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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मोक्ष विषय संबंधी प्रश्न

ॐ.... 100 वर्ष के जीवन मे किए कर्मों से अरबों वर्षों तक मोक्ष कैसे ?
मेरा प्रश्न यह है की जितनी मात्रा मे कर्म करते हैं क्या उतनी मात्रा मे ही कर्मफल मिलता है? मनुष्य निरन्तर कर्म करता है तो उसका कर्मफल प्राप्त करने हेतु इस लोक मे पुनः जन्म लेता रहता है । मनुष्य की कर्म करने की सीमा होती है। सामान्यतः मनुष्य 100 वर्ष की आय्यु रखता है तो परमेश्वर कैसे उसे अरबों वर्षो का कर्मफल अर्थात मोक्ष दे सकता है। मनुष्य को यदि कर्मफल ना मिला हो तो क्या कर्म के रहते उसे मोक्ष मिल सकता है। मोक्ष की प्राप्ति असम्भव प्रतीत होती है! कृपया ब्राह्मण जन उत्तर दें!!

कर्मफल

कर्मफल व्यवस्था गहन है, और इस तरह इ मेइल आदि से समज पाना लगभग असम्भव है. केवल एक ही जन्म का फल मुक्ति नहीं. वह तो कई मानव जन्मों का फल है. मोक्ष की प्राप्ति सम्भव प्रतीत तब हो सकती है जब उस पर‌ सम्यक् विचार किया जाये, अन्यथा नहीं.
= भावेश मेरजा

ॐ...theek hai jab koi guru

ॐ...theek hai jab koi guru milega to poochh lunga

प्रिय आर्य

प्रिय आर्य जी
बिना मुक्ति को जानें हम मुक्ति की बात अर्थात् मोक्ष की बात कैसे कर सकते हैं ? मुक्ति है दुखों से छूटना और दुःखों का कारण है प्रकृति से लगाव व परमात्मा से अलगाव | आत्मा स्वतंत्र है ध्यान प्रकृति की और लगाने में |प्रकृति के विसमयकारी रूपों में खो जाने में | पर चूँकि यह रूप अनित्य है अतः इनमें लगाव, सुख और दुख का कारण बनते हैं | अब जहां आत्मा के एक और प्रकृति है तो दुसरी और परमात्मा उपलब्ध है | जब जीव अपने ज्ञान , कर्म, तप‌ व भक्ति से प्रकृति के मोह से मुक्त हो जाता है तब ही वह परमात्मा से जुड़ जाता है , उसके अनन्त अनन्त गुणों में अनन्त आनन्द मे लीन हो जाता है | वह प्रभु असीम है अतः उसके साथ हुई मित्रता भी उसी महान सम्राट की तरह असीम न सही अथाह लम्बी तो अवश्य होगी | तो आप बताईये कि इसमें कौन से कर्मों का फल मुक्ति हुआ और कौन से कर्मों का फल प्रकृतिक भोग हुए, दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है ,इसीलिये मुक्ति के फल व सांसारिक भोगों के फल में भी उसी अनुपात में अन्तर आजाता है |मुक्ति में पूर्ण निर्मलता है सहजता है परमात्मा का सानिध्य है आनन्द ही आनन्द है जब कि भोगों मे तृष्णा ही तृष्णा है शान्ति का केवल नाममात्र ही है वास्तविक शान्ति नहीं है | आत्मा को अपने स्वरूप को समझने मे‍ कठिन तप , ज्ञान और् प्रभु भक्ति के लिये एक सौ वर्ष का जीवन नहीं अनेकों अनेकों जीवन में से गुजरना पढ़ता है | अपनी वृत्तियों को छोड़ने में उसे कितनी ही योनियों से गुजरना पढ़ता है तब जाकर वह कहीं मुक्त हो पाता है | तो भी यह असम्भव तो नहीं है | एक साधारण से उद्धाहरण से यह बात बिलकुल स्पष्‍ट हो जाती है | बालक को माता कुछ खिलोने दे देती है तो वह उन्हीं में अकसर खो जाता है ओर इस कारण खिलोनों के टुटने फूटने बिखरने आदि परसुखी और दुखी भी होता रहता है |और ऐसा सदा चलता रहता है, परन्तु यदि वह इन सब से दुखी होकर माता की गोदी में चला जाता है तो वहां अपूर्व आनन्द का अनुभव करता है, फिर उसे पता ही नहीं लगता कि कितना समय माता की गोदी में उसने बिता दिया |यही है मुक्ति | यदि खिलोनों से खेलते हुए भी वह‌ मता का ध्यान व विश्‍वास बनाये रखता है तो खेलते कूदते हुए भी माता के प्यार को आनन्द को पाता रहता है | इसलिए मुक्ति कोई असम्भव वस्तु नहीं, लेकिन् दुःखों से निवृति के लिए एक आवश्यक उपाय है |

ॐ...अति

ॐ...अति उत्तम आर्य्यश्रेष्ठ ! बस ऐसा ही उत्तर चाहता था । पूर्णतया संतुष्ट !!

