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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

हमारी आयु पहले से ही निश्चित है या नहीं ?

हमारी आयु पहले से ही निश्चित है या नहीं ? इस विषय में कई तरह के विचार सामने आते हैं:

अगर आयु पहले से ही निश्चित है, तो क्या जाति या योनि के आधार पर निश्चित है? अर्थात क्या ऐसा है कि ईश्वर के ज्ञान में, ईश्वर की योजना में मनुष्य योनि की आयु १००, १२५, ३०० या ४०० वर्ष में से जो भी हो, उतने वर्ष तो मनुष्य जीयेगा ही? फिर तो इस निर्धारित आयु के पहले मृत्यु होना संभव ही नहीं | और यदि ऐसा विकल्प मानकर चले कि उस निर्धारित आयु के पहले भी - बीच में अकस्मात, रोग आदि किसी भी कारण से मृत्यु हो सकती है, तो क्या ऐसा समज़ना ठीक है कि यह अकाल मृत्यु है? अकाल इसलिए कि वह अधिक (जितने वर्ष ईश्वर ने मनुष्य योनि कि आयु के लिए निश्चित किये हैं, इतने) जी सकता था, मगर किसी कारण से वह जल्दी मर गया? अगर ऐसा माने तो यही समज़ना पड़ेगा कि ईश्वर द्वारा निर्धारित मानव-आयु (१००, १२५, ३०० या ४०० वर्ष - जो भी हो) को छोड़कर जो भी व्यक्ति पहले मरण की शरण होता है, वह अकाल मृत्यु ही पाता है | काल मृत्यु तो तब ही मानी जाएगी जब व्यक्ति की मृत्यु ईश्वर-निर्धारित वर्ष पर ही हो - न पहले न बाद में | ऐसा ही विचार तब भी किया जा सकता है, जब हम यह माने कि प्रत्येक मनुष्य की आयु ईश्वर ने पहले से ही निर्धारित कर रखी है |

और अगर हम ऐसा माने कि ईश्वर भी वर्त्तमान में यह नहीं जानता कि कौन व्यक्ति कब मरने वाला है, मनुष्य प्राणी कभी भी मर सकता है - तो यही हुआ कि आयु अनिश्चित है | अर्थात मैं अब मरूँगा - यह आज अभी इसी वर्तमान क्षण में कोई भी नहीं जानता - यहां तक कि ईश्वर भी नहीं जानते ! मेरी मृत्यु कभी भी हो सकती है | ईश्वर केवल मेरा सम्पूर्ण भूतकाल तथा वर्त्तमान काल ही जानता है - भविष्य नहीं | - आयु के सम्बन्ध में क्या यह सोच ठीक प्रतीत होती है ? अगर ऐसा मान ले तो फिर किसी भी मृत्यु को अकाल या काल - कुछ भी नहीं कह सकते | क्योंकि मृत्यु किसी समय से पूर्व हुई या समय पर ? यह कहा ही नहीं जा सकता | पूर्व निर्धारित आयु की अपेक्षा से ही काल-अकाल कहा जा सकता है | जब पूर्व निर्धारित आयु को ही न माना जाए तो फिर काल-अकाल का प्रश्न ही नहीं रहता | और तब तो हमने आयु कम की या बढाई - यह भी कैसे कह सकते हैं ?

इस पर विद्वान मनीषी लोग तर्क-प्रमाण से अधिक विचार प्रकट कर इस विषय को समजने में सहायता प्रदान करे - ऐसी प्रार्थना !

= भावेश मेरजा

ॐ...saankhya ki drishti

ॐ...saankhya ki drishti mein JAATI, AAYYU AUR BHOG karmfal ke roop mein prapt hote hain. Aisa maine suna hai. Satyarth prakash ke anusar BRAHMACHARYA JISKA JITNA ADHIK HOGA VAH UTNA ADHIK SAMAY TAK JEEVIT RAHNE KI KSHAMTAA rakhta hai. I'm confused?

