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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आर्य समाज के मंच पर युवकों की भूमिका ( लेखक ---श्री चिन्ता मणि वर्मा जी )

कोई भी जाति , धर्म या समाज रचनात्मक कार्यों के लिए
युवा वर्ग की ओर ही आशा भरी दृष्टि से देखता है । युवा वर्ग ही समाज को
उन्नत स्वरुप प्रदान करने में समर्थ होता है । अतः निश्चित रूप से यह कहा
जा सकता है कि आर्य समाज की उन्नति के लिए युवा वर्ग का सार्थक सहयोग
अनिवार्य है ।
आर्य समाज की उन्नति हो इसके लिए युवकों का सहयोग सर्वोपरि
है । यद्यपि वृद्धों के मार्ग दर्शन को नकारा नहीं जा सकता है तथापि
उनके द्वारा मार्ग दर्शन , बनाई गई योजनाएं तथा अन्य सारे कार्य कलाप
धरे के धरे रह जाएँगे जब तक कि युवक कार्य क्षेत्र में उतर कर उन्हें
कार्य रूप में परिणत न कर दें । अतः आर्य समाज के मंच पर युवकों की
भूमिका प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है ।
युवकों द्वारा, इस कार्य क्षेत्र में उतरने के पहले ,
कुछ आवश्यक तैयारियां भी होनी चाहिए । सर्व प्रथम उन्हें आर्य समाज को
समझना चाहिए , महर्षि दयानंद के मंतव्यों को समझना चाहिए , ऋषि के हृदय
में उठने वाली भावनाओं को समझना चाहिए , धर्म और जाति के प्रति श्रद्धा
भाव हृदय में होने चाहिए , वेद के महत्व को समझना चाहिए । नित्य कर्म ,
यथा --संध्या आदि नियम पूर्वक करने चाहिए, वेद एवं वैदिक साहित्य तथा
ऋषि दयानंद के ग्रंथों का स्वाध्याय करना चाहिए । अच्छे आचरण को धारण
करते हुए परोपकार की भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए । गायत्री मंत्र के
भाव को हृदय में धारण करते हुए स्वयं ईश्वर की प्रेरणा से शुभ कर्मों
को करना चाहिए । धर्म एवं जाति हित के कार्य करने के लिए दूसरों को
प्रेरणा देनी चाहिए । इस प्रकार आवश्यक तैयारियां करने के बाद ही कोई
नवयुवक आर्य समाज के कार्य- क्षेत्र में उतर सकता है ।
ऐसे युवकों की सर्व प्रथम भूमिका यह होगी कि वे नित्य
नियम पूर्वक स्नानादि करके संध्या करें । सुविधा हो तो हवन यज्ञ करें ।
उनका जीवन पवित्र हो और वे सदाचारी के रूप में , सत्यवादी के रूप में ,ईमानदार के रूप में, निर्लोभी के रूप में , परोपकारी के रूप में , समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने में समर्थ हों । जिससे लोगों को यह दिखाई दे सके कि अमुक युवक आर्य समाज के मंच पर जाकर किस प्रकार ईश्वर भक्त , सदाचारी एवं परोपकारी बन गया । इस प्रकार अपने आचरण मात्र से ही वह युवक आर्य समाज की प्रतिष्ठा बढ़ा देगा । जो युवक आर्य समाज के मंच पर उपस्थित हों , उन्हें स्वावलंबी होना चाहिए । वे अपने कारोबार में पूरी तरह सफल हों तथा किसी पर बोझ न बनें । तभी लोग उसे उच्च दृष्टि से देख सकेंगे । नहीं तो वह युवक दूसरों की हीन दृष्टि का शिकार हो जाएगा और आर्य समाज के मंच से वह जितना कार्य कर सकता है , उतना नहीं कर पाएगा ।
ऐसे नवयुवकों का अगला कदम यह होना चाहिए कि वे नियमित रूप से आर्य समाज के सत्संग में जाएं । वहां अपना जो कुछ कर्तव्य हो उसका निर्वाह करें। सत्संग द्वारा अपनी मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति करते हुए सत्संग की शोभा बढाएँ ।आर्य समाज के छोटे-छोटे रचनात्मक कार्यों को करना आरम्भ करें ।
