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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

गोत्र , जाति, वंश और उपजाति

आदरणीय देवता गण,
कृपया ये बताएँ की गोत्र की उपपत्ति कब क्यूँ और किसने की? गोत्रों की सङ्ख्या कितनी है? क्या कोई विशेष गोत्र अन्य गोत्र से श्रेष्ठ होता है ?
इसी प्रकार वंश का भी वर्णन करें । ये उपजाति क्या होती है? क्या मनुष्यों की उपजाति होती है? विश्व के लोगों में कोई काला कोई गोरा कोई लाल इत्यादि कैसे हुये । क्या इसका कारण जलवायु या वातावरण में अन्तर था या पूर्व जन्म के संस्कार का परिणाम था? क्या वनो मे रहने वालों को 'आदिमानव' ऐसा कहना उचित है ?

ये भी

ये भी बताएँ- मेरा नाम बसंत झारिया है । मुझे बताया गया है कि मेरा गोत्र पद्म गोत्र है । क्या ये सत्य है ?

subodhkumar प्रिय

subodhkumar
प्रिय बसंत जी,
आप ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के बारे मे प्रश्न किया है.
सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा मे निषिद्ध माना जाता है.गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता. सपिण्ड (सगे बहन भाइ) के विवाह निषेध के बारे में ऋग्वेद 10वें मण्डल के 10वें सूक्त मे यम यमि जुडवा बहन भाइ के सम्वाद के रूप में आख्यान द्वारा उपदेश मिलता है.
यमी अपने सगे भाई यम से विवाह द्वारा संतान उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा प्रकट करती है.परन्तु यम उसे यह अच्छे तरह से समझाता है ,कि ऐसा विवाह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता है, और जो इस प्रकार संतान उत्पन्न करते हैं वे घोर पाप करते हैं.
“सलक्षमा यद्विषुरुषा भवाति” ऋ10/10/2 (“सलक्ष्मा सहोदर बहन से पीडाप्रद संतान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है”)‌
“ पापमाहुर्य: सस्वारं निगच्छात” ऋ10/10/12 ( “जो अपने सगे बहन भाई से संतानोत्पत्ति करते हैं, भद्र जन उन्हें पापी कहते हैं)
इस विषय पर स्पष्ट जानकारी पाणिनी कालीन भारत से भी मिलती है.
अष्टाध्यायी के अनुसार “ अपत्यं पौत्र प्रभृति यद गोत्रम् “, एक पुरखा के पोते,पडपोते आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी.
यहां पर सपिण्ड का उद्धरण करना आवश्यक हो जाता है.
“ सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते !
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदन !! “
मनु: 5/60
“सगापन तो सातवीं पीढी में समाप्त हो जाता है. और घनिष्टपन जन्म और नाम के ज्ञात ना रहने पर छूट जाता है.”
आधुनिक जेनेटिक अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार inbreeding multiplier अंत:प्रजनन से उत्पन्न विकारों की सम्भावना का वर्धक गुणांक इकाई से यानी एक से कम सातवीं पीढी मे जा कर ही होता है.
गणित के समीकरण के अनुसार,
अंत:प्रजनन विकार गुणांक= (0.5)raised to the power N x100, ( N पीढी का सूचक है,)
पहली पीढी मे N=1,से यह गुणांक 50 होगा, छटी पीढी मे N=6 से यह गुणांक 1.58 हो कर भी इकाई से बडा रहता है. सातवी पीढी मे जा कर N=7 होने पर ही यह अंत:पजनन गुणांक 0.78 हो कर इकाई यानी एक से कम हो जाता है.
मतलब साफ है कि सातवी पीढी के बाद ही अनुवांशिक रोगों की सम्भावना समाप्त होती है. यह एक अत्यंत विस्मयकारी आधुनिक विज्ञान के अनुरूप सत्य है जिसे हमारे ऋषियो ने सपिण्ड विवाह निषेध कर के बताया था.
सगोत्र विवाह से शारीरिक रोग , अल्पायु , कम बुद्धि, रोग निरोधक क्षमता की कमी, अपंगता, विकलांगता सामान्य विकार होते हैं. भारतीय परम्परा मे सगोत्र विवाह न होने का यह भी एक परिणाम है कि सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय सब से अधिक बुद्धिमान माने जाते हैं.
