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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - द्वितीय वल्ली (2)

दूरमेने विपरीते विषूची
अविद्या या च विद्येति ज्ञात |
विद्याSभोप्सिंनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोSलोलुपन्त ||4||

अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः |
दन्द्रम्यमाणा: परियन्ति मूढ़ा
अन्धेनेव नोयमाना यथान्धाः ||5||

न साम्परायाः प्रतिभाति बालं
प्रमाद्यान्तं वित्तमोहेन् मूढम् |
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ||6||

अर्थ - (एते) ये दोनों मार्ग (विपरीते) एक दूसरे से विपरीत (विषूची) विरुद्धार्थ सूचक (दूरम्) और दूर हैं (या) जो (अविद्या) (च‌) और (विद्या) विद्या (इति) इस नाम से (ज्ञाता) जाने गये हैं (नचिकेतसम्) तुझ नचिकेता को (विद्याभौप्सिनम्) विद्या (श्रेय‌) का चाहने वाला (मन्ये) मानता हूँ (त्वा) तुझको (बहवः) बहुत-सी (कामाः) कामनायें (न, अलोलुपन्त‌) प्रलोभित नहीं करती हैं ||4||

(अविद्यायाम्) अविद्या (अन्तरे) में (वर्त‌मानः) पड़े हुए (स्वयम्) अपने को (धीराः) धीर और (पण्डितम्) विद्वान् (मन्यमानः) मानते हुए (दन्द्रभ्यमाणाः) उल्टे रास्ते पर चलते हुए (मूढ़ाः)मूढ़ (अन्धेन‌) अन्धे से (एव‌) ही (नीयमानाः) ले जाये गये (यथा) जैसे (अन्धाः) अन्धे (परियन्ति) घूमते हैं ||5||

(वित्त-मोहेन) धन के मोह (मूढ़म्) मूढ़ (प्रमाद्यन्तम्) प्रमादपूर्ण (बालम्) विवेक रहित पुरुष को (सम्परायः) परलोक की बात (न प्रतिभाति) पसन्द नहीं आती (अयम्) यह (लोकः) लोक है (परः, नास्ति) परलोक कुछ नहीं (इति, मानी) ऐसा मानने वाला (पुनः पुनः) बार-बार (मे) मेरे (मृत्यु के) (वशम्) वश में (आपद्यते) आता है ||6||

व्याख्या - श्रेय और प्रेय, निवृत्ति और प्रवृत्ति मार्ग ही को विद्या और अविद्या भी कहते हैं | जो लोग नचिकेता की तरह सांसारिक भोगों में लिप्‍त‌ नहीं होते वे ही श्रेय (विद्या) पथगामी होते हैं परन्तु प्रेय (अविद्या) ही को जिन लोगों ने अपना ध्येय बना रक्खा है और जो खुले तौर से परलोक (श्रेय‌) पथ की सत्ता नहीं मानते, उन्हें बार बार मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है | वे संसार में भी सफल मनोरथ नहीं होते |

उदाहरण - ऐनथनी (Anthony) नें सांसारिक प्रेम से प्रसन्नता की आशा की , ब्रूटस (Brutus) ने लौकेषणा ही से सुख चाहा और सीजर (Julius Caesar) नें दूसरों पर विजय काम‌ना ही में आनन्द ढूंढा, परन्तु इतिहास साक्षी है कि पहला अपमानित हुआ, दूसरे को ग्लानि और तीसरे को दुःखी होना पड़ा और परिणाम में तीनों ही की बरबादी हुई | इसीलिये केवल प्रेय ही से सुख चाहना भूल है | श्रेय को ऊँचा आसन देने से प्रेय की भी उपयोगिता हो जाती है |

श्रवणायापि बहुमिर्यो न लभ्यः
श्रृण्वन्तोपि बहवो यं न विद्यु: |
आश्‍च‌र्योस्य वक्‍ता कुशलोस्य लब्धा-
SSश्‍चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्‍टः ||7||

अर्थ - (यः) जो (आत्मज्ञान‌) (बहुभिः) बहुतों को (श्रवणाय अपि) सुनने को भी (न लभ्यः) नहीं मिलता (श्रृण्वन्तः, अपि) सुनते हुए भी (बहवः) बहुत (यम्) जिसको (नविदुः) नहीं जानते (अस्य‌) इस आत्म-ज्ञान का (वेक्ता) वक्ता (आश्चर्यः) कोई विरला ही होता है (कुशलानुशिष्‍टः) प्रवीण पुरुष से उपदेश पाया हुआ (ज्ञाता) जानने वाला (आश्‍चर्यः) कोई होता है ||7||

व्याख्या - परलोक पथ प्रदर्शक कोई-कोई अर्थात् बहुत थोड़े होते हैं | यह मार्ग कुछ कठिन है | इसलिये बहुत तो इसे जानना ही नहीं चाहते और जो जानना भी चाहते हैं उनमें से बहुतों के यह समझ ही में नहीं आता |

(क्रमशः)