Warning: Table 'aryasi8x_db1.cache_page' doesn't exist query: SELECT data, created, headers, expire FROM cache_page WHERE cid = 'http://www.aryasamaj.org/newsite/node/110' in /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/database.mysql.inc on line 174

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/database.mysql.inc:174) in /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/bootstrap.inc on line 569

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/database.mysql.inc:174) in /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/bootstrap.inc on line 570

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/database.mysql.inc:174) in /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/bootstrap.inc on line 571

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/database.mysql.inc:174) in /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/bootstrap.inc on line 572
मूढामूढभेद‌ | Aryasamaj
Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मूढामूढभेद‌

warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/database.mysql.inc:174) in /home/aryasi8x/public_html/newsite/includes/common.inc on line 141.

ओउम |
आ यद्योनि हिरण्ययमाशुर्ऋतस्य सीदति |
जहात्यप्रचेतस: ||
ओउम् |
अभि वेना अनूषतेय क्षन्ति प्रचेतस: |
मज्जन्त्यविचेतस: ||

(ऋग्वेद 9.64.20,21)

शब्दार्थ :
आशु: = भोक्ता जीव
यत् = जब
ऋतस्य = ऋत की
हिरण्यम् = हितरमणीय , चमचमाती
योनिम् = योनी में , ठिकाने में
आ+सीदति = आ बैठता है
अप्रचेतस: = अ‌ज्ञ।नियों को
जहाति = छोड़ देता है
वेना: = बुद्धिमान , मेधावी , कमनीय महात्मा
अभि+अनूषते = अभिमुख होकर स्तुति करते हैं
प्रचेतस: = ज्ञ।नी , उत्तम , समझदार
इयक्षन्ति = य‌ज्ञ करते हैं , सत्संग करते हैं , प्रभु पूजा करते हैं
अविचेतस: = अज्ञ।नी , अचेत
मज्जन्ति = डूब मरते हैं
भोक्ता जीव जब ऋत की हितरमणीय ,चमचमाती योनी में , ठिकाने में आ बैठता है , तब वह‌ अ‌ज्ञ।नियों को छोड़ देता है | बुद्धिमान, मेधावी, कमनीय महात्मा अभिमुख होकर स्तुति करते हैं | ज्ञ।नी , उत्त‌म , समझदार य‌ज्ञ करते हैं, सत्संग करते हैं, प्रभु पूजा करते हैं और‌ अज्ञ।नी ,अचेत डूब मरते हैं |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :
इन दो मन्त्रों में ज्ञ।नी -अज्ञ।नी की निशानी बताई गई है | वेद के सीधे साधे हृदय तक पहुँचने वाले शब्द गम्भीर बात का कैसा सरल विवेचन करते हैं |
ज्ञ।नी की पहली निशानी यह है कि वह ऋत का , सत्य का , सृष्टि नियम का अनुगामी होता है | सृष्टिनियम के अनुगमन का फल उसे उत्तम अवस्था मिलती है | मूढ़ लोग सृष्टिनियम को जानते ही नहीं , न उसे जानने का यत्न करते हैं , जतलाने पर् उसे ग्रह‌ण करने की चेष्टा भी नहीं करते , अत: वह उनका संग छोड़ देता है |
बुद्धिमान की दूसरी पहचान यह है कि वह भगवान् की स्तुति करता है |ज्ञ।नीजन सदा य‌ज्ञ करते हैं | लोगों को ज्ञ।नदान , अन्नादि से तृप्त करते हैं | श्रेष्ठ पुरुषों की संगति करते हैं ,प्रभु पूजा करते हैं | ज्ञ।न का फल भी यही हे कि वह भले बुरे की पहचान करके भले का ग्रहण और बुरे का त्याग करे | जैसा कि वेद में कहा है ‍
चित्तिमचित्तिं चिनवद् वि विद्वान (ऋग्वेद 4.2.11)
विद्वान ज्ञ।न और अज्ञ।न की विशेष पहचान करे अर्थात पण्डित का कर्तव्य‌ है कि उचित-‍अनुचित‌ का यथायोग्य विवेचन करे | इसके द्वारा वह अपना व दूसरों का कल्याण कर सकेगा | मूर्खों में यह गुण नहीं होता अत: वे मज्जन्त्यविचेतस: , मूढ़, अचेत डूब मरते हैं |
ज्ञ।नी ही भवसागर से तरते हैं ,क्योंकि उन्होने तारने वालों से सख्य किया है, तारने के साध‌नों को सँभाल रखा है | मूर्ख जहाज की पेंदी में छेद कर रहा है | डूबेगा नहीं तो क्या होगा ?

(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)