युवकों को चाहिए कि वे अपने नजदीकी मित्र , सगे- सम्बन्धियों को संध्या करने कि प्रेरणा दें , हवन-यज्ञ करने की प्रेरणा दें । आर्य समाज के मंच पर उपस्थित नवयुवकों को स्वयं पाखंड से बचना चाहिए एवं किसी द्वारा भयभीत करने पर भी पाखंड में भाग नहीं लेना चाहिए । उन्हें वैदिक मार्ग का सदा ध्यान रखना चाहिए ।
ऐसे युवक जहाँ कहीं भी पाखंड को देखें , यदि संभव हो , बुद्धि बल हो तो प्रेम से विश्वासपात्र प्रेमी जनों को उस पाखण्ड से सावधान करना चाहिए और ऐसे पाखंडों से बचने का साहस उनमें भरना चाहिए ।
उत्साही नवयुवकों को चाहिए कि वे परिस्थिति को दखते हुए समझदारी पूर्वक सत्य धर्म की बातें , वेद की बातें लोगों को सुनाएँ , उनके हृदय में भरने का प्रयास करें ।
आर्य समाज के मंच पर उपस्थित नवयुवक किसी एक व्यक्ति पर अपना ध्यान केन्द्रित करे , उसे अपने साथ सत्संग में ले आए , उसके सुख -दुःख में साथ दे एवं प्रेम पूर्वक , सद्भावना पूर्वक उसे आर्य समाज के रंग में रंगने का सफल प्रयास करे । इस प्रकार जब एक व्यक्ति तैयार हो जाए तब उसे अन्य व्यक्ति पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ।
इस प्रकार यदि किसी एक युवक को आर्य समाज में लाने में एक वर्ष का समय भी लगता हो तो साल भर बाद एक की जगह दो , दूसरे साल चार , तीसरे साल आठ , चौथे साल सोलह और पाँचवें साल बत्तीस युवक तैयार हो जाएंगे ।इस तरह जहाँ आज एक नवयुवक है वहां पाँच साल बाद बत्तीस नवयुवक होंगे ।आर्य समाज का कार्य , वैदिक धर्म का प्रचार - प्रसार तेजी से होने लगेगा ।
यदि किसी नवयुवक को किसी दूसरे क्षेत्र में जाकर रहना पड़े तो उस क्षेत्र में उसे अपने यहाँ ही साप्ताहिक सत्संग आरम्भ कर देना चाहिए ।उसे अपने पास-पड़ोस के लोगों को प्रेम पूर्वक निमंत्रित करना चाहिए । उनके सुख -दुःख में भाग लेते हुए उसे वहां के लोगों के हृदयों में वैदिक धर्म का प्रकाश भरने का प्रयास करना चाहिए ।
आर्य समाज के मंच पर उपस्थित प्रत्येक युवक को किसी भी परोपकार के कार्य में , सामाजिक कार्य में , धार्मिक कार्य में ,सेवा कार्य में सावधानी पूर्वक आगे हो कर भाग लेना चाहिए । इस प्रकार लोगों में आर्य समाज के प्रति एक अच्छा दृष्टि कोण बनाने में रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए ।
आर्य समाज के मंच से धर्म- प्रचार , विद्या- प्रचार , सेवा - कार्य सम्बन्धी या अन्य जो कुछ भी योजनाएं बनाई जाएँ उन कार्यों की सफलता के लिए युवकों को पूरी लगन से लग जाना चाहिए ।
पूरी मानव जाति के हित के लिए , वेद प्रचार के लिए , मानव को दुखों से छुड़ाने के लिए , महर्षि दयानंद के सपनों को पूरा करने के लिए , आर्य समाज को संसार के कोने-कोने में पहुंचा देने के लिए , युवकों को कर्तव्यनिष्ठ हो कर प्रत्येक रचनात्मक कार्य में बढ़ -चढ़ कर भाग लेना चाहिए ।यही आर्य समाज के मंच पर युवकों की सार्थक भूमिका होगी ।

ॐ...PRERNAADAAYAK NIBANDH

ॐ...PRERNAADAAYAK NIBANDH HETU DHANYAVAAD AARYA!

युवको‍ को

युवको‍ को उत्तम प्रेरणा व मार्ग दर्शन व एक नयी राह की और इशारा | आशा है सभी आर्य युवक इसे गम्भीरता पूर्वक लेंगे | प. राम प्रसाद बिसमिल जी की आत्मकथा इसी और प्रेरणा देने में अत्यन्त सहायक है | सभी युवकों को वह अवश्य पढ़नी चाहिए |

आनन्द‌