Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (13/13)

(गतांक से आगे)

इस में विचारना चाहिये, कि वेदों के अर्थ को यथावत् बिना विचारे उन के अर्थ में किसी मनुष्य को हठ से साहस करना उचित नहीं, क्योंकि जो वेद सब सत्य विद्याओं से युक्त है, अर्थात् उनमें जितने मन्त्र और पद हैं, वे सब सम्पूर्ण सत्यविद्याओं के प्रकाश करने वाले हैं |और ईश्वर ने वेदों का व्याख्यान वेदों से ही कर रक्खा है, क्योंकि उनके शब्द धात्वर्थ के साथ योग रखते हैं | इसमें निरुक्त‌ का भी प्रमाण है, जैसा कि यास्कमुनि नें कहा - (तत्प्रकृतीत) इत्यादि | वेदों के व्याख्यान करने के विषय में ऐसा समझना कि जब तक सत्य प्रमाण, सुतर्क, वेदों के शब्दों का पूर्वापर प्रकरणों, व्याकरण आदि वेदाङ्गों, शतपथ आदि ब्राह्मणों, पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रों, और शास्त्रान्तरों का यथावत् बोध न हो, और परमेश्वर का अनुग्रह, उत्तम विद्वानों की शिक्षा, उनके सङ्ग से पक्षपात छोड़ के आत्मा की शुद्धि न हो, तथा महर्षि लोगों के किये व्याख्यानों को न देखें, तब तक वेदों के अर्थ का यथावत् प्रकाश मनुष्य के ह्रदय में नहीं होता | इसलिये सब आर्य्य विद्वानों का सिद्धान्त है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से युक्त जो तर्क हैं, वही मनुष्यों के लिये ऋषि हैं |

इससे यह सिद्ध होता है कि जो सायणाचार्य और महीधरादि अल्पबुद्धि लोगों के झूठे व्याख्यानों को देख के आजकल के आर्य्यावर्त्त और यूरोपदेश के निवासी लोग जो वेदों के ऊपर अपनी अपनी देश-भाषाओं में व्याख्यान करते हैं, वे ठीक ठीक नहीं हैं, और उन अनर्थयुक्त व्याख्यानों का प्रमाण करना योग्य नहीं | 'तर्क' का नाम ऋषि होने से सब आर्य्य लोगों का सिद्धान्त है कि सब कालों में अग्नि जो परमेश्वर है, वही उपासना करने के योग्य है |

..(भाषार्थ) - जगत् के कारण प्रकृति में जो प्राण हैं, उनको प्राचीन, और उस के कार्य्य में जो प्राण हैं, उनको नवीन कहते हैं | इसलिये सब विद्वानों को उन्हीं ऋषियों के साथ योगाभ्यास से अग्नि-नामक परमेश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी योग्य है | इतने से ही समझना चाहिये कि भट्ट मोक्षमूलर साहेब आदि ने इस मन्त्र का अर्थ ठीक ठीक नहीं जाना है |

..(भाषार्थ) - जैसे 'छन्द' और 'मन्त्र' ये दोनों शब्द एकार्थवाची अर्थात् संहिता भाग के नाम हैं, वैसे ही 'निगम' और 'श्रुति‍ भी वेदों के नाम हैं | भेद होने का कारण केवल अर्थ ही है | वेदों का नाम 'छन्द' इसलिये रक्खा है कि वे स्वतन्त्र प्रमाण और सत्यविद्याओं से परिपूर्ण हैं तथा उनका 'मन्त्र' नाम इसलिये है कि उनसे सत्यविद्याओं का ज्ञान होता है और 'श्रुति' इसलिये कहते हैं कि उनके पढ़ने, अभ्यास करने, और सुनने से सब सत्य विद्याओं को मनुष्य लोग जान सकते हैं | ऐसे ही जिस करके सब पदार्थों का यथार्थ ज्ञान हो उसको 'निगम' कहते हैं | इससे यह चारों शब्द पर्याय अर्थात् एक अर्थ के वाची हैं, ऐसा ही जानना चाहिये |

..(भाषार्थ) - वैसे ही अष्ट्हाध्यायी व्याकरण में भी छन्द, मन्त्र और निगम ये तीनों नाम वेदों ही के हैं | इसलिये जो लोग इनमें भेद मानते हैं उनका वचन प्रमाण करने के योग्य नहीं |

***** || इति वेदविषयविचारः || *****

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)