सपिण्ड विवाह निषेध भारतीय वैदिक परम्परा की विश्व भर मे एक अत्यन्त आधुनिक विज्ञान से अनुमोदित व्यवस्था है. पुरानी सभ्यता चीन, कोरिया, इत्यादि मे भी गोत्र /सपिण्ड विवाह अमान्य है. परन्तु मुस्लिम और दूसरे पश्चिमी सभ्यताओं मे यह विषय आधुनिक विज्ञान के द्वारा ही लाया जाने के प्रयास चल रहे हैं. एक जानकारी भारत वर्ष के कुछ मुस्लिम समुदायों के बारे मे भी पता चली है. ये मुसलमान भाई मुस्लिम धर्म मे जाने से पहले के अपने हिंदु गोत्रों को अब भी याद रखते हैं, और विवाह सम्बंध बनाने समय पर सगोत्र विवाह नही करते.
आधुनिक अनुसंधान और सर्वेक्षणों के अनुसार फिनलेंड मे कई शताब्दियों से चले आ रहे शादियों के रिवाज मे अंत:प्रजनन के कारण ढेर सारी ऐसी बीमारियां सामने आंयी हैं जिन के बारे वैज्ञानिक अभी तक कुछ भी नही जान पाए हैं.
मेडिकल अनुसंधानो द्वारा , कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर , गठिया, द्विध्रुवी अवसाद (डिप्रेशन), दमा, पेप्टिक अल्सर, और हड्डियों की कमजोरी. मानसिक दुर्बलता यानी कम बुद्धि का होना भी ऐसे विकार हैं जो अंत:प्रजनन से जुडे पाए गए हैं
बीबीसी की पाकिस्तानियों पर ब्रिटेन की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन के बच्चों मे 13 गुना आनुवंशिक विकारों के होने की संभावना अधिक मिली, बर्मिंघम में पहली चचेरे भाई से विवाह के दस बच्चों में एक या तो बचपन में मर जाता है या एक गंभीर विकलांगता विकसित करता है. बीबीसी ने यह भी कहा कि, पाकिस्तान में ब्रिटेन, के पाकिस्तानी समुदाय में प्रसवकालीन मृत्यु दर काफी अधिक है. इस का मतलब यह है कि ब्रिटेन में अन्य सभी जातीय समूहों. के मुकाबले मे जन्मजात सभी ब्रिटिश पाकिस्तानी शिशु मौते 41 प्रतिशत अधिक पाई गयी. इसी प्रकार Epidermolysis bullosa अत्यधिक शारीरिक कष्ट का जीवन, सीमित मानवीय और संपर्क शायद त्वचा कैंसर से एक जल्दी मौत भीआनुवंशिक स्थितियों की संभावना बताती है.
माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु, अंगिरा, मरीचि और अत्रि. भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के गौतम और भरद्वाज,मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए.
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए. अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं.इस प्रकार के विवरण से प्राप्त होती है आदि ऋषियों के आश्रम के नाम.
अपने नाम के साथ गुरु शिष्य परम्परा, पिता पुत्र परम्परा आदि, अपने नगर, क्षेत्र, व्यवसाय समुदाय के नाम जोड कर बताने की प्रथा चल पडी थीं. परन्तु वैवाहिक सम्बंध के लिए सपिंड की सावधानी सदैव वांछित रहती है. आधुनिक काल मे जनसंख्या वृद्धि से उत्तरोत्तर समाज, आज इतना बडा हो गया है कि सगोत्र होने पर भी सपिंड न होंने की सम्भावना होती है. इस लिए विवाह सम्बंध के लिए आधुनिक काल मे अपना गोत्र छोड देना आवश्यक नही रह गया है. परंतु सगोत्र होने पर सपिण्ड की परीक्षा आवश्यक हो जाती है.यह इतनी सुगम नही होती. सात पीढी पहले के पूर्वजों की जानकारी साधारणत: उपलब्ध नही रह्ती. इसी लिए सगोत्र विवाह न करना ही ठीक माना जाता है.
इसी लिए 1955 के हिंदु विवाह सम्बंधित कानून मे सगोत्र विवाह को भारतीय न्याय व्यवस्था मे अनुचित नही माना गया. परंतु अंत:प्रजनन की रोक के लिए कुछ मार्ग निर्देशन भी किया गया है.
वैदिक सभ्यता मे हर जन को उचित है के अपनी बुद्धि का विकास अवश्य करे. इसी लिए गायत्री मंत्र सब से अधिक महत्वपूर्ण माना और पाया जाता है.
निष्कर्ष यह निकलता है कि सपिण्ड विवाह नही करना चाहिये. गोत्र या दूसरे प्रचलित नामों, उपाधियों को बिना विवेक के सपिण्ड निरोधक नही समझना चाहिये.

