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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'उपासना विषयः' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से (2)

(गतांक से आगे)

.. (कवयः) जो विद्वान‌ योगी लोग और (धीराः) ध्यान करने वाले हैं वे (सीरा युञ्जन्ति) (पृथक) यथायोग्य विभाग से नाड़ियों में अपने आत्मा से परमेश्वर की धारणा करते हैं (युगा) जो योगयुक्त कर्म्मों में तत्पर रहते हैं, (वितन्वते) अपने ज्ञान और आनन्द को सदा विस्तृत करते हैं, (देवेषु सुम्नया) वे विद्वानों के बीच में प्रशंसित होके परमानन्द को प्राप्त होते हैं ||6||

हे उपासक लोगो ! तुम योगाभ्यास तथा परमात्मा के योग से नाड़ियों में ध्यान करके परमानन्द को (वितनुध्वं) विस्तार करो | इस प्रकार करने से (कृते योनौ) योनि अर्थात् अपने अन्तःकरण को शुद्ध और परमानन्दस्वरूप परमेश्वर में स्थिर करके उसमें उपासनाविधान से (बीज) बीज को (वपत) अच्छी प्रकार से बौ‍ओ तथा (गिरा च) पूर्वोक्त प्रकार से वेदवाणी करके परमात्मा में (युनक्त) युक्‍त होकर उसकी स्तुति प्रार्थना और उपासना में प्रवृत्ति करो तथा (श्रुष्‍टिः) तुम लोग ऐसी इच्छा करो कि हम उपासनायोग के फल को प्राप्त होवें और (नो नेदीयः) हमको ईश्वर के अनुग्रह से वह फल (असत्) शीघ्र ही प्राप्त हो | कैसा वह फल है (इत्सृण्यः) अर्थात् वह उपासनायोगवृत्ति कैसी है कि सब क्लेशों को नाश करनेवाली और (सभराः) सब शान्ति आदि गुणों से पूर्ण है | उन उपासनायोग वृत्तियों से परमात्मा के योग को अपने आत्मा में प्रकाशित करो ||7||

.. (अष्टाविंशानि शिवानि) हे परमैश्वर्ययुक्‍त मङ्गलमय परमेश्वर ! आपकी कृपा से मुझको उपासनायोग प्राप्त हो तथा उससे मुझको सुख भी मिले | इसी प्रकार आपकी कृपा से दश इन्द्रिय, दश प्राण, मन, बुद्धि,चित्त, अहङ्कार, विद्या, स्वभाव, शरीर और बल, ये अट्ठाईस सब कल्याणों में प्रवृत होके उपासनायोग को सदा सेवन करें तथा हम भी (योग.) उस योग के द्वारा (क्षेमं) रक्षा को और रक्षा के योग को प्राप्त हुआ चाहते हैं | इसलिये हम लोग रात दिन आपको नमस्कार करते हैं ||8||

(भूयानरात्याः.) हे जगदीश्वर ! आप (शच्या) सब प्रज्ञा, वाणी और कर्म इन तीनों के पति हैं तथा (भूयान्) सर्वशक्‍तिमान् आदि विशेषणों से युक्‍त हैं | जिससे आप (अरात्याः) अर्थात् दुष्टप्रजा, मिथ्यारूपवाणी और पापकर्मों को विनाश करने में अत्यन्त समर्थ हैं तथा आपको (विभूः) सब में व्यापक और (प्रभूः) सब सामर्थ्यवाले जान के हम लोग आपकी उपासना करते हैं ||9||

(नमस्ते अस्तु.) अर्थात् परमेश्वर सब मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे उपासक लोगो ! तुम मुझको प्रेमभाव से अपने आत्मा में सदा देखते रहो तथा मेरी आज्ञा और वेदविद्या को यथावत् जान के उसी रीति से आचरण करो | फिर मनुष्य भी ईश्वर से प्रार्थना करें कि हे परमेश्वर । आप कृपादृष्टि से (पश्य मा) हमको सदा देखिये| इसलिये हम लोग आपको सदा नमस्कार करते हैं ||10||
कि -

(अन्नाद्येन) अर्थात् अन्न आदि ऐश्वर्य (यशसा) सबसे उत्तम कीर्ति (तेजसा) भय से रहित (ब्राह्मणवर्चसेन) और सम्पूर्ण विद्या से युक्‍त हम लोगों को करके कृपा से देखिये | इसलिये हम लोग सदा आपकी उपासना करते हैं ||11||

(क्रमशः)