Answer by respected Anandji

Answer by respected Anandji gives the impression that he has attained moksh.Because as he has said in his first line that without knowing moksh how can we talk about it . And as he is talking about moksh so beautifully he must have attained that magnificient state.

CONGRATULATIONS

ॐ...ललित जी

ॐ...ललित जी मुझे तो लगता था की मैं ही यहाँ मूर्खों की तरह बात करता था । फिर आपके इस comment से मेरे सोच मे बदलाव आ गया लगता है । आपके उक्त कथन में व्याजनिन्दा अलङ्कार है। अर्थात आपने पूज्य आनन्द बक्षी जी प्रशंसा नहीं अपितु निंदा की है । में बस इतना कहना चाहता हूँ कि प्रमाण कई प्रकार के होते हैं । आपका कहना कि "he must have attained that magnificient state." प्रत्यक्ष प्रमाण के अंतर्गत आता है । आपका कहना कि "without knowing moksh how can we talk about it " असत्य है क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण के अतिरिक्त भी प्रमाण होते हैं जैसे
[1]:-अनुमान प्रमाण [inference]- इसके भी तीन प्रकार होते हैं -{1}पूर्ववत । {2}शेश्वत । {3}आमान्यतोदृशत
[2]:-उपमान प्रमाण [analogy]
[3]:-शब्द प्रमाण [testimony(literally word)]- "the word of an aapta(altruistic teacher) is called shabda"_nyaay shastra.वेद सबसे बड़े शब्द प्रमाण हैं।
[4]इतिहास प्रमाण [history]
[5]अर्थापत्ति प्रमाण [conclusion]
[6]सम्भव प्रमाण [possibility]
[7]आभाव प्रमाण [absence or negation]
इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाण की अनुपस्थिति मे उक्त प्रमाणों का उपयोग किया जाता है ये प्रमाण गदबड़ियों से रहित होने चाहिए । पूज्य आनन्द जी ने प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं अपितु अन्य से कथन किया है ।

प्रिय आर्य

प्रिय आर्य ललित जी एवं बसन्त जी
नमस्ते

क्षमा कीजियेगा, लेकिन मुझे लगता है कि आप लोग सोते भी नहीं हैं | इतनी तड़प, इतनी कर्मठता यदि सही दिशा को प्राप्त कर लेती है तो वह सूर्य सम औजस्वी बन जाती है |मैं तो क्या इस साइट में सभी विद्वतगण यही आषा व विश्‍वास आवश्‍य रखते हैं, ऐसा मैं पूरे विश्‍वास के साथ कह सकता हूं | बाकी तो सब ईश्‍वर की कृपा पर भी निर्भर करता है | आर्य बसंत जी ने बिलकुल सही चित्रण किया है | सभी कुछ हम अनुभव कर सकते है, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, इसमें समय की कोई भी सीमा भगवान ने नहीं डाली है |आप्त पुरुषों के ग्रन्थ व उनका प्रत्येक वाक्य अनुभूत होता है, हमें उन्हें मानने, अपनाने व मनन्, चिंतन की महती आवश्यक्ता है | वेद आपौरषेय हैं ऐसा हमें ऋषि ने बताया है | अब यह तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम उसे अपने लिए अनुभव करने का प्रयास करें | केवल मानने मात्र से तो काम नहीं चल पाएगा | और ज्ञान की तो कोई सीमा नहीं है | ऋषियों के ग्रन्थ अमूल्य हैं वेद अनमोल हैं, बस हमारा प्याला ही छोटा है और वह भी कहीं कचरे से भरा हुआ| तो आइये क्यों न मिलकर हम अपने अपने व समाज के उद्धार के कार्यों में उसी प्रकार लग जाएं जैसा ऋषि दयानन्द हमें बता गये व सभी सन्त गण ,देवतागण हमें बता रहे हैं | ऋषि ग्रन्थों को हमें बार बार पढ़ना चाहिये, बस यही होगा हमारी सफलता का राज. आप पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी जी की इस बात का स्मरण करें जिसमें उन्होंने लिखा कि 'मैनें ऋषि दयानन्द जी के सत्यार्थ प्रकाश को 18 बार पढ़ा, और हर बार उसमें मुझे नई नई बातें मिलीं |'

ॐ...aapne jo kaha use

ॐ...aapne jo kaha use gambheerta se paalan karne ka prayatn karunga. Kripya sabhi is topic ko samaapt karen.

