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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदकर्त्ता

ओउम् | इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत | ब्रह्मकृते विपिश्चिते पनस्यवे ||

सामवेद उत्तरार्चिक 6.72.1 (1025)

शब्दार्थ :
विप्राय = मेधावी
बृहते = महान
ब्रह्मकृते = वेदकर्त्ता
विपिश्चिते = सर्वश्रेष्ठ‌
पनस्यवे = सबसे स्तोतव्य ,व्यवहारोपदेष्टा
इन्द्राय = अज्ञ।नवारक , उपद्र्वशामक भगवान के लिए
बृहत = महान
साम = साम् , स्तुति
गायत = गाओ |
मेधावी ,महान वेदकर्त्ता सर्वश्रेष्ठ सबसे स्तोतव्य ,व्यवहारोपदेष्टा ,अज्ञ।नवारक , उपद्र्वशामक भगवान के लिए महान साम, स्तुति गाओ |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)
व्याख्या :

सचमुच सभी स्तुतियों का पात्र भगवान है |गुणकथनं स्तुति: | कौन सा ऐसा गुण है जो भगवान में नहीं है | वह सर्वगुणनिधान हे | उसके गुणो का कथन ही वास्तविक स्तुति है |

भगवान को यहाँ ब्र‌ह्मकृत = वेदकर्त्ता कहा गया है | तनिक वेद के शब्दों पर ध्यान दीजिए | भगवान को पहले इन्द्र = अन्धकारवारक कहा गया है | अन्धकार तो सूर्य्य आदि भौतिक पदार्थ भी दूर करते हैं | इसलिए भगवान के सम्बन्ध में कहा गया कि वह 'विप्र' है , बुद्धिमान भी है , ऐसा बुद्धिमान जिसमें धारणावती बुद्धि भी है , अर्थात वह जड़ नहीं चेतन है | संसार में सैंकड़ों विप्र हैं , किन्तु भगवान बृहत = महान है, और साथ ही ब्रह्म‌कृत = वेदकर्त्ता है |सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य को कार्य चलाने के लिए, विश्व तथा विश्वपति का ज्ञ।न क्राने के लिए भगवान ने जो ज्ञ।न दिया , वह सब विद्याओं का मूल है | सभी ऋषि मुनि कहते हैं -

वेदेषु सर्वा विद्या: सन्ति मूलोद्देष्यत:-

बीजरूप से वेद में सभी विद्याएँ हैं |ऋग्वेद में एक स्थान पर वेद को परमात्मा की रच‌ना बताया है ‍

देवत्तं ब्रह्म गायत | (ऋग्वेद 1.37.4) ‍

परमात्मा के दिए वेद का गान करो | स्पष्ट रूप से ब्रह्म = वेद के साथ देवत्तं (देव का दिया हुआ) विशेषण विद्य‌मान है | वेदज्ञ।न देने का प्रयोजन बताने के लिए मन्त्र में एक और विशेषण लगाया कि वह 'पनस्यु' है - व्यवहार का उपदेश‌ देने का इच्छुक है | मनुष्य के पारस्परिक व्यवहार मे‍ त्रुटि न आये , सभी पदार्थों के गुणधर्म उसे ज्ञ।त हो सकें , इस दृष्टि से करुणानिधान , सर्वगुणखान भगवान ने सर्गारम्भ में मनुष्यों को वेदज्ञ।न दिया | वही सच्चा ज्ञ।न है|
ऋग्वेद के दशममण्डल का 71वां सूक्त ज्ञ।नसूक्त है | इसमे वेदोत्पत्ति का वर्णन बहुत सुन्दर शब्दों में है | वहां पहले मन्त्र में ब्रहस्पति = ज्ञ।नपति भगवान से वेदोत्पत्ति बतलाकर मानो एक शंका का समाधान करने के लिए दुसरे मन्त्र की रचना हे | शंका यह है कि जब भगवान ने मनुष्य के हृदय में ज्ञ।न दिया , क्या उच्चारण करते समय उसने उसमें अपना कुछ नहीं मिलाया ? इसका समाधान -

सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत |
अत्रा सखाय: सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि || ऋग्वेद 10.71.2

जैसे चालनी (छाननी) से सत्तु साफ किये जाते हैं , ऐसे ही उन धीरों ने मन से वाणी को किया , अर्थात शुद्ध वाणी ही बाहर आने दी , क्योंकि भगवान के सखा सखित्व के नियमों को जानते हैं, उनकी वाणी पर कल्याणकाऱी श्री विराजती है अर्थात सर्गारम्भ के वेदप्रापक ऋषियों ने शुद्ध परमात्मप्रदत ज्ञ।न ही उच्चारण किया था |‌