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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सोमपान का फल

ओउम् | इमे सोमास इन्दवः सुतासो अधि बर्हिषि | ताँ इन्द्र सहसे पिब ||
ऋग्वेद 1|16|6

शब्दार्थ -

हे (इन्द्र) इन्द्र ! (इमे ये इन्दवः) आनन्द देनेवाले (सोमासः) सोम (बर्हिषि+अधि) आसन पर (सुतासः) कूटकर रखते हैं, (तान्) इनको (सहसे) बल के लिए (पिब) पान कर |

व्याख्या -

'सोम' एक औषधि का नाम है | इसके सम्बन्ध में सुश्रुत के चिकित्सास्थान में लिखा है कि इसके सेवन करने से कायाकल्प हो जाता है, वृद्ध पुनः युवा हो जाता है, किन्तु वेद में एक और सोम की भी चर्चा है , जिसके सम्बन्ध में लिखा है - सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन (ऋ. 10|85|3) = ब्राह्मणों को जिस सोम का ज्ञान है उसे कोई नहीं खाता | ब्राह्मण के सोम की महिमा इन शब्दों में है - अपाम सोमममृता अभूम (ऋ. 8|48|3) देखो हमने सोमपान किया और हम अमृत हो गये, या जी उठे |

कोई प्राकृत मनुष्य इसका उपयोग नहीं कर सकता | वेद कहता है - न ते अशनाति पार्थिवः (ऋ. 10|85|4) = पृथिवी-वासी, मिट्टी में लोट-पोट होनेवाला (प्राकृतिक विषयों का उपासक) उसका उपभोग नहीं कर सकता | सोम-बूटी की भी वेद में चर्चा है - सोमं मन्यते पपिवान् यत्संपिंषन्त्योषधिम् (ऋ. 10|85|3) ये औषधि‍-बूटी कूटते पीसते हैं, उसे सोम का पिया जाना मानते हैं | इस मन्त्र में दोनों प्रकार के सोमों के पान का आदेश है | बूटी-सोम बाहर-आसन पर - विशेषकर कुशासन पर बैठ कर कूटा,पीसा, छाना जाता है और आध्यात्मिक सोम ब्राह्मणों के ह्रदय में छनता है | सोमपान की जो विधि सुश्रुत-चिकित्सास्थान में लिखी है, उससे प्रतीत होता है कि वह बड़े परिश्रम से तैयार किया जाता है | ब्राह्मणज्ञेय सोम की दुःसाध्यता तो वेद ने ही बतला दी है | सामान्य जन उसका पान नहीं कर सकते |

सोम बूटी को सुश्रुत ने चौबीस प्रकार का बताया गया है | इधर जीव की शक्ति भी चौबीस प्रकार की ऋषि बताते हैं -

'बल, पराक्रम, आकर्षण, प्रेरणा, गति, भाषण, विवेचन, क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्‍च‌य, इच्छा, प्रेम, द्वेष, संयोग, विभाग, संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, स्वादन, गन्धग्रहण तथा ज्ञान - इन चौबीस प्रकार के सामर्थ्ययुक्त जीव है | इससे मुक्ति में भी आनन्द की प्राप्ति भोग करता है |" (स.प्र. नवम समुल्लास)

संसार के सभी पदार्थ वेद की परिभाषा में सोम हैं | भगवान् कहते हैं - हमने इस संसार में सोम तैयार किये हैं, जो वास्तव में सुखदायी हैं |

आनन्दघन प्रभु दुःखद पदार्थों का निर्माण क्यों करेगा ? तू - ताँ इन्द्र सहसे पिब = उनको बल के लिए पी | बूढ़े को जवान बनानेवाला अवश्य ही बलदायक होगा | अमृत करनेवाला निस्सन्देह बहुत बलवान होना चाहिए |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)

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ॐ...ati uttam aarya ! Apne ek naye Post me ise likhkar achchha kiya. Hamare desh ke VAIJYAANIKON AUR AAYYURVEDAACHAARYON KO SOM PAR GAHAN SHODH KARNI HI CHAHIYE !