he aaryavar! Mere prasn ka

he aaryavar! Mere prasn ka uttar deni ka prayatn karne hetu Dhanyavaad! Par aapne mujh baalak ke dwara pooche prasn ka uttar nahi diya. Maine vivaah sambandhi prasn nahi pucha tha. Kripya prasn dobara padhkar mujh tuchchha shoodra ki jijyaasa saant karen.

.. देखिए

..
देखिए आर्य बसंत जी
जैसा आदरणीय सुबोध जी ने लिखा, उसमें निम्न बातें निकलकर आईं हैं

1. गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता.

2. अष्टाध्यायी के अनुसार “ अपत्यं पौत्र प्रभृति यद गोत्रम् “, एक पुरखा के पोते,पडपोते आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी.

3. माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु, अंगिरा, मरीचि और अत्रि. भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के गौतम और भरद्वाज,मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए.
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए. अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं.इस प्रकार के विवरण से प्राप्त होती है आदि ऋषियों के आश्रम के नाम

आब आर्यसमाज की परम्परा में गुण कर्म स्वभाव‌ पर आधारित वर्ण व्यवस्था पर ही सारा जोर दिया जाता है | परम्परा से चली आ रही रीतियां कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती हैं |उनका महत्व उतना ही है जिससे आपकी ऐतिहासिक परमपराओं का आपको ज्ञान हो सके | गोत्र की आवश्यक्‍ता केवल विवाह आदि ही के निर्धारण में ,इनमें ली जाने वाली सावधानियों हेतु आवश्यक है, और उसका विस्तार में उल्लेख ऊपर किया गया है, अन्यथा इनका महत्त्व विशेष नहीं लगता है | आर्यसमाजी इन सब बखेड़ों में भी कम ही पड़ते हैं |
सो आपके द्वारा उठाए गये प्रश्न‌ कि गोत्रों की सङ्ख्या कितनी है? क्या कोई विशेष गोत्र अन्य गोत्र से श्रेष्ठ होता है ? इनपर केवल् उपरोक्‍त अनुसार ही आर्यसमाज विचार करता है अन्यथा नहीं वंश आदि का वर्णन भी सामाजिक स्तर पर चाहे जो होता रहे, उसे किन्हीं सामाजिक कार्यों में बाधक के रूप में नहीं देखा जाता है | मनुष्यमात्र को एक कुटुम्ब जब वेद ने कह दिया , फिर केवल गुण, कर्म व स्वभाव ही मुख्य निर्धारक होने चाहिए, अन्य सब गौण बातें होंगी | इसी कारण‌ मनुष्य की कोई उपजाती भी नही हो सकती है | जलवायु आदि का प्रभाव तो अलग अलग रंगरूप देता है, इससे ही जीवन में विविधता आती है,| इनके कारण न तो कोई ऊँच् न नीँच ही कहला सकता है |जहाँ तक आपने पूर्व जन्म के कर्मानुसार फल की बात कही है ,तो फल तो सबको अपने कर्मानुसार ही मिलता है, पर यह मानना कि यह कर्मफल ऊँच अथवा नीच के रूप में मानव का पक्का विभाजन कर सकता है, ऐसा मानना मूर्खता ही होगी | वनों में रहने वालों को हम किस नाम से पुकारें यह हमारी समझ पर है , पर यदि हमारे राजनेताओं की घुमाओ फिराओ वाली नीतियों के कारण उनका कुछ नामकरण किया जाता है तो वह अनुचित है | नाम तो गुणानुसार जो समाज उचित समझता है अपना चुन सकता है |
मैंने जो लिखा उसमें मेरी अपनी समझ जो आर्यसमाज के सिद्धान्तों के अनुरूप बनी है वैसा मैने लिखा है | अन्य विद्वान अन्यथा अपनी राय रख सकते हैं |

