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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

गायत्री मन्त्र का अर्थ

गायत्री मन्त्र का अर्थ

ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥
-यजु. ३६.३

अर्थ -
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग
भूः-कर्मकाण्ड की विद्या,
भुवः-उपासना काण्ड की विद्या और,
स्वः-ज्ञानकाण्ड की विद्या को संग्रहपूर्वक पढ़के,
यः-जो,
नः-हमारी,
धियः-धारणावती बुद्धियों को,
प्रचोदयात्‌-प्रेरणा करे उस,
देवस्य-कामना के योग्य,
सवितुः-समस्त ऐश्वर्य के देनेवाले परमेश्वर के,
तत्‌-उस इन्द्रियों से न ग्रहण करने योग्य परोक्ष,
वरेण्यम्‌-स्वीकार करने योग्य,
भर्गः-सब दुःखों के नाशक तेजः स्वरूप का,
धीमहि-ध्यान करें वैसे तुम लोग भी इसका ध्यान करो।
- स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के वेदभाष्य से

ॐ..चरण

ॐ..चरण स्पर्श आर्य्य ! गायत्री का अर्थ क्या होता है?