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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

कौन मनुष्य धनी ?

ओउम् | स मर्तो अग्ने स्वनीक रेवानमर्त्ये य आजुहोति हव्यम् |
स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति ||
ऋग्वेद : 7.1.23

शब्दार्थ :
हे अग्ने = ज्ञ।निन्
स्वनीक = उत्तम प्रकाशमान महात्मन्
स: = वह
मर्त: = मनुष्य
रेवान् = धनवान् है
य: = जो
अमर्त्ये = अविनाशी में
हव्यम् = हव्य , भोग्य पदार्थों को
आ + जुहोति = पूर्ण रूप से दे डालता है
स: = वह
वसुवनिं = धन के कमनीय
देवता = दिव्य गुणों को
दधाति = धारण करता है
यम् = जिसके पास
पृच्छमान: = पूछता हुआ
सूरि: = विद्वान
अर्थी = अर्थी, याचक होकर
एति = जाता है |

हे ज्ञ।निन् ! उत्तम प्रकाशमान महात्मन् ! वह मनुष्य धनवान् है जो अविनाशी में हव्य , भोग्य पदार्थों को पूर्ण रूप से दे डालता है | वह धन के कमनीय दिव्य गुणों को धारण करता है , जिसके पास पूछता हुआ विद्वान , अर्थी, याचक होकर जाता है |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :
इस मन्त्र में ऊँचे दर्जे के दो उत्तम व्यवहारिक तत्व बताये गये हैं | पूर्वाद्ध में धनी का स्वरूप बताया गया है | धन शब्द का भावार्थ है जिससे प्रीति उत्पन्न हो | प्रीति के दर्जे हैं | संसार की सारी प्रीतियां, सारे सुख, समस्त आनन्द दुख से युक्त हैं | इसीलिए तैत्तिरियोपनिषत् (ब्रह्मानन्दवल्ली 8) में ऋषि ने कहा ‍
युवा स्यात्साधुयुवाध्यापक: आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठ: |
तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् , स: एक मानुष आनन्द: ||
जवान हो , सच्चरित और युवा विचारों का हो, खूब खाता पीता हो, दृढ़ शरीर वाला हो , अत्यन्त बलवान हो, धन धान्य से पूर्ण यह सम्पूर्ण पृथिवी उसकी हो | यह एक मानुष आनन्द है |
मानुष आनन्द की प्रथम कोटि भी किसी को प्राप्त नहीं | जो प्राप्त है, वह निकृष्ट है |और यदि यह कोटि किसी भाँति प्राप्त भी हो जाए , तो इसके स्थिर रहने का कोई प्रमाण नहीं , अत: बुद्धिमान इस विनाशवान धन का सदुपयोग भगवान के मार्ग में करते हैं | इसी भाव को लेकर वेद कहता है
स मर्तो .....रेवान,अमर्त्ये य आ जुहोति हव्यम्
वह मरणधर्मा (मनुष्य) धनी है, जो अमर्त्ये = अविनाशी भगवान के निमित्त सम्पूर्ण भोग सामग्री दे डालता है |
ब्रह्मानन्द लेने के लिए तो यह सब देना होगा | जैसा कि अथर्ववेद में कहा है
मह्यं दत्त्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम् | अथर्व वेद 19.71.1
जीवन , प्राण , धनधान्य, यशकीर्त्ति , प्रतिष्ठा सभी मुझे दे डालो और तुम ब्रह्मलोक = ब्रह्मानन्द प्राप्त करो | सौदा तो सस्ता है | ये सांसारिक पदार्थ न भी दोगे तब भी ये आपके पास न रहेंगें , आपके पास से चले जाएँगे | कितनी अच्छी बात है कि व्यर्थ जाने वालों को दे डालने से अखुट ब्रह्मानन्द मिलता है | कोई मूर्ख व्यापारी ही इस व्यापार से चूकेगा | यम बड़ा अच्छा व्यापारी था | उसने नचिकेता को समझाया था कि भाई ! इन पदार्थों को पास रखने में हानि का अनुभव करके
ततो मया नाचिकेतश्चितोग्निनित्यैर्द्रव्यै: प्राप्तवानस्मि नित्यम् | कठोपनिषद् 2.10
मैने नचिकेत अग्नि जलाई है (और उनमें इन‌ सब विनश्वर पदार्थों का हवन कर डाला है ) इससे मैने अनित्य पदार्थों के द्वारा नित्य तत्व को पाया है |
वैसे भी दान देने से धन नहीं घटता | वेद बहुत सुन्दर शब्दों में कहता है
उतो रयि: पृण‌तो नोपदस्यति | ऋग्वेद 10.117.1
और देने वाले का तो धन नष्ट होता ही नहीं | वह तो परमात्मिक बै‍क में जमा होकर सूद के कारण बढ़ता ही है | धन की वृद्धि कौन धनिक नहीं चाहता ? भोले ! इस रीति को फिर तूँ क्यों नहीं अपनाता ?

उत्तरार्ध‌ में कहा -
स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति |
धन के कमनीय गुणों को वही धारण करता है जिसके पास पूछताछ करता हुआ याचक आता है |
विद्वान = सच्चा विद्वान भूखों मर जायेगा किन्तु मदमाते धनपतियों के पास न जाएगा | वह सरस्वति के केतु को , झण्डे को लक्ष्मी के द्वार पर नहीं गिराएगा | किन्तु उस धनी को सचमुच बड़ा सौभाग्यवान समझना चाहिए , विद्वान जिसके दर पर याचक होकर आये | सचमुछ उसमें कोई कमनीय गुण है | संसार का बहुत सा व्यवहार धन के आश्रय चलता है |धनैष्णा से ऊपर उठे हुए विरक्त संन्यासी को भी अन्न वस्त्र की आवष्यक्त्ता होती है | अन्न वस्त्र स्वयं धन है और धन से साध्य है , अत: धन की प्रत्येक मनुष्य को आवश्य‌क्ता पड़ती है | वेद धन की निन्दा नहीं करता ,धन प्राप्ति की निन्दा भी नहीं करता | वेद तो कहता है
शतहस्त समाहर | अथर्ववेद 3.24.5
सैकड़ों हाथों से कमा
सहस्त्र हस्त सं किर | अथर्ववेद 3.24.5
हजारों हाथों से बिखेर दे , दान कर |
ऐसे भाग्यवान धनी दो प्रकार के होते हैं एक जनश्रुति पौत्रायण जैसे , जो निस्स्वार्थ भाव से अन्नादि के द्वारा साधुसन्तों , ब्रह्मवादियों की सेवा करते हैं , दूसरे अजातशत्रु और जनक जैसे , जिन्हें दूर दूर से जिज्ञ।सु , ब्रह्मतत्व के अभीप्सु पूछते हुए आते हैं | धन का कोई स्पृहणीय , कमनीय गुण है तो ऐसे धनियों में | शेष तो कोषाध्यक्ष हैं , धनस्वामी = धनी नहीं हैं |

(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)