ॐ...ek prashn hai

ॐ...ek prashn hai aaryavar. Ye BRAHMA kaun hai? Kabhi padhta hun ki 'brahma' parameshwar ka naam hai , kabhi kisi rishi ka naam 'brahma' padha. Aapne ooper jo MOOL PURUSH BRAHMA ki baat kahi to vichaar aaya ki satyarth prakash me to 'lakhon log srishti ke is nirmaan me prithvi par paida hue the' aisa likha hai. To MOOL PURUSH BRAHMA ki baat gale se nahi utri AARYA !

प्रिय

प्रिय बन्धु
एक ओम मेरे घर के पास रहते हैं | सैकड़ों राम , कृष्ण जगह जगह मिल जाते है | हम अपने बच्चों के नाम इन्हीं प्रचलित नामौं से ही तो रखेंगे, कोई नई कल्पना हरबार तो सम्भव नहीं होगी , तो फिर ऐसी शंका क्यों ? हां, ये ऊपर कही गई बात भी किसी जनश्रुति की ही लगती है |

ॐ...aarya dev! Satyarth

ॐ...aarya dev! Satyarth prakash ka chapter 7 me mujhe apne prashn ka uttar mil gaya hai dekhiye :-[36-whose hearts did god reveal the Vedas in?
A:-"in the beginning god revealed the four Vedas- rig,yajur, sama, and atharva to Agni, Vayu, Aaditya and Angira respectively" shatpath brahman 11:4,2.3.
Q.-but it is written in the shwetashwatar upanishad "in the beginning god created brahma and revealed the Vedas in his heart" shwet¤upan¤6:18 why do you say that they were revealed to Agni and other sages?
A:-brahma was instructed in the knowledge of the Ved through the medium of the four sages, such as Agni. Mark what manu says-"in the beginning after human being had been created, the supreme spirit made the Vedas known to brahma through Agni etc. I.e.BRAHMA LEARNT THE FOUR VEDAS FROM AGNI,VAYU,AADITYA AND ANGIRA" manu:23] isse siddh hota hai ki 'MOOL BRAHMA' ISHWAR the. Parantu ek rishi bhi hue jinhone Agni aadi rishiyon se ved ka jyan liya. SAMASYAA KA SAMAADHAAN MIL gaya.

ॐ... Aryavar mere jigyasu

ॐ... Aryavar mere jigyasu buddhi mein ek prashn aaya hai. Aapne GAUTAM rishi ka varnan kiya hai kya ye NYAAY-SUTRAKAAR GAUTAM hain? Ya phir GAUTAM RISHI BHI DO KI SANKHYA ME HUE HAIN?

प्रिय

प्रिय आर्य
जहां चाह वहां राह |आपने चाहा तो आपने पा भी लिया |आषा है विद्वतगण आपकी इस जिज्ञासा का भी समाधान अवश्य करेंगे | शुभ कामनाएँ
आनन्द‌