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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेद मानवीय कृति ? Vedas being defamed

भोपाल वाले श्री आदित्य मुनि अपने गुरु श्री पंडित उपेन्द्र राव के मार्गदर्शन में आर्य समाज के वेद विषयक मूलभूत सिद्धांत के खंडन में लेख, पुस्तिकाएँ आदि प्रकाशित कर अपने परिचित आर्य सज्जनों को प्रेषित करते रहते हैं. पिछले कई वर्षों से उनके विचार बदल गए हैं, और वे चाहते हैं कि हम लोग उनकी बातें मान लें. वैसे उक्त दोनों ही व्यक्तिओं का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, वृद्ध हैं, फिर भी आर्य समाज के लोगों को भ्रमित करने में वे पर्याप्त सक्रिय रहते हैं. उन्होंने विशेष रूप से वेदों की पुनरुक्तियों के नाम पर वेदों को मानवीय कृति सिद्ध करने का अभियान चलाया है. ऋग्वेद के अघमर्षण मन्त्रों में कुछ भी दिव्य ज्ञान या विशेष कथन नहीं है, अथर्व वेद में घटिया बातें हैं, अथर्व वेद त्याज्य है, अर्वाचीन है, दूषित है, तान्त्रिकों का वेद है, ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र का रचयिता परमेश्वर नहीं हो सकता है, वेद ऋषिओं द्वारा रचित हैं, आर्य समाज के तीसरे नियम में अब सन्शोधन कर लेना चाहिए – इस प्रकार की बातें लिख रहें हैं. डॉ रामनाथ वेदालंकार, डॉ. रघुवीर वेदालंकार, स्वामी धर्मानंद सरस्वती, डॉ जयदत्त उप्रेती आदि कई आर्य वैदिक विद्वानों ने उनकी शंकाओं के समाधान प्रस्तुत किये, मगर वे किसी को कुछ नहीं समज़ते हैं. लगता है कि वे किसी भी समाधान से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं. ये दोनों ही व्यक्ति वर्षों तक सक्रिय आर्य समाजी रहें हैं और दोनों ने अच्छे कार्य भी किये हैं. मगर अब सत्य अन्वेषण के नाम पर या किसी अगम्य कारण से एकदम विपरीत मार्ग पर चलकर वेदों की निंदा में प्रवृत्त हो गए हैं. अब वेदों में उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं दिखाई देता, अधिकांश फालतू लगता है. स्वामी दयानंद अब प्रमाण नहीं रहें उनके लिए. इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है. संसार में ऐसा हुआ है, और होता भी रहेगा. व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है. हां, इस प्रकार के मिथ्या प्रचार से आर्य समाज और वैदिक धर्म की हानि अवश्य होती है.
= भावेश मेरजा

ॐ...aadarneey bhavesh ji .

ॐ...aadarneey bhavesh ji . Is soochna hetu dhanyavaad! Aap jaise sakreey vidvaano ke rahte ham jaise(new members) logon ko jyaada chinta karne ki avashyakta nahi hai. Aarya samaj mein sabke vichar ek jaise hone hi chahiye.

यह तो

यह तो मानवता के लिए दुख का विषय है कि बुढ़ापे में अपने ज्ञान को परिपक्व न करके वे वेदों की बुराई करने में संलग्न हो गये हैं | अब वे पाप के भागी तो अवश्य बनेंगे ही, दूसरों को गुमराह् करने के दोष से भी न बच पाएँगे |ऐसे व्यक्ति कोई तप नहीं करते हैं केवल पुस्तकें पढ़कर उपदेशक बनना चाहते हैं | अब बताइए यदि वेद मनुष्य के लिखे मान लिए जाँय तो फिर तो हर वेदमन्त्र का लिखने वाला ऋषि साक्षात परमात्मा हुआ ? क्योंकि किस मनुस्य में ऐसी समर्थ्य‌ है कि ऐसा एक भी मन्त्र लिख सके | इन्हे‍ पूछना चाहिए कि परमात्मा का नाम ओम् किस ऋषि ने दिया, गायत्री मन्त्र किस ऋषि ने दिया ? क्या वे भगवान थे अथवा इन जैसे ही थे? इन जैसे ही थे तो ये कोई नया गायत्री मन्त्र लिख दें , परमात्मा का ओम् से उत्तम नाम सुझा दें| तब हम इन्हें ही परमात्मा मान लेंगे |
जिस प्रभु ने प्रकृति बनाई क्या उसने उस उत्तम आकृति वाले मनुष्य को ज्ञान की कोई बू‍द भी नहीं दी? क्या उसे ऐसे ही बिना ज्ञान बिना शब्द भेज दिपा पृथिवी पर ठोकरें खाने के लिए ? क्या जो परमात्मा मनुष्य रूपी जटिलतम यन्त्र बना सकता है , वह उसका ज्ञान उस यन्त्र के प्रयोग करने वाले को नहीं दे सकता ? उसे बिना ज्ञान भेज देना क्या बुद्धिमानी का काम है ? क्या जो कहते हैं 'बिन गुरु ज्ञान नहीं' असत्य है ? क्योंकि यदि सत्य है तो फिर आदि गुरु कौन था ? यदि वह परमात्मा नहीं था तो यह उक्ति ही असत्य बैठती है |

आनन्द‌