप सब "भद्रम्" कल्याण का भी कल्याण अर्थात् व्यावहारिक सुख के भी ऊपर मोक्ष-सुख का निरन्तर उपदेश कीजिये "तूष्णीमासीनः सुमतिं" हे अन्तर्यामिन् ! हमारे हृदय में सदा स्थिर हो मौन से ही "सुमतिम्" सर्वोत्तम ज्ञान देओ | "चिकिद्धि नः" कृपा से हमको अपने रहने के लिये घर ही बनाओ और आपकी परम विद्या को हम प्राप्‍त‌ हों | "यदुत्पतत्वदसि" उत्तम व्यवहार में पहुँचाते हुए आपका (यथा) जिस प्रकार से "कर्करिर्वदसि" कर्त्तव्य, कर्म, धर्म को ही अत्यन्त पुरुषार्थ से करो अकर्त्तव्य दुष्ट कर्म मत करो ऐसा उपदेश है कि पुरुषार्थ अर्थात् यथायोग्य उद्यम को कभी कोई मत छोड़ो जैसे " बृहद्वदेम विदथे" विज्ञानादि यज्ञ वा धर्मयुक्त युद्धों में "सुवीराः" अत्यन्त शूरवीर होके बृहत् (सबसे बड़े) आप जो परब्रह्म उन "वदेम" आपकी स्तुति आपका उपदेश, आपकी प्रार्थना और उपासना तथा आपका यह बड़ा अखण्ड साम्राज्य और सब मनुष्यों का हित सर्वदा कहें सुनें और आपके अनुग्रह से परमानन्द को भोगें ||52||53||

ओउम्-महाराजाधिराजाय परमात्मने नमो नमः
इति
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां महाविदुषां
श्रीयुतविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण
दयान्न्दसरस्वतीस्वामिना विरचित
आर्याभिविनये प्रथमा: प्रकाशः
पूर्त्तिमागमत्|

समाप्तोSयं प्रथमः प्रकाशः
From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'