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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

"लोकवत्तु लीला कैवल्यं"

वेदांत दर्शन में "लोकवत्तु लीला कैवल्यं" सूत्र आता है | (२.१.३३) इस सूत्र में "लीला" शब्द का अर्थ क्या लेना चाहिए, और पूरे सूत्र का क्या सत्यार्थ होता है - इस पर विचार करना उचित है | क्योंकि शांकर मतावलंबी लोग इस सूत्र का भिन्न अर्थ करते हैं और सृष्टि रचना का प्रयोजन ऐसा सिद्ध करते हैं, जो अधिक तर्कपूर्ण नहीं लगता | पढ़ते हैं कि महर्षि दयानंद जी ने अंतिम वेला में ईश्वर को संबोधित कर कहा था कि - "अहा ! तूने अच्छी लीला की !" इस उक्ति में "लीला" से क्या तात्पर्य लिया जाना चाहिए, इसका विचार भी अपेक्षित है | "लीला" का व्युत्पत्ति से क्या अर्थ होता है, यह जानना भी आवश्यक है | विद्वान लोग मार्गदर्शन करें - यही प्रार्थना है |
= भावेश मेरजा

ॐ..."वेदांत

ॐ..."वेदांत दर्शन में लीला का अर्थ है, जैसे लोक में =(
संसार में ) अनेक व्यक्ति अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं और लोगों को
प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार से ईश्वर ने भी संसार में सूर्य, चन्द्र,
पृथ्वी आदि पदार्थ बना कर उसमें अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करके
जीवात्माओं को प्रभावित किया है. यहाँ ईश्वर के द्वारा
प्रभावित करने का उद्देश्य है कि जीवात्माएं कैवल्य अर्थात मोक्ष की
प्राप्ति करें, इसलिए ईश्वर ने जगत में अपनी शक्तियों का प्रदर्शन किया है.
स्वामी दयानंद का अंतिम
वाक्य > " कि तूने अच्छी लीला की." यह वाक्य संदिग्ध है. पता नहीं
महर्षि जी ने यह वाक्य बोला भी था या नहीं. अनेक वक्ता ऐसे मन घडन्त बातें
भी कह देते हैं. यदि मान भी लिया जाये कि महर्षि जी ने यह वाक्य बोला भी
था. तो भी इसका अर्थ यह लगाना चाहिए, "कि ईश्वर ने तो सृष्टि बना कर अपनी
शक्ति का अच्छा प्रदर्शन किया, और हमने अपनी शक्ति के अनुसार ईश्वर की
आज्ञा का पालन किया. संसार को यथाशक्ति सुख दिया. अब हम शरीर छोड़ कर जा
रहे हैं, हमारे पीछे जो लोग बचे हैं, वे ईश्वर के उद्देश्य को पूरा करें.
अर्थात संसार को सुख देवें." ऐसा अर्थ महर्षि जी केवाक्य का लगाना चाहिए.
शेष कुशल.
स्वामी विवेकानन्द".
Uparokt vakya swami vivekanand parivrajak ji ne mujhe mail dwara prashn poochhne par diya.

बहुत

बहुत सुन्दर व सही अर्थ आपने दिया | जहाँ तक महर्षि के अन्तिम वाक्य के रूप में कहा जाता है कि उन्होंने यह वाक्य कहे - "अहा ! तूने अच्छी लीला की !" तो इसके साथ‌ यह भी जुड़ा हुआ माना जाता है कि "तेरी इच्छा पूर्ण हो" | यदि यह वाक्य ऋषि के मुख से निकले हैं तो इनका यह अभिप्राय भी स्पष्‍ट प्रतीत होता है कि ऋषि की आँखों के समक्ष अन्तिम समय में ईश्‍वर की महान कृति का द्दृष्य था, जिसमें वे अपने सम्पूर्ण जीवन में होने वाली विस्तृत चित्रावली को देख रहे थे, फिर उन्हें यह भी स्पष्‍ट लग रहा था कि अब इस देह को त्यागने की प्रभु की ही आज्ञा हो गयी है, तो उसे सहर्ष स्वीकारते हुए उन्होंने प्रभु की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए, अपनी देह को अपनी ही इच्छापूर्वक छोड़् दिया और देह छोड़ने से पहले उनके मुखारबिंद से यह भी निकला कि "तेरी इच्छा पूर्ण हो, अहा ! तूने अच्छी लीला की" |
यह् सब अतिश्योक्तिपूर्ण बिलकुल भी नहीं है, ऐसा उनके अन्तिम समय की निम्न चित्रण से स्पष्‍ट होता है |

"तदनन्तर बाहर से आये आर्य पुरुष महाराज के अन्तिम दर्शनार्थ उपस्थित हुए | स्वामी जी ने नेत्रों की कृपा कोर से उन्हें स्नेहसिक्त होकर देखा जो अद्‍भुत एवं अवर्णनीय था | म‌हाराज के मुख पर उस समय अपार धैर्य, अद्‍भुत शान्ति तथा मृत्युञ्जयता के भाव विद्यमान थे | पर्याप्त देर तक वे भक्‍त समुदाय से वार्तालाप करते रहे | अब अपराह्न के पांच बज गये | लोगों ने पूछा "श्रीमानों का चित्त कैसा है ?" उत्तर मिला "अच्छा है | तेज और अन्धकार का भाव है |" लोग कुछ समझे नहीं | साढ़े पांच बजे उपस्थित जन समूह को सामने से हट कर पीछे खड़े हो जाने का आदेश दिया | कमरे के सभी दरवाजे तथा छत के रोशनदान खुलवा दिये | पक्ष, तिथि एवं वार की जिज्ञासा की | उत्तर में किसी ने कहा - "कृष्णपक्ष का अन्त - अमावस्या और मंगलवार है |" यह सुनकर चतुर्दिक दृष्‍टिपात किया, पुनः वेदमन्त्रों का पाठ करने लगे | तत्‍पश्‍चात संस्कृत भाषा में परेश स्तवन किया | पुनः हिन्दी भाषा में दीर्घकाल तक परमात्मा का गुणानुवाद किया तथा उत्फुल्ल वदन गायत्री मंत्र तथा अपने प्रिय वेद‌मंत्र 'विश्‍वानि देव' का जलद् गम्भीर स्वर में, बहुत बार उच्चारण किया | किञ्चित् काल पर्यन्त समाधिस्थ रहे, पुनः आंखें खोली और अपने अन्तिम उदगार व्यक्‍त किये - "हे दयामय सर्वशक्‍तिमान् परमेश्‍वर, तेरी यही इच्छा है, तेरी यही इच्छा है, तेरी इच्छा पूर्ण हो, अहा, तूने अच्छी लीला की |" उस समय महाराज सीधे लेटे थे, करवट बदली और श्‍वास को रोक कर एक बार ही बाहर निकाल दिया | दयानन्द का अमर आत्मा पाञ्चभौतिक देह का परित्याग कर सर्वात्मा से जा मिला | महाराज की मानव लीला समाप्त हुई | ('नवजागरण के पुरोधा दयानन्द सरस्वती'से उद्‍धृत‌)