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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

डॉ० भवानीलाल भारतीय जी के लेखों की सुरक्षा

डॉ० भवानीलाल भारतीय जी के लेखों की सुरक्षा

पिछले कुछ दिनों से हमें एक विचार कुछ चिंता के साथ बार बार आकर सता रहा है कि आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध विद्वान्‌, ऋषि दयानंद के इतिहास के अनन्य उद्घाटक एवं सिद्धहस्त लेखक डॉ० भवानीलाल भारतीय जी द्वारा पिछले करीब ४०-५० वर्षों के दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे गये सैंकड़ों लेखों का भविष्य क्या होगा? वैदिक धर्म, आर्यसमाज एवं ऋषि दयानंद आदि के विषय में उन्होंने अपने उन लेखों में जिस प्रकार के लेखन कौशल का अद्भुत चमत्कार उपस्थित किया है, वैसा चमत्कार दिखाने वाले दूसरे भारतीय जी हमें आने वाले कई कई वर्षों तक प्राप्त होने वाले नहीं हैं। वर्तमान में आर्यसमाज में शास्त्रीय अध्ययन, स्वाध्याय तथा प्रामाणिक खोजपूर्ण लेखन कार्य की प्रवृत्ति बिलकुल ही प्रशंसनीय नहीं है। ऐसे हालात में हम सभी आर्यों का यह पुनित कर्तव्य बनता है कि भारतीय जी द्वारा लिखे गये उन सभी प्राप्य लेखों को सुरक्षित रखने की दिशा में हम कोई सार्थक प्रयास करें। उनके अधिकांश लेख तो आर्यसमाज की ही पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए होंगे। अतः ऐसे लेखों का संग्रह करने में कोई विशेष परिश्रम की अपेक्षा नहीं रहेगी। अधिक संभावना तो इस बात की है कि उनके बहुत सारे लेख तो स्वयं भारतीय जी के पुस्तक संग्रह ही में उपलब्ध होंगे। उन सारे लेखों को प्राप्त कर फिर संपादन कला में दक्ष किसी सुयोग्य आर्य विद्वान्‌ द्वारा उन लेखों को आवश्यकता अनुसार संकलित कर, संक्षेप में टिप्पण आदि देकर वेद, वैदिक संस्कृति, वैदिक साहित्य, आर्यसमाज, ऋषि दयानंद, साहित्य मीमांसा आदि विभिन्न विभागों में उन लेखों को बांट कर उत्तम प्रकार से संपादित कर २-३ या अधिक खंडों में प्रकाशित किये जा सकते हैं। ऐसा करने से ही भारतीय जी के उन बहुमूल्य लेखों को सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। इस कार्य में संपादक स्वयं भारतीय जी से ही सर्वोत्तम मार्गदर्शन व दिशा निर्देश प्राप्त कर सकते हैं। भारतीय जी के लेखों का ऐसा संग्रह आर्यसमाज के वर्तमान एवं भावी प्रचारकों, लेखकों, नीति-निर्धारकों तथा ऋषि दयानंद के इतिहास के अध्येताओं को अनेक दृष्टि से बहुत लंबे काल तक निःसंदेह लाभान्वित कर पायेगा। क्योंकि उन्होंने अपने लेखों में जो कुछ लिखा है, वह प्रमाण पुरस्सर लिखा है, स्पष्ट लिखा है, आर्य मंतव्यों की स्थापना, आर्यसमाज की प्रतिष्ठा एवं इतिहास की सुरक्षा के लिये लिखा है, और अत्यंत शिष्ट एवं रोचक शैली में लिखा है। उनके लेखों में सर्वत्र ऋषि दयानंद तथा आर्यसमाज के प्रति उनका समर्पण भाव झलकता है। ऋषि दयानंद तथा आर्यसमाज के आलोचकों की बातों का निराकरण करने का उनका ढंग ही निराला है। उनके विद्वत्तापूर्ण लेखों के बल पर, उनके विचार प्रवाह और उनके द्वारा प्रयुक्त युक्तियों का संबल प्राप्त कर हम लोग हमारे कई भावी आलोचकों के कुतर्कों तथा हेत्वाभासों का सशक्त प्रतिवाद कर पायेंगे। भले ही उनके सारे लेखों का समावेश अनेक खंडो में संभव हो पाये, फिर भी यह काम हमारे लिये - आर्यसमाज के लिये वास्तव में करणीय है। ओर यह कार्य जितना शीघ्र हो सके उतना ही श्रेयस्कर है। हम आशा करते हैं कि आर्यसमाज की समर्थ सभाएं, गुरुकुल एवं प्रकाशन संस्थाएं, आर्य श्रेष्ठी लोग एवं ठोस - प्रामाणिक आर्य साहित्य के सृजन के लिए सदैव चिंतित रहने वाले हमारे आर्य विद्वान्‌ इस बात पर सम्यक्‌ चिंतन करेंगे, ताकि कोई सामर्थ्यवान्‌ आगे आकर इस पावन कार्य को मूर्त रूप देने की दिशा में आगे बढ़ सकें। भारतीय जी के लेखों की तरह ही हमें हमारे एक ऐसे ही दूसरे महान्‌ लेखक प्रा० राजेन्द्र जी 'जिज्ञासु' के महत्त्वपूर्ण लेखों के बारे में भी ऐसा ही प्रबंध करने की चिंता करनी होगी। कोई समर्थ आर्य व्यक्ति या सभा-संस्था इस दिशा में कुछ करने का संकल्प - आयोजन करें, केवल इसी आशय से यह निवेदन किया है।
= भावेश मेरजा