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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (25)

इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः |
रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिम्पतिम् ||1||
ऋग्वेद 1|11|1||
पदार्थ -

हमारी ये, विश्वाः.............हमारी ये सब
गिरः..........................स्तुतियां
समुद्रव्यचसम्................जो आकाश में अपनी व्यापकता से परिपूर्ण ईश्वर, वा जो नौका आदि पूरण समग्री से शत्रुओं को जीतनेवाले मनुष्य
रथीनाम्.....................जिसमें पृथिवी आदि रथ अर्थात् सब क्रीड़ाओं के साधन, तथा जिसके युद्ध के साधन बड़े बड़े रथ हैं,
वाजानाम्....................अच्छी प्रकार जिनमें जय और विजय प्राप्त होते हैं, उनके बीच
सत्पतिम्.....................जो विनाशरहित प्रकृति आदि द्रव्यों का पालन करने वाला ईश्वर, वा सत्पुरुषों की रक्षा करनेहारा मनुष्य
पतिम्........................जो चराचर जगत् और प्रजा के स्वामी, वा सज्जनों की रक्षा करनेवाले और
इन्द्रम्........................विजय के देनेवाले परमेश्वर के, वा शत्रुओं को जीतनेवाले धर्मात्मा मनुष्य के
अवीवृधऩ्....................गुणानुवादों को नित्य बढ़ाती रहें ||1||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | सब वेदवानी परमैश्वर्ययुक्त सब में रहने सब जगह रमण करने सत्य स्वभाव तथा धर्मात्मा सज्जनों को विजय देनेवाले परमेश्वर और धर्म वा बल से दुष्ट मनुष्यों को जीतने तथा धर्मात्मा वा सज्जन पुरुषों की रक्षा करनेवाले मनुष्य का प्रकाश करती है | इस प्रकार परमेश्वर वेदवाणी से सब मनुष्यों को आज्ञा देता है ||1||

सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते |
त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ||2||
ऋग्वेद 1|11|2||
पदार्थ -

हे, शवसः................अनन्त बल वा सेनाबल के
पते.......................पालन करनेहारे ईश्वर वा अध्यक्ष !
अभिजेतारम्..............प्रत्यक्ष शत्रुओं को जीताने वा जीतनेवाले
अपराजितम्..............जिसका पराजय कोई भी न कर सके
त्वा.......................उस आप को
वाजिनः..................उत्तम विद्या वा बल से अपने शरीर के उत्तम बल वा समुदाय को जानते हुए हम लोग
प्रणोनुमः.................अच्छी प्रकार आपकी बार बार् स्तुति करते हैं, जिससे
इन्द्र......................हे सब प्रजा व सेना के स्वामी !
ते........................आप जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष के साथ
सख्ये.....................हम लोग मित्रभाव करके शत्रुओं वा दुष्टों से कभी
मा भेम...................भय न करें ||2||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा के पालने धर्मानुष्ठान से परमात्मा तथा शूरवीर आदि मनुष्यों में मित्रभाव अर्थात् प्रीति रखते हैं, वे बलवाले होकर किसी मनुष्य से पराजय वा भय को प्राप्त कभी नहीं होते ||2||

पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः |
यदि वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहतेमघम् ||3||
ऋग्वेद 1|11|3||
पदार्थ -

यदि...................जो परमेश्वर और सभा और सेना का स्वामी
स्तोतृभ्यः.............जो जगदीश्वर वा सृष्टि के गुणों की स्तुति करनेवाले धर्मात्मा विद्वान् मनुष्य हैं, उनके लिये
वाजस्य...............जिसमें सब सुख प्राप्त होते हैं उस व्यवहार, तथा
गोमतः................जिसमें उत्तम पृथिवी, गौ आदि पशु और वाणी आदि इन्द्रियां वर्त्तमान हैं, उसके सम्बन्धी
मघम्.................विद्या और सुवर्णादि धन को
मंहते..................देता है, तो इस
इन्द्रस्य...............परमेश्वर तथा सभा सेना के स्वामी की
पूर्व्यः..................सनातन प्राचीन
रातयः.................दानशक्ति तथा
ऊतयः.................रक्षा हैं, वे कभी
न......................नहीं
विदस्यन्ति............नाश को प्राप्त होतीं, किन्तु नित्य प्रति वृद्धि ही को प्राप्त रहती है ||3||

भावार्थ -

इस मन्त्र में भी श्लेषालङ्कार है | जैसे ईश्वर वा राजा की इस संसार में दान और रक्षा निश्चल न्याययुक्त होती है, वैसे अन्य मनुष्यों को भी प्रजा के बीच में विद्या और निर्भयता का निरन्तर विस्तार करना चाहिये | जो ईश्वर न होता तो यह जगत् कैसे उत्पन्न होता ? तथा जो ईश्वर सब पदार्थों को उत्पन्न करके सब मनुष्यों के लिये नहीं देता तो मनुष्यलोग कैसे जी सकते ? इससे सब कार्य्यों का उत्पन्न करने और सब सुखों का देनेवाला ईश्वर ही है , अन्य कोई नहीं, यह बात सब को माननी चाहिये ||3||

पुराम्भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत |
इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्र्ता वज्री पुरुष्टुतः ||4||
ऋग्वेद 1|11|4||

पदार्थ -

जो यह, अमितौजाः...........अनन्त बल वा जलवाला
वज्री............................जिसके सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाले शस्त्रसमूह वा किरण हैं, और
पुराम्..........................मिले हुए शत्रुओं के नगरों वा पदार्थों का
भिन्दुः.........................अपने प्रताप से नाश वा अलग अलग करने
युवा............................अपने गुणों से पदार्थों का मेल करने वा कराने तथा
कविः...........................राजनीति विद्या वा दृश्य पदार्थों का अपने किरणों से प्रकाश करनेवाला
पुरुष्टुतः.........................बहुत विद्वान व गुणों से स्तुति करने योग्य
इन्द्रः...........................सेनापति और सूर्य्यलोक
विश्‍वस्य.......................सब जगत् के
कर्मणः.........................कार्यों को
धर्त्ता...........................अपने बल और आकर्षण गुन से धारण करनेवाला
अजायत........................उत्पन्न होता और हुआ है, वह सब जगत् के व्यवहारों की सिद्धि का हेतु है ||4||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | जैसे ईश्‍वर का रचा और धारण किया हुआ यह सूर्य्यलोक अपने वज्ररूपी किरणों से सब मूर्तिमान् पदार्थों को अलग अलग करकने तथा बहुत से गुणों का हेतु और अपने आकर्षणरूप गुण से पृथिवी आदि लोकों का धारण करनेवाला है, वैसे ही सेनापति को उचित है कि शत्रुओं के बल का छेदन साम दाम और दण्ड से शत्रुओं को भिन्न भिन्न करके बहुत उत्तम गुणों को ग्रहण करता हुआ भूमि में अपने राज्य का पालन करे ||4||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (25)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)