I had no intention to hurt

I had no intention to hurt or belittle anybody, but if that has happen I withdraw my comments. Specificaly I had no right to make such a comment for Basantji. I regret it.

I had no intention to hurt

I had no intention to hurt or belittle anybody, but if that has happen I withdraw my comments. Specificaly I had no right to make such a comment for Basantji. I regret it.

ॐ...atyant preeya mitr

ॐ...atyant preeya mitr lalit ji, aapne kuchh galat nahi kiya. Aapke comment ko pahli bar padha tha to mujhe peeda nahi apitu atyant sukh ki praapti hui thi kyonki aapne to mere paksh me comment kiya tha. Are aap to naaraj ho gaye lagte hain. Aapne kaha ''i had no right to comment on basant ji'' yah sunkar main to sharmsaaar mahsoos kar raha hun. Paramatma ki saugandh main is samay apko 'moorkh' kaha tha ispar khud ko guilty manata hun. Kshama karen mitravar ! ! ! ! ! Maine paap kiya hai . Meri antarchetna mujhe apse sar jhukake kshama yaachna karne ko kah rahi hai. PARANTU main maanta hun ki jis prakar dayanand ji ko guru ne danta tha tab unke mitr ki pratikriya par dayanand ji ne mitr ko guru shishya ke beech me na ane ko kaha tha usi prakar apko bhi nahi karna tha.

subodhkumar मित्र

subodhkumar
मित्रवर,
मुझे लगता है कि मै बहुत अभागा हूं. मुझे तो इस जीवन मे इतना कर्म अधूरा पडा दीखता है कि मुझे कभी मोक्ष का विचार अभी तक मेरी 76 वर्ष से अधिक आयु मे तो नही आता.
जब तक समाज मे, इतने कार्य करने की आवश्यकता अनुभव होती है कोइ भी अपने चार ऋणों , समाज ऋण, देव ऋण, ऋशि ऋण, पितृ ऋण (देखें शतपथ ब्राह्मण, ऋणम् जायते योSस्ति) ) से उऋण नही होता. मोक्ष की बात अपने लिए सोचना तो अपने कर्तव्यं से मुख मोडना सा और केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु लगता है.
यह मेरी तुच्छ बुद्धि मे आता है.
यह बात भी अप्रासंगिक न होगी कि वेदों मे कही मोक्ष शब्द का प्रयोग स्पष्टतया नही आया है. मोक्ष विषय तो उपनिषद वेदान्त काल की एक उपलब्धि है. वेद तो मानव को इस समाज संसार प्रकृति के प्रति अपना कर्तव्य निभाने के विषय पर ही मुख्य उपदेश करते हैं.

ॐ...ॐ...atyant

ॐ...ॐ...atyant aadarneey, atyant anubhavi , poojya subodh ji! Apki batein achhi lagi. Mujhe dharti me rahte hue akash me kya ho raha hai aisi jigyaasa nahi karni chahiye. Main kishor hun ab main kishoron ke sambandh me prashn avashyamev puchunga! . AAPNE 100% SAHI MARGDARSHAN DIYA. Apka dhanyavad. ISI PRAKAR ARYA SAMAJ KO BHI CHAHIYE KI BHARAT KI VARTMAN PARISTHITI KO DEKHKAR SAMAJ ME VYAPT KUPRATHAON KE PRATI VEDON KA TIVR PRAKASH KAREN. Jis prakar pyase ko sarvapratham paani pradaay karna chahiye na ki yog ki baten! Usi prakar ham sabhi ko kam se kam is website me SAAMAJIK CHAARITRIK RASTRADHARMIK SAMBANDHI ARTICLES ko hi sarvaadhik likhna chahiye. Note-main chhota munh badi bat kar raha hun uske liye kshama chahta hun!

मोक्ष का

मोक्ष का विचार नहीं आने का कारण यह हो सकता है कि व्यक्ति अविद्या ग्रस्त है. सत्यार्थ प्रकाश का नवम् समुल्लास एक बार ध्यान से देख लेवें. वैदिक सन्ध्या करने वाला व्यक्ति मोक्ष का विचार अवश्य ही करेगा. वेदों में मोक्ष शब्द के अयनाय आदि कई पर्याय शब्दों का प्रयोग किया गया है. मोक्ष विषय का वर्णन‌ स्वयम् वेदों में है. स्वामि दयानन्द रचित भाष्य भूमिका में मुक्ति विषयक प्रकरण पढ लेवें. भ्रम निवारण हो जायेगा.
= भावेश मेरजा