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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साप्ताहिक साधारण सभा में हवन ?

'आर्य समाज के साप्ताहिक सत्संगों में हवन करना चाहिए' - इस प्रकार का आदेश १८७५ में मुंबई में निर्धारित नियमों में एवं १८७७ में लाहोर में निर्धारित उपनियमों में कहीं पर भी नहीं है। प्रति सप्ताह आर्य समाज की साप्ताहिक साधारण सभा में सब इकटृठे होकर क्या करें, इस संबंध में लिखा गया है -

(१) ''इकटृठे होकर सर्वथा स्थिर चित्त हो, परस्पर प्रीति से पक्षपात छोड़कर प्रश्नोत्तर करें। फिर सामवेदादि गान, परमेश्वर, सत्य-धर्म, सत्यनीति तथा सत्योपदेश के संबंध में बाजा आदि के साथ हो। और इसी विषय पर मन्त्रों का अर्थ और व्याख्यान और फिर गान हो, इत्यादि।'' (आर्य समाज के नियम, बम्बई, १८७५, क्रम ११ )

(२) ''साप्ताहिक साधारण सभा - (क) यह सभा प्रत्येक सप्ताह में एक वार हुआ करेगी। (ख) उसमें वेद मन्त्रों का पाठ, उपासना, भजन, कीर्तन और व्याख्यान हुआ करेंगे।'' (आर्य समाज के उपनियम, लाहौर, १८७७, क्रम ८) यहां हवन करने की बात नहीं कही गई है।

तब इस बात का अन्वेषण होना चाहिए कि हमारी साप्ताहिक सभाओं में (‘सत्संगों’ में?) हवन का प्रचलन नियमित रूप से कब से और कैसे आरम्भ हुआ ? और सामवेदादि गान का प्रचलन आज तक क्यों नहीं हो पाया?

= भावेश मेरजा

नमस्ते श्री मान जी ,
जब स्वामी दयानंद ने मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की तब २८ नियम बनाए गए थे ।ग्यारहवें नियम में सामवेदादि गान का उल्लेख है ।चौदहवें नियम में वेदोक्त प्रकार से अद्वितीय परमेश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना करने का उल्लेख है ।परन्तु हवन यज्ञ करने का कहीं भी उल्लेख नहीं है ।
जब २४ जून १८७७ को आर्य समाज लाहौर की स्थापना हुई तब स्वयं महर्षि दयानंद ने पहले ईश्वरोपासना की और फिर हवन यज्ञ हुआ ।तत्पश्चात नियमपूर्वक आर्य समाज लाहौर की स्थापना हुई ।इसी अवसर पर आर्य समाज के १० नियम स्वीकार किए गए ।
१२ अगस्त १८७७ को आर्य समाज अमृतसर की स्थापना हुई ।तब भी स्वामी दयानंद सरस्वती ने स्वयं ईश्वरोपासना एवं हवन यज्ञ करवाया था ।
और आज तक आर्य समाज के साप्ताहिक अधिवेशन या साप्ताहिक सत्संग इसी प्रकार होते चले आए हैं ।
अतः यह स्पष्ट ही है कि साप्ताहिक अधिवेशनों में हवन यज्ञ प्रारंभ से होता चला आ रहा है यद्यपि इसका उल्लेख नियमों में नहीं है ।
परन्तु जिन महापुरुष की कल्पना का साकार रूप है ------आर्य समाज , उन्हीं के द्वारा आरम्भ से ही साप्ताहिक सत्संग में हवन यज्ञ होते चला आया है ।
रह गई साम गान की बात ।
स्वामी दयानन्द की जीवनी में ऐसा आया है कि एक बार दक्षिण भारत के दो व्यक्ति आए थे जिनका साम गान सुनकर स्वामी जी अत्यंत प्रसन्न हुए थे । स्वामी जी ने उन्हें पुरस्कृत भी किया था ।
स्वामी दयानंद सरस्वती स्वयं भी मधुर स्वर में साम गान करते थे ।
परतु आज तक आर्य समाज के सत्संगों में साम गान का न होना अवश्य ही एक बहुत बड़ी कमी है ।आप ने इस और ध्यान आकर्षित किया हैं ---------यहअच्छी बात है ।
इस विषय से सम्बंधित व्यक्तियों,कार्यकर्ताओं और आर्य समाज के पदाधिकारियों को इस और ध्यान देना चाहिए ।

यह टिपण्णी श्री चिंता मणि जी की है ।
विभा