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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - द्वितीय वल्ली (3)

(गतांक से आगे)
न नरेणावरेण प्रोक्ता एष
सुविज्ञे यो बहुधा चिन्त्यमानः |
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्य-
णीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ||8||

नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ |
यान्त्वमापः सत्यधृतिर्वतासि
त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ||9||

अर्थ - (अवरेण) साधारण (नरेश) मनुष्य से (प्रोक्तः) उपदेश किया (बहुधा) बहुत प्रकार से (चिन्त्यमानः) चिन्तन किया हुआ भी (एषः) यह आत्मा (सुविज्ञेयः, न) सुगमता से जानने योग्य नहीं है (अनन्य प्रोक्ते) ईश्वर के अनन्य भक्त के उपदेश किये हुए (अत्र) इस आत्मा में (गतिः, नास्ति)) सन्देह नहीं होता (अणुप्रमाणात्) वह आत्मा सूक्ष्म से भी (अणीयान्) अति सूक्ष्म है (हि) और निश्चय (अतवर्यम्) तर्क करने योग्य नहीं है ||8||

(प्रेष्ठ) हे प्रियत्तम नचिकेता ! (एषा) यह आत्म..ज्ञान विधायिका (मतिः) बुद्धि (तर्केण) तर्क से (न आपनेया)नहीं बिगाड़नी चाहिये (अन्येन, एव) आत्म..वित्त गुरु ही से (प्रोक्ता) उपदेश की हुई बुद्धि (सुज्ञानाय) उत्तम ज्ञान के लिए उपयोगिनी होती है |(त्वम्) तू (याम्) जिस बुद्धि को (आपः) प्राप्त हुआ है उससे (सत्य) निश्चल (धृतिः वत) धैर्य वाला (असि) है (नचिकेतः) हे नचिकेता ! (त्वादृक्) तेरे समान ही (नः) हमसे (प्रष्टा भूयात्) पूछने वाला हो ||9||

व्याख्या - जो लोग (अश्रेष्ठ) (अर्थात्) स्वयं श्रेय..पथगामी नहीं है वे यह मार्ग किसी को नहीं दिखा सकते परन्तु जो इस पथ के पथिक - ईश्वर के अनन्य भक्त हैं, उनके बतला देने पर किसी को भी सन्देह नहीं रहता | वह परमात्मा जो इस मार्ग (श्रेय) का लक्ष्य है वह सूक्ष्म से सूक्ष्म और निदिध्यासन (आत्मा से ग्रहण करने योग्य) का विषय होने से तर्क का विषय नहीं है | इसलिये इस विषय में तर्क काम नहीं दे सकता किन्तु तर्क-कुतर्क होने से बुद्धि का बिगाड़ने वाला होता है |

जानाम्य शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रवैः प्राष्यते हि ध्रुवन्तत् |
ततो मया नाचिकेतश्चितोग्नि-
रनित्यैर्द्रव्यः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ||10||

अर्थ - (अहम्) मैं (शेवधिः) धन, ऐश्वर्य (अनित्यम्) अनित्य है (इति जानामि) ऐसा जानता हूं (हि) निश्चय (अध्रुवैः) अस्थिर साधनों से (तत्) वह (ध्रुवम्) अचल आत्मा (न, प्राप्यते) नहीं प्राप्त किया जाता है (ततः) इसलिये (मया) मैंने (नाचिकेतः अग्निः) नचिकेत अग्नि का (चितः) चयन किया है (और फलेच्छा रहित होकर) (अनित्यैः द्रव्यैः) अनित्य पदार्थों से (नित्यम्) नित्य ब्रह्म को (प्राप्तवान् अस्मि) परम्परा से प्राप्त हुआ हूँ ||10||

व्याख्या - जब यज्ञ, फल विशेष की कामना से किया जाता है तब वह उसी अनित्य फल का अनित्य साधन हुआ करता है परन्तु जब वही यज्ञ निष्कामता के साथ फल को ईश्वर के अर्पण करके किया जाता है तब वह अनित्य होते हुए भी नित्य ईश्वर प्राप्ति के साधनों में से एक हो जाता है | यम ने इसी दूसरे प्रकार के यज्ञ द्वारा ईश्वर की प्राप्ति का संकेत इस उपनिषद्वाक्य में किया है |

काम्स्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठाँ
क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् |
स्तोमं महदुरुगायं प्रतिष्ठाँ
दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोSग्यस्त्राक्षी ||11||

(नचिकेतः) हे नचिकेता ! (कामस्य) भोग सम्बन्धी कामनाओं की (अप्राप्तिम्) प्राप्ति को (जगतः) जगत की (प्रतिष्ठाम्) प्रतिष्ठा को (क्रतोः) यज्ञादि के (आनन्त्यम्) फल को (अभ्यस्य) लौकिक निर्भीक्ता की (पारम्) पराकाष्ठा को (स्तोमं महत्) स्तुति योग्य महिमा और (प्रतिष्ठाम्) प्रतिष्ठा को (उरुगायम्) (बहुधा मनुष्य जिनका) गीत गाते हैं (दृष्टवा) (असार) देखकर (धृत्या) स्थिरता के साथ (अत्यस्त्राक्षीः) छोड़ दिया (इसलिए तू) (धीरः) धीर है ||11
व्याख्या .. संसार के भोग की कामना आदि, जिनका इस लोक में जिक्र है, सामयिक और आल्पकालिक हैं परन्तु ब्रह्मप्राप्ति का सुख चिरकालिक है इसलिए नचिकेता ने इस दूसरे के लिए पहले (सांसारिक सुख) को छोड़ दिया |

(क्रमशः)