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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदों का मुख्य तात्पर्य

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' के 'अथ वेद विषय विचार' प्रकरण में लिखा है:

"तत्र अपि इश्वरानुभावो मुख्योस्ति"
"एवमेव सर्वेषां वेदानामीश्वरे मुख्येर्थे मुख्यतात्पर्यमस्ति"
"तत्प्राप्ति प्रयोजना एव सर्व उपदेशाः सन्ति"

"परमेश्वर ही वेदों का मुख्य अर्थ है, और उससे पृथक जो यह जगत है सो वेदों का गौण अर्थ है."
"सो इन दोनों में से प्रधान का ही ग्रहण होता है. इससे क्या आया कि वेदों का मुख्य तात्पर्य परमेश्वर ही की प्राप्ति कराने और प्रतिपादन करने में है."

= भावेश मेरजा

ॐ...हे

ॐ...हे आर्य्य! यदि मैं यह कहूँ कि वेदों का मुख्य उद्देश्य 'सुख' या 'आनन्द' की प्राप्ति है। तो इसमें क्या असत्य है?

एक ही बात

एक ही बात को अनेक प्रकार से, भिन्न भिन्न शब्दों में भी कही जा सकती है, परन्तु इससे व्यर्थ में सिद्धान्त भेद न हो इसका भी खयाल रख‌ना चाहिए.
= भावेश मेरजा

ॐ...आदरणीय

ॐ...आदरणीय भावेश जी! प्रणाम/\
'सुख' शब्द से ईश्वर प्राप्ति के सुख के साथ साथ अन्य का भी बोध होता है अर्थात् जैसे परोपकार करने पर होने वाला सुख, गर्मी की ऋतु में ठण्ड हवा से प्राप्त सुख इत्यादि। अतः वेद हर प्रकार के सुख प्राप्त करने का साधन है। केवल ईश्वर प्राप्ति हेतु का नही। अतः वेद का मुख्य तात्पर्य्य 'सुख' प्राप्ति होनी चाहिए।

कोई बात

कोई बात नहीं, आप अपने ढंग से इस बात को समज़ लेवें और सन्तुष्ट हो जावें.
= भावेश

ॐ...JO AAJYAA(AAGYAA)

ॐ...JO AAJYAA(AAGYAA)

अंग्रेजी

अंग्रेजी में कहावत है " All is well that ends well" अतः सुख व आनन्द उसी को कहेंगे जो अन्त में भी सुख ही दे | अन्त में दुख देने वाले किसी भी पदार्थ को इस‌ परिभाषानुसार सुखदायी अथवा आनन्ददायी नहीं कहा जा सकता | अतः क्षणिक सुख तो कदापि वास्तविक सुख की श्रेणी में नहीं आ सकता | अब रहा कि क्या है फिर वास्तविक सुख ? महर्षि दयानन्द जी को उद्दृत करें तो हम कुछ ऐसी परिभाषायें व नियम पाते हैं जो हमें हमारे मार्ग का सही सही दिग्‍दर्शन कराते हैं |आर्यसमाज के पहले नियम में उन्होंने लिखा "सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदिमूल परमेश्‍वर है |" इसको कुछ गहराई से विचारें तो पाएँगे कि सब सुख जो भी संसार में प्राप्त हैं वह सब परमेश्‍वर ही के कारण से हैं , अन्यथा कोई भी पदार्थ सुख का हेतु नहीं है| तो सुख किसी पदार्थ को समझना एक नासमझी की बात है | पदार्थ से सुख का हेतु उसमें व्याप्त परमात्म-तत्व है न कि पदार्थ | और यह सर्वत्र इसी प्रकार है| इस प्रकार मनन करने से आप पाएँगे कि परमात्मा ही सुख वा आननद का आधार है , अतः परमात्मा को पाना ही वेदों का वास्तविक ध्येय हुआ |

ॐ...प्रणाम

ॐ...प्रणाम आर्य्यश्रेष्ठ! आपने मेरी शङ्का दूर कर दी। अब मैं मानता हूँ कि ईश्वर ही वेदों का मूल तात्पर्य है।

धन्य‌वाद

धन्य‌वाद आर्य बसंत जी | पर हाँ अभी तो हम आर्य बनने की प्रक्रिया में हैं , आर्य बनना ही श्रेष्ठता का बहुत बड़ा पैमाना है तो आर्यश्रेष्ठ जैसे अलङ्करण केवल किन्हीं महान आत्माओं , महान सन्यासियों और हुतात्माओं के लिए ही सुरक्षित रहने चाहिये | कभी इन्हें हमारे मध्य अतीव विद्वानो के सत्कार हेतु ही प्रयोग करना चाहिए , ऐसा मेरा विचार है | आशा है सभी आर्यगण इस से सहमत होंगे | ‌ हम सभी अपार ऋणी है देव दयानन्द के जिन्होंने हमें सत्य मार्ग की कुङ्जी ही थमा दी |उनके ऋणों से हम कैसे उऋण हो सकते हैं, यह हमें नित्य विचारना चाहिए |

आनन्द‌