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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया

एक अद्भुत वेदमन्त्र जो आपको नित्य परमात्मा की गोदी में बैठने का आवाहन करता है | आपको अपनी, अपने शरीर की व प्रभु की वास्तविक्ता से परिचय करवाता है | आइए देखें किस प्रकार -

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति ||1||
ऋग्वेद म.1| सू.164| म.20||

महर्षि दयानन्द जी ने इसके अर्थ इस प्रकार किये हैं -
(द्वा) जो ब्रह्म और जीव दोनों (सुपर्णा) चेतनता और पालनादि गुणों में सद्दश (सयुजा) व्याप्य व्यापक भाव से संयुक्त (सखाया) परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और (समानम्) वैसा ही (वृक्षम्) अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न भिन्न हो जाता है वह तीसरा अनादि पदार्थ इन तीनों के गुण, कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं (तयोरन्यः) इन जीव व ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस वृक्षरूप संसार में पापपुण्यरूप फलों को (स्वाद्वति) अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को (अनश्नन्) न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर बाहर प्रकाशमान हो रहा है | जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूप; तीनों अनादि हैं |

अन्यत्र इसका अर्थ इस प्रकार भी किया गया है -
(सयुजा) साथ रहने वाले (सखाया) मित्र के समान (द्वा) दो (सुपर्णा) पक्षी (समानम्) एक ही (वृक्षम्) वृक्ष को (परिषस्वजाते) आश्रय करते हैं (तयोः) उन दोनों में से (अन्यः) एक (जीवात्मा) (पिप्पलम् स्वादु) स्वादिष्ट फलों को (अत्ति) खाता है (अन्यः) दूसरा (अनश्नन्) न खाता हुआ (अभिचाकशीति) देखता है ||1||44|| (मुण्डकोपनिषद्)

जहाँ इस मन्त्र से ऋषि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आत्मा, परमात्मा व प्रकृति तीनो नित्य हैं, वहीं इस वेदमन्त्र को मानकर हम एक अद्भुत द्दृष्य देख पाते हैं | एक अद्भुत द्दृष्य हमें दिखाई देता है |

एक वृक्ष है जिस पर फल आदि लगे हैं | एक पक्षी अर्थात् चेतनता युक्त सत्ता उसके फलों का रसास्वादन कर रही है | तथा तीसरी एक अन्य चेत्तनायुक्त सत्ता जो इस पहले पक्षी की मित्र है, व्याप्य व्यापक भाव से उससे संयुक्त है, वह कर्मों के फलों को न भोक्ती हुई भीतर बाहर प्रकाशमान हो रही है |

यह हमारे ब्रह्माण्ड का वर्णन है | अब जैसा ब्रह्माण्ड है वैसा ही पिण्ड है, अर्थात् हमारा शरीर भी ब्रह्माण्ड का ही सूक्ष्मरूप है | अब देखें, इसमें यह वेदमन्त्र किस प्रकार घटता है, और इस मन्त्र को इस शरीर पर घटाकर हमें क्या दिखाई देता है | उपरोक्त मन्त्रानुसार इस लघु ब्रह्माण्ड में भी तीनों सत्ताएं होंनीं चाहिए ? तो क्या तीनों सत्ताएं इसमें हैं ?

तीनो ही सत्ताएं इसमें बहुत अच्छी प्रकार से विराजमान दीखती हैं |

शरीर है वृक्ष ; जीव अथवा आत्मा है वह पक्षी जो उसके फलों का रसास्वादन करता है ; और भीतर बाहर बैठा है परमात्मा जो केवल जीव को देखता है पर स्वयं भोक्ता नहीं है | वह स्वयं प्रकाशमान है व सबको प्रकाशित कर रहा है |

इस प्रकार हम जान गये कि हमारे शरीर में प्रकृति क्या है, हम क्या हैं और परमात्मा क्या है और तीनों इस लघु ब्रह्माण्ड में कहां हैं और क्या कर रहे हैं |
पक्षी यानि कि आत्मा नित्य इस फल से लदे वृक्ष का स्वाद चखता है | दिन भर वह इसमें या इसके द्वारा उपलब्ध फलों के स्वादों में खोया रहता है | अब रात हो जाती है तो इस पक्षी को अपने इस मित्र के पास वापिस लौट आना चाहिए | क्या वह वापिस आता है ? नहीं आता तो क्यों नहीं आता ? क्या इसे अपने मित्र का ध्यान ही नहीं है ? उस मित्र का जो इस वृक्ष को प्रकाशित कर रहा है , इसे आनन्द से भर रहा है ? जो उसे भी प्रकाशित कर सकता है | अब यदि यह अपने मित्र से नहीं मिलेगा तो क्या होगा ? यह वृक्ष एक समय तक के लिए इस रूप में रहता है, उसके पश्चात अपने मूल कणों में विभक्त हो जाता है | तब जब विभक्त हो जाएगा तो क्या होगा ? जीव किस अंग के पीछे भागेगा ? तो कितना अच्छा है कि इस परिवर्तन के समय में जीव अपने को अपने मित्र के, अपने प्रभु के आनन्द में विलीन कर दे | पर यदि उससे मित्रता कभी बनाई ही नहीं तो कैसे यह कर सकता है ? अब नित्य ही उसे फल खाने के साथ व बाद में किसी सहारे की, किसी साथी की भी आवश्यक्ता होगी, तो यह साथी जो वास्तव में उसका मित्र है उसके उसी शरीर में विद्यमान है, वह मित्र अति उत्तम मित्र है, उससे मित्रता में आनन्द ही आनन्द है, तो फिर वह उसे भूल कर अन्यत्र क्यों भागता है | भागने का कारण क्या यही नहीं है कि उसे अपने मित्र का, वास्तविक मित्र का पता ही नहीं ?

