Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Praatahkaaleen Mantraah

प्रातःकालीन मंत्राः

प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना ।
प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातस्सोममुत रुद्रं हुवेम ॥

प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता ।
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥

भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः ।
भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम ॥

उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्‌नाम्‌ ।
उतोदिता मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ॥

भग एव भगवां अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम ।
त्वं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुर एता भवेह ॥

- ऋग्वेद : मण्डल ७, सूक्त ४१, मंत्र १-५

ॐ..प्रणाम/\

ॐ..प्रणाम/\ uttam hai

subodhkumar और

subodhkumar
और सुंदर होगा यदि वेद मंत्रों के प्रस्तुति करण के साथ साथ उन मंत्रों का भाष्य जो अपनी सरल समझ में आता है वह भी जन साधारण की वेदों मे रुचि सुदृढ करने के लिए दी जाए. केवल मंत्र पाठ से उस के अर्थ भी जानना महत्वपूर्ण है.
यद्यपि महर्षि देव दयानंद का किया इस सूक्त
का भाष्य सौभाग्य से उपलब्ध है, तब भी उसे और विस्तार से प्रस्तुत करने का प्रयत्न होना चहिये.
आशा है कि आदरणीय भावेश जी इस विषय को आगे बढाने मे भी सहायता करेंगे.