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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

‌ बन्धुआ मजदूर

क्या आप‌ बन्धुआ मजदूर तो नहीं ?
जी ! क्या कहा ? हा हा हा ! हम और बन्धुआ मजदूर ! क्या बात की आपने | वाह क्या मजाक उड़ाते हैं |हम क्या आपको मजदूर दीखते हैं और वह भी बन्धुआ मजदूर ? भाई ! हम तो अपनी मर्जी के मालिक हैं | अपना कमाते हैं अपना खाते हैं | हमें कोई कुछ थोड़े ही कह सकता है | हाँ मगर आपने यह कैसे समझा कि हम बन्धुआ मजदूर तो नहीं ?
जी ! आपकी भागदौड़ देखकर , आपके चैहरे पर लगी चिन्ता को देखकर , आपके म‌रे हुए उत्साह को देखकर‌ , आपकी छीना झपटी को देखकर | आपको कभी कुछ दान करते हुए नहीं देखा | आपको कभी किसी का भला करते हुए नहीं देखा | आपको कभी दुखियों के दुख बांटते हुए नहीं देखा , आपको कभी दुखिओं की दुर्दशा सम्भालते हुए नहीं देखा | और तो और आपको तो अब धर्म का नाम लेते हुए भी कभी नहीं देखा | भगवान का स्मरण किए बिना शायद आपका सारा जीवन व्यतीत हो गया है | क्या यह सब नहीं बताता कि कंही आप किसी घोर विपत्ती में फंसे हैं | वरना क्या आप अपने पिता , अपने दाता , अपनी माता , अपने गुरु अर्थात परमात्मा को ही भूल जाएं ?

हाँ आप सही हैं , पर फिर भी हम बन्धुआ कैसे हुए ?
जी ! आपको एक सुन्दर स्वस्थ रथ मिला | आपको एक सुन्दर ,स्वस्थ नगरी का राज्य मिला | आपको मन्त्री मिला | आपको सेवक मिले ताकि आप उनसे कार्य ले और अपनी प्रसन्नता और आनन्द की नित्य वृद्धि करें | परन्तु लगता नहीं कि आप इस और अग्रसर हो पा रहे हैं | लगता तो यही है कि वे ही आप पर हावी हो गए हें | आपके सेवकों को तो कार्य करते हुए देखा जा सकता है , प्रसन्नता भी आपके चेहरे पर कभी कभी दिखती है, पर आपकी अपनी पहचान उस चैहरे पर नहीं दिखती है | ऐसे लगता है कि आपकी अपनी बोलती तो बन्द हो गई है |
आपको बुद्धि मिली थी जिससे आप धर्म अधर्म को विचारते तथा अधर्म को अलग कर धर्म के कार्य करते | आपको मन मिला था जिसमें धर्म के अनुरूप शुभ संकल्प भरते , जिससे वह शरीर को शुभ कार्यों की और अग्रस‌र करता | आपको शरीर मिला था जिसमें उत्तम प्राण भरते , उत्तम खानपान ,उत्तम‌ जलवायु का ग्रहण करते | उचित व्यायाम से उसे तरोताजा रखते |
पर आपने इसमें से कोई भी कार्य नहीं किया | अब रथ‌ को चलाना तो था ही , नगरी का संचालन तो करना ही था , अत: धर्म अधर्म के विचारों के अभाव में जैसा विचार आया , जिससे काम चला , वह बुद्धि ने पास कर दिया | मन के शुभ अशुभ संकल्पों का ध्यान नहीं रखा गया | काम चलाने के लिये जैसा आया , मन बना लिया गया , ताकि काम चल जाए |इसी प्रकार शरीर में जो आया खाया पिया , व्यायाम की आवष्यक्ता ही न समझी प्राण ,अपान आदि की शुद्धि का ध्यान रखना तो दूर की बात रही |
इस सब के फलस्वरूप अधकचरे विचार , अधकचरे संस्कार बुद्धि व मन पर प‌ड़ते रहे | बुद्धि और मन उन्हीं के आधार पर शरीर को चलाते रहे |करते ,करते वह एक सुद्दड़ चट्टान की तरंह बन गये | अब तो उनको बदलने की सोच पाना भी आपके लिए सम्भव नहीं रहा | शरीर व्याधियों का शिकार हो गया , मन रोगी तथा बुद्धि भ्रष्ट हो गई | तो इस सबका कारण क्या बुद्धि है , मन है या शरीर ,या फिर शरीर की आवष्यक्त्ताएं ? नहीँ | आपने ही यह स्थिति उत्पन्न की हैं | अब यदि आप कहें कि मन नहीं मानता , शरीर साथ नहीं देता या बुद्धि उलटा विचारती है तो इसे किस प्रकार लिया जाए ? क्या आपने स्वयं अपने आप को मन , बुद्धि व शरीर के शकंजे में नहीं कस लिया ? क्या ये जड़ पदार्थ आपके बांधे जाने के लिये जिम्मेदार हैं अथवा आप स्वयं ? तो फिर आप बंधुआ मजदूर तो हुए ही वह भी किसी दूसरे के नहीं | स्वयं अपने ही हाथों द्वारा बने बंधुआ मजदूर |

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मै इस

मै इस वेवसाइट पर आर्यसमाज को ओर उसके बिचारौ को अच्छी तरह से समझ सकता हू /
धन्यवाद
अमिताभ आर्य‌

Pandit Lekh Ram was a great

Pandit Lekh Ram was a great warrior of Arya Samaj. He is to Arya Samaj what Guru Gobind Singh is to sikhism. He was a great preacher. It is still not properly known why & how he was murdered and who murdered him ? Om Tat Sat Hum.