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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

LOCATION OF INDIVIDUAL SOUL IN HUMAN BODY

Maharshi Swami Dayananda has written in his "Rigvedadi Bhashya Bumika" that God is to be found or experienced in the “hridaya-pradesh” (space in the heart-region) in the chest. This is mentioned in Hindi portion of the book, but not mentioned in its Sanskrit portion. Therefore, a few scholars believe that this statement appearing in the Hindi portion is not valid and genuine. But majority of Arya scholars are of the opinion that this statement made in Hindi is as valid as the Sanskrit portion.

However, we don’t find any other clear mention any where in Swami Dayananda’s works that the Individual Soul resides there in the said “hridaya-pradesh” (space in the heart-region).

Therefore, a controversy about the exact location of individual soul in human body still persists amongst the Vedic scholars. Recently Sri Acharya Anand Prakash (Arsha Sodha Sansthan - Aliabad) has written a small Hindi book “Sharir Men Jivatma ka Sthan” (location of individual soul in human body) of 44 pages on this issue in which he has tried to demonstrate that the individual soul resides in head in “Ajna Chakra”, and not in the chest region. In this book he has placed an essay on the same topic written by renowned scholar late Sri Pandit Yudhishthir Mimansak in support of his views.

Many other scholars of repute believe that whatever is written by Swami Dayananda in Hindi in this matter is absolutely correct.

The deliberations involved in this controversy are very serious in nature involving psychology, physiology, mysticism, Ayurveda, philology, grammar, logic, scriptural evidences, etc.

Learned persons may ponder over this issue and try to throw useful light on it.

= Bhavesh Merja

आदरणीय

आदरणीय भावेश जी
ऋग्वेदादि भष्यभूमिका में महर्षि ने इस प्रकार लिखा है -
"जिस समय इन सब साधनों से परमेश्वर की उपासना करके उसमें प्रवेश किया चाहें, उस समय इस रीति से करें कि .. (अथ यदिद.) कण्ठ के नीचे, दोनो स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो ह्रदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है, उसमें कमल के आकार का वेश्म अर्थात अवकाशरूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है | दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है |"

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि महर्षि ने परमेश्वर के खोजने के लिए उत्तम स्थान के रूप में ह्रदय देश् का वर्णन किया है | उन्होंने यह तो नहीं लिखा कि चुँकि आत्मा यहां निवास करता है इसलिए परमात्मा यहीं पर मिलेगा , अन्यत्र नहीं | इससे कहीं यह भी स्पष्ट होता है कि यह उत्तम स्थान है पर केवल यही एक स्थान नहीं है , अन्य सम्भावनाएं भी हो सकती हैं | जैसे महर्षि ने अन्यत्र यह भी लिखा है कि " हे उपासक लोगो ! तुम परमात्मा के योग से नाड़ियों में ध्यान करके परमानन्द को (वितनुध्वं) विस्तार करो |"
अब प्रश्न‌ यह भी उठता है कि क्या आत्मा एक ही स्थान पर बंधी है अथवा अपनी इच्छा से कहीं भी इस शरीर के भीतर जा सकती है ? क्या अष्टचक्रों में किसी भी एक स्थान पर आत्मा विराजमान नहीं हो सकती ? महर्षि के उपरोक्त लेख से इतना तो अवश्य निश्‍चित हो जाता है कि आत्मा के वास का भी श्रेष्‍ठ स्थान ह्रदयाकाश ही है, चूँकि वहीं उसे परमेश्‍वर के उत्तम रूप में दर्शन प्राप्त होते हैं | जहाँ बुद्धि में आत्मा के निवास का प्रश्न‌ भी आज के कुछ लोग व वैज्ञानिक उठाते हैं तो महर्षि ने जहाँ क्लेशों का वर्णन किया है , वहां 'अस्मिता' का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि "दूसरा क्लेश अस्मिता कहलाता है अर्थात जीव‌ और बुद्धि को मिले हुए के समान देखना ..."
तो इन बातों को ध्यान में रखते हुए ही, तथा योगियोंद्वारा अनुभूत ज्ञान द्वारा ही हमें आत्मा परमात्मा के बारे में कुछ निश्‍चय करना चाहिए, ऐसी मेरी अल्प बुद्धि कहती है |

subodhkumar

subodhkumar
आदरणीय आनन्द बक्षी जी का उत्तर बडा सटीक है. महर्षि की भाषा से मेरा ऐसा निष्कर्ष है कि हृदय देश मे खोजने से अनुभूति प्राप्त होती है. इसी प्रकार ध्यानावस्था मे त्रैत का अनुभव भी प्राप्त होता है. इस से अधिक कुछ भी कहना उचित न होगा.

As per Swami Ramswarup of

As per Swami Ramswarup of vedmandir.com soul resides in the left eye when we are awake, in the throat when we are dreaming and in the heart when we are sleeping.
We can put a question to him regarding the particular mantra which gives this knowledge.