एक और बात जब फल जीव को इस वृक्ष द्वारा ही प्राप्त हेते हैं तो फिर वह बाहर नजरें गाढ़े क्यों बैठा रहता है | इन्द्रियों से, मन से, बुद्धि से उसे जो भी प्राप्त होता है वह इस शरीर के भीतर ही प्राप्त होना है तो दोनों, भोग के फल व मित्र इस शरीर के भीतर ही उसे मिलते हैं |

अब चूँकि वह बाहर फल खाने के लिए भागता है तो उसको परमात्मा रूपी मित्र भी बाहर ही तलाश करना पड़ता है, क्योंकि उसे भीतर कुछ झाँकने की आदत ही नहीं रह गई है , परन्तु बाहर उसकी पहुँच केवल वृक्ष की बाह्य इन्द्रियों द्वारा ही है सीधी नहीं, अतः उसे भगवान बाहर तो मिल सकता ही नहीं , केवल दिख सकता है, वह भी जब भीतर के नेत्र खुले हों|

अतः यह आवश्यक है कि जीव को प्रातः अपना कार्य अर्थात फलान्वेषण करने से पहले अपने मित्र को मिलना चाहिए, चूँकि वह ही अपने ज्ञान के प्रकाश द्वारा उसकी राहों को प्रकाशित करता है | इसी प्रकार दिनभर फलों का भोग करने के पश्चात फिर उसे वृक्ष को छोड़, अपने मित्र की शरण में, वापिस आ जाना चाहिए | और यदि वह ऐसा करता है तो जहाँ वह दिनभर फलों का रसास्वादन करता है वहीं पर रात्रि में वह अपने मित्र के संग वापिस आ अपनी दिन भर में एकत्र हुई सभी चिन्ताओं से मुक्ति पाता है, और यह कार्य वह सदा प्रातः साँय दोहरा सकता है | मित्र के संग बैठने पर उसे आनन्द भी प्राप्त होता है |

इसलिए निष्कर्ष यह निकलता है कि जीव प्रातः साँय सन्ध्या काल में प्रभु की गोदी में बैठे, जो कि भीतर उसके ही शरीर में विद्यमान है | फिर शरीर रूपी फलों का रसास्वादन दिन भर करें | दिन में भी आवश्यक्ता पड़ने पर प्रभु की सहायता के लिये अपने भीतर वह कभी भी झाँक सकता है | पर दो सन्ध्या काल के होते ही वह फलों को छोड़ मित्र की शरण में आवश्य लौटे ताकि उसे मित्र की आनन्दमयी मित्रता का आनन्द मिलता रहे | उस पर उस प्रभु की कृपा बरसती रहे | बरसती रहे | यह सब वैसे ही है जैसे नित्य पक्षीगण करते हैं | सारा दिन वे फल खाते हैं , साँय होते ही वे अपने अपने घोंसले पर वापिस लौट आते हैं | प्रातः होते ही घोंसले से बाहर झाँकते हैं और फल की तलाश में बाहर निकल जाते हैं | आब हम भी अपने घोंसले को जानें | सुबह शाम उसमें वापिस लौटें और सच्चा विश्राम पाएँ ||

ॐ...atyant sreshth Aarya !

ॐ...atyant sreshth Aarya ! Aadhyatmik aanand ! Upanishadon me shayad isi mantr par gahan vichaar karne ke baad vahaan kaha gaya hai ki JEEV JAB APNA AATM-SAAKSHAATKAAR KAR LETA HAI TO PARAMAATMAA KA SAAKSHAATKAAR BHI SWATAH(automatically) hi ho jaata hai.

I am very thankful to

I am very thankful to Aryaputra of aryasamajforumwise who tried to tell me the meaning of above vedmantra .
How much I could know is that gita tells for those who are Shruti parayanah . There are two Purushah , one purushah hi prakritishtho and the second as purushah hi parah , but in the same tree or the Kshetra . The one is feeling him as fruit eater , but, he if does not recognizes the second purushah as parmatma inside and takes everything as his purushartha , lives in vain ,on the other hand if he thinks otherwise and takes the Karm as Rope to attain the knowledge by the devotion as dhyan is a real person .