बिना

बिना प्रमाणों के ही मै अपने विचार केवल तर्क के आधार पर एक अन्य प्रकार से रखने की अनुमति चाहता हूँ | वैदिक शास्त्रों के आधार पर ईश्‍वर जीव व प्रकृति अर्थात तीन पदार्थ दुनिया में अनादि हैं इनमें प्रकृति तीन प्रकार के सूक्ष्म कणों (सत्, रज और तम्) से बनी है व यह कण संख्या में अनन्त हैं | आत्मा भी संख्या में अनन्त हैं | परमात्मा स्वयं में अनन्त है | अब परमात्मा का कार्य , चूँकि वह कण कण में व्याप्त है इस अनन्त प्रकृति के कणों को एक व्यवस्था में डालना, चलाना व फिर‌ उसका संहार करना है | अब आत्मा अथवा जीव जो अनन्त हैं वह क्या कर रहे हैं ? जीव अल्प है , लेकिन क्रियाशील है, चेतन है वह प्रकृति के कणों के साथ खेलना चाहता है, उनसे खिलवाड़ करना चाहता है और साथ में परमात्मा के स्नेह व आनन्द में गोते भी लगाना चाहता है |
अब यदि ऐसी ही यह सृष्‍टि है तो इस अनन्त सृष्‍टि को बिना वैज्ञानिक ढंग के समझे हम सही रूप मे नहीं जान सकते | किसी शास्त्र किसी कथा के आधार पर इसे नहीं माना जा सकता |सृष्टि के बनने पर प्रत्येक जीव को एक सूक्ष्म शरीर मिल जाता है इस सूक्ष्म शरीर के आधार पर ही वह इस संसार के पदार्थों के साथ व्यवहार करता है | यह सूक्ष्म शरीर सारे संस्कारों का स्टोर हाउस है | इसी में उसके द्वारा किये गये कर्मों का लेखा जोखा रहता है | यह मानना आज मुश्किल नहीं है कि इस सूक्ष्म शरीर में बहुत बड़ा लेखा जोखा रह सकता है, क्योंकि हम कमप्यूटर के क्षेत्र में ऐसा स्पष्‍ट अनुभव कर रहे हैं |