ॐ...swami ramswarup also

ॐ...swami ramswarup also believes that HANUMAAN WAS A 'HUMAN' BEING . HE DO NOT BELIEVE THAT HANUMAAN WAS 'MONKEY'.THATS WHY I POSTED THE QUESTION HERE(ramayan me prakshep sambandhi prashn) AND YOU SAID THAT IT WILL NEED RESEARCH.

ॐ...please answer my

ॐ...please answer my question i posted in my blog -prem vivaah(love) marriage , arrange marriage or lust marriage. I think you all haven't seen my question yet ! Please go to 'BLOG'.ॐ...also you haven't answer my question i posted in 'FORUM' related to upanishads and shad-darshanaakar rishiyon ka itihaas. Sorry if i disturb you.

subodhkumar स्वाम

subodhkumar
स्वामी राम स्वरूप जी का कहना ठीक है. आत्मा एक सूक्ष्म रूप से सारे शरीर मे तो व्याप्त है ही.
जिस इंद्रिय की सक्रियता देखती है उसी के साथ सकृय हो ने लगती है. संस्कारों , उपासना सत्संग, स्वाध्याय इत्यादि से प्रभु कृपा से ही आत्मा का पुण्य रूप प्राप्त होता है. इस प्रश्न पर समय न लगाइये कि वह कहां रहता है. इस जीवन को समाज, परिवार, अपने लिए सफल बनाने के लिए अपने आत्मा को सुसंस्कृत करने की बात सोचें.

Individual soul being

Individual soul being infinitesimally small & subtle entity can never be present or pervaded throughout human body. To believe that it is available in the whole body is against Swami Dayananda's concept.

This question about the location of the soul is no doubt very hard to ascertain. A question however hard it may be is not entitled to be ignored or put aside. Our Vedic scholars have given thought on this question and we also should endeavor to think on this to the best of our ability.

= Bhavesh Merja

चूँकि

चूँकि आत्मा अति सूक्ष्म है अतः यह सारे शरीर में तो व्याप्त नही है, लेकिन यह शरीर में किसी भी स्थान पर विचरण करने में तो स्वतन्त्र है, जहां यह चाहे वहां विराजमान हो सकती है | जहाँ यह विराजमान होगी वहीं पर मन व बुद्धि भी केंद्रित हो जाएगी | यदि ऐसा नही है तो फिर इसे परमात्मा की खोज के लिए भी सहारे की आवश्यक्ता तो होगी ही परमात्मा को सही स्थान पर मिलने के लिए भी अन्य किसी की मदद की आवश्यक्ता पड़ेगी | जबकि ऐसा नहीं है | जब आत्मा परमात्मा से साक्षात्कार करती है, रूबरू होती है, मिलती है तब वह स्वयं मिलने के स्थल‌ पर विद्यमान होती है व उनके बीच में अन्य कुछ भी नहीं होता है, मेरे विचार में ऐसा ही महर्षि का मत है ? वेद ज्ञान से वह परमात्मा का साक्षात्कार करती है, फिर ज्ञान भी तिरोहित हो जाता है जब वह समाधी में लीन हो जाती है |

आप कहते हो

आप कहते हो कि आत्मा शरीर में किसी भी स्थान पर विचरण करने में स्वतन्त्र है, जहां यह चाहे वहां विराजमान हो सकती है |

तब तो उसको पता होना ही चाहिए कि मैं वर्तमान में शरीर में किस स्थान पर हूं| क्योंकि आपके कथन अनुसार वह 'जहां चाहे वहां' अर्थात् इच्छानुसार, स्वतन्त्रता पूर्वक अपना स्थान बदल सकती है|

= भावेश मेरजा

जब तक उसे

जब तक उसे अपना ही पता नहीं रहता , तब वह कहां है कैसे पता रहेगा ? अत: जब वह अपने आपको, अपने आसपास को अर्थात मन बुद्धि के अज्ञान को साफ ,स्वच्छ कर लेती है तब वह क्या कर रही है , क्या इच्छा कर रही है इसका पूरा ध्यान रहता है तथा उसे मन ,प्राण, बुद्धि चित्त पर नियंत्रण भी हो जाता है | देखिए कहीं कहीं तो यह भी लिखा गया है कि योगी परकाया प्रवेश भी कर सकते हैं , ऐसा सत्य है अथवा नहीं, लेकिन इससे इतना तो मानना कठिन नहीं है कि अपने शरीर में वह हर स्थल पर अपनी इच्छानुसार आनन्द् ले सकता है, विचरण कर सकता है | मन एक जड़् वस्तु है , अतः जो भी ध्यान अपना होता है वह आत्मा का ही है अन्य किसी का भी नहीं | जब हम प्राणायाम पूर्वक ध्यान को, प्राण को ह्रदय मे केन्द्रित करते हैं तब क्या हमें यह पता नही होता कि हम क्या कर रहे है ?