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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

बनिये की कमाई , चोर-डाकू ने खाई

ओउम् | समी प‌णेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु |
दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत ||

(ऋग्वेद 5.34.7)

शब्दार्थ :

पणे: = धर्म्मकार्य्य में भी व्यापारबुद्धि रखने वाले बनिए के
भोजनम् = भोजन के
मुषे = चोरी के लिए , चोर के लिए
ईम् = ही
सं+अजति = गति देता है
दाशुषे = दानशील को
सूनरम् = उत्तम , नेतृत्वयुक्त
वसु = धन
वि+ भजति = विशेष रूप से देता है
य: = जो
जन: = जन
अस्य = इसकी
तविषीम् = शक्ति को
अचुक्रुधत् = बार बार और अतिशय क्रुद्ध करता है
विश्व: = सारा जन
पुरु = बहुत बुरी तरहं
दुर्गे =दुर्ग , दुर्दशा में
चन = ही
आ+ध्रियते = सब और से धारा जाता है , मारा जाता है |

धर्म्मकार्य्य में भी व्यापारबुद्धि रखने वाले बनिए का भोजन , चोरी के लिए , चोर के लिए ही गति देता है | दानशील को उत्तम , नेतृत्वयुक्त धन विशेष रूप से देता है |जो जन इसकी शक्ति को बार बार और अतिशय क्रुद्ध करता है , वह सारा जन बहुत बुरी तरहं दुर्ग , दुर्दशा में ही सब और से धारा जाता है , मारा जाता है |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :

भगवान ने तुम्हें भोजन दिया है , उसे बाँटकर खाओ | केवल अपना पेट भरना ही खाना नहीं है , वरन् खानेवाला तो वेद के शब्दों में वह है , जो अन्नाभिलाषी को अन्नादि दे | यथा -
इद्रोजो यो गृहवे ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय (ऋग्वेद 10.117.3)
वही भोज: खानेवाला है जो अन्नाभिलाषी , अन्नार्थ विचरनेवाले दुबले पतले लेनेवाले को देता है | वेद बहुत मार्मिक शब्दों मे‍ कहता है -
पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यान् द्राघीयांसमनु प्श्येत प्न्थाम् (ऋग्वेद 10.117.5)
बलवान मनुष्य याचक को तृप्त ही करे , और दीर्घ मार्ग को देखे |वेद लुका छुपा के कुछ नहीं कहता ; सभी बातें खोलकर कहता है | उसने अति दीर्घ मार्ग का निर्देश कर दिया है -
ओ ही वर्तन्ते रथ्येवचक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त राय: (ऋग्वेद 10.117.5)
अरे ! धन रथ के पहियों के समान एक से दुसरे के पास जाते हुए वर्तते हैं अर्थात मत समझ कि धन सम्पति एक के पास रहती है | यह आसन बदलता रहता है | किसी दिन तुम पर भी ऐसे दिन आ सकते हैं , अत: पत्थरदिल मत बनो |
जो मनुष्य यह सोचता रहता है - इसे मैं क्यों अन्न दूँ , इससे मेरा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? वही पणि है और पणि के भोजन की दशा इसी मन्त्र में बतला दी है -
समी प‌णेरजति भोजनं मुषे = पणि = बनिए के भोजन की गति चोरी है | ऐसे मूर्ख की ताड़ना वेद बहुत कठोर शब्दों में करता है -
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य (ऋग्वेद 10.117.6)
वह मूर्ख व्यर्थ अन्न को प्राप्त करता है ! सच कहता हूँ , वह तो उसका वध है | यह सर्वथा सत्य है | ऐसे बनिए का धन जब चोर डाकू लेने आएगा तो धन के साथ प्राण भी ले जाएगा |भगवान की विधि देखो , भगवान महादानी है | जो कंजूस है , मानो भगवान की शक्ति को कुपित कर रहा है | अतएव दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु = वह अत्यन्त संकट में पड़्ता है , क्योंकि
अपणन्मर्डितारं न विन्दते (ऋग्वेद 10.117.1) = अदाता सुखदाता को नहीं पाता | उसके संकट में कोई उसका साथ नहीं देता है |

(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार‌)