अब हम मुख्य प्रश्न पर विचार करते है | जब हमें यह मानव जीवन मिला है, तो पहले तो हमें यह मान लेना चाहिए कि यह एक यन्त्र है जो हमें मिला है, जिससे हम इस सृष्‍टि मे अनेकानेक कार्य कर सकते हैं | जैसे अन्य यन्त्र होते है , इसी प्रकार यह यन्त्र है, अन्तर इतना ही है कि इसे परमात्मा ने प्रकृति के मूल अवयवों से बनाया है | अतः अन्य यन्त्रों की तरह इसकी भी एक आयु सीमा अवश्य होगी और वह है भी, जैसा कि हम देखते भी हैं | यदि यन्त्र को ठीक प्रकार से प्रयोग न लाया जाय अथवा इसकी कहीं दुर्घटना न हो जाए तो यह यन्त्र अपने आधिकतम काल तक चल सकता है, अपनी सेवा दे सकता है | उसके पश्चात इसे बदलने में ही जीव का भला भी है अन्यथा वह वही कार्य बार बार कर के एक रुग्णता को प्राप्त कर लेता है, उसे बदलाव चाहिये, उसे नया चोला चाहिये | यह चोला बदलना कुछ कुछ वैसा ही है जैसे माँ बच्चे के कपड़े बदलती है | हर सुबह शाम तो बदलती ही है, किसी कारण से कट फट जाने अथवा मैला हो जाने की स्थिती में पहले भी बदल देती है | जैसे माँ को आभास होता है बच्चे का वैसे ही परमपिता परमात्मा को आभास होता है जीवों का, क्योंकि वह सृष्‍टि की जननी है | न अधिक न कम | यह कहना कि परमात्मा सब हिसाब देख‌ता रहता है किसने क्या खाया, क्या पिया, कब खाया, कैसे खाया आदि आदि यह उस हद तक ही ठीक है जैसे मां अपने हर बच्चे पर नजर रखती है | बस परमात्मा का कार्य संपूर्णता लिये होता है इतना ही अन्तर है | जैसे बालक कार्य करने में स्वतन्त्र है, वैसे ही जीव प्रभु की सृष्टि में कार्य करने की स्वतन्त्रता रखता है | अब जीव की आयु क्या होनी चाहिए ? जीव के पिछले किये सभी कार्यों का निचोड़ सूक्ष्म रूप में पल प्रतिपल उसके मन बुद्धि चित् पर अंकित होता रहता है तो उसी के अनुसार उसके कार्य की दिशा भी निर्धारित होती रहती है | अब यहाँ ध्यान देने की जो बात है, वह यह है कि जीव चेतन है और वह अपनी दशा व दिशा बदलने की क्षमता रखता है | अतः वह चाहे तो अपने गूढ़तम संस्कारों में परिवर्तन लाने की चेष्‍ठा कर उसे प्राप्त भी कर सकता है, अन्यथा लापरवाह हो अपने को दुनिया के प्रवाह में ही बहने दे सकता है | फल उसे जो मिलना है वह उसके सभी किये गये कार्यों और सृष्‍टि के नियमों, व्यवस्था का मिलाजुला परिणाम होता है, अन्यथा कभी भी नहीं हो सकता | परमात्मा के लिये मनुष्य का व अन्य किसी जीव का चोला बदलना कोई विशेष कार्य है , ऐसा तो नहीं माना जा सकता | ईश्‍वर अनन्त है , जीव अनन्त हैं, किसका हिसाब किस रजिस्टर पर लिखना होगा, कैसे लिखना होगा, कैसे फाइल को मैन्टेन करना होगा , यह मानव की अल्प सोच के कारण से हैं परमात्मा की विराटता में इनका कोई स्थान नहीं | तभी तो परमात्मा आनन्दस्वरूप है, वरना तो वह भी हिसाब रख रख कर परेशान हो जाता , कब पुराना रिकार्ड नष्‍ट‌ करना है, कब नये रजिस्टर खोलने हैं , इसी में उलझा रहता | ऐसा तो बिलकुल बिलकुल भी नहीं है | सृष्‍टि की विशालता को, परमात्मा की अनन्त‌ता को हमे‍ मूलरूप में समझने का प्रयत्न करना होगा और यही है ध्यान का मुख्य ध्येय |
अतः किसी की अकाल मृत्यु तब कही जाएगी, जब वह सृष्टि के साधारण नियमों के विपरीत दिखाई देती है अन्यथा तो यह भी सृष्‍टि की विशाल व्यवस्था व‌ परमात्मा की न्याय व्यवस्था के अन्तर्गत ही होता है |
इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड के एक अथाह प्रवाह में हम सब डुबकी लगा रहे हैं, ऐसा जान हमें परम आनन्द के मार्ग की खोज करनी चाहिए | जीवन प्रवाह‌ से अनादि है ऐसा जानकर हमें मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की और बढ़ना चाहिए |

मूल प्रश्न कि आयु पहले से निश्चित है या नहीं ? का उत्तर यही होना चाहिये कि लगभग जीवन की आयु सीमा निश्‍चित है, जिसकी सीमा पूर्व जन्म के कर्मों पर आधारित है, परन्तु यह सीमा मनुष्य के इस जीवन में किये जा रहे क्रियाकलापों के आधार पर अवश्य ही बदलती है | कितनी बदलती है ? यह सृष्‍टि की व्यवस्था के अन्तर्गत ही निर्भर करती है जो कि एक अत्यन्त गहन (complex) व्यवस्था का परिणाम है | कहते हैं न कि हमें सांसे गिनती में मिली है | अतः यदि यह सच है तो भी सांसों की गति तो हमारे हाथ में ही है, हम उसे तीव्र अथवा धीमे करके आयु को छोटा व लम्बा अवश्य‌ कर सकते हैं |

ॐ...apne uttar de diya!

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