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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

विचार मंच

स्वामी दयानंद सरस्वती ने पतनोंमुख ,मरणासन्न आर्य जाति का उद्धार किया | वैदिक धर्म का पुनः प्रचार किया | जिससे आर्य जाति और वैदिक धर्म उन्नतिशील हो गई | परन्तु आज आर्य समाज एवं महर्षि दयानंद के अनुयायियों में बहुत शिथिलता आ गई है | जिसके फलस्वरूप पाखंड का प्रचार बढ़ता जा रहा है | वैदिक संस्कृति एवं सभ्यता का आर्य जाति में ह्रास होता जा रहा है | वैदिक धर्म के प्रति आस्था घटती जा रही है |
१ . जन साधारण में वैदिक संस्कृति , सभ्यता एवं वैदिक धर्मं के प्रति आस्था उत्पन्न करने के लिए हमें क्या करना चाहिए |
२ . हम व्यक्ति रूप से कौन से कार्य करें ?
३ . सामूहिक रूप से हमें क्या करना चाहिए |
विभा

डा. विभा

डा. विभा आपने अत्यन्त ही महत्वपूर्ण विषय को लिया है | मुझे लगता है कि पीछे के बहुत से वर्षों में हम एक गलतफहमी में जीते रहे हैं, कि हमारे देश के नेता हमें आगे ले जा रहे हैं |वे सभी अत्यन्त अनुभवी हैं, अत्यन्त विद्वान है, उन्हे देश व धर्म की चिंता है, वे अपना पूरा जोर लगा कर हमे जरूर आगे ले जाएँगे | इसी प्रकार हमारा आर्य समाज का नेतृत्व हमे आगे ले जा रहा है यह बात भी सभी के ह्रदय में बैठी रही | परन्तु अचानक ही पता लगा कि दोनो ही स्तर पर जिनके ऊपर हम आस लगाए बैठे थे वह अपनी ही सुध बुध में डूबे हुए हैं , उन्हें आम जनता व आर्य जनता का कोई भी ध्यान ही नहीं रहा है | देश की स्थिति का सब के ऊपर अत्यधिक प्रभाव पढ़ता है | देश की मानसिकता पर देश की सैहत निर्भर करती है |परन्तु किसे फिक्र थी देश की ? अब देश का ही असर सब समाजों पर भी पड़ा, वे भी निश्‍चिन्त हो अपनी देखभाल करने में ही जुटी रहीं | नतीजा जो निकलना था निकला , और वह सब के समक्ष है | अब स्थिति इतनी भयंकर प्रतीत होती है कि इसे सुधारने के लिए भी कोई अत्यधिक महान विभूति ही इसे सुधारने का प्रयत्न कर सकती है | प्रभु की कृपा से कुछ् कुछ् सुधार की आशा जगने लगी है परन्तु स्थिति कितनी भयंकर है इसका ठीक ठीक अनुमान लगाना भी सम्भव नहीं है |

ऐसे मे जहां तक आर्यसमाज का प्रश्न है वहां एक बात जो प्रूर्व समय में दोहराई जाती थी , वह इस समय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नजर आने लगी है , और वह है कि प्रत्येक आर्य समाजी अपने आप में एक आर्य समाज है | इस महत्त्वपूर्ण टिप्पणी का महत्त्व पहले कभी भी इतना नहीं था , जितना कि अब हो गया है | मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि अब आर्यसमाज को वही बचा पाएँगे जिनमें आर्य समाज की ज्योति जलती है, अन्य तो केवल भारमात्र हैं | अतः जो समझते हैं कि उनमें महर्षि की प्रेरणा काम कर रही है, उन्हें चाहिए कि वे अत्यन्त सावधान हो जाएँ चूँकि आब सारा का सारा कार्य उनके ही कन्धों पर आ पड़ा है | अब उन्हें करना होगा अत्यधिक परीश्रम, अपने को उन्नत करने में, अपने को उन्नत करने के पश्‍चात दूसरों को उन्नत करने के लिए आगे बढ़ने का | बहुत विश्‍वास की बात यह है कि ऋषि ने जो बीज इस धरा पर बिखरा दिये थे, वे अत्यन्त सशक्‍त हैं | वह भिन्न भिन्न समयों पर कहीं न कहीं फूटते ही रहे हैं, व फूटते ही रहेंगे | तो इस आधारभूत बात को ध्यान में रखते हुए हमें अपने कार्यक्रम नए सिरे से तैयार करने होंगे | जितने भी आर्य भारत भू पर व अन्यत्र विद्यमान है उन्हें एक नये सिरे से संगठित करना होगा , जिससे आनार्यपना जो हमारे भीतर घुस गया है वह हमें आगे बढ़ने से रोक न पाए | अतः उपरोक्त तीनों मुख्य विषय जो आपने प्रस्तुत किए हैं इसपर प्रत्येक आर्य को गहन विचार करना होगा | इन गहन विचारों को फिर विद्वत जन एक दिशा में प्रवाहमान करने हेतु सही रास्ते निर्धारित करने में प्रयोग ला सकते हैं | जब तक ऐसा सामूहिक प्रयास एकरस होकर फिर से नहीं चल पड़ता , तब तक सब अपने अपने स्तर पर अपनी अपनी समझ से प्रयास करते रहें |

टिपण्णी

टिपण्णी हेतु बहुत बहुत धन्यवाद्
आज कल तो स्थिति यह हो गई है कि आर्य समाज में कोई भी सच्चा आर्य समाजी नहीं रह गए है | केवल नामधारी आर्य समाजी हैं जो सच्चे आर्य समजी को आर्य समज में प्रवेश तक नहीं करने देना चाहते(इससे अधिक लिखना अच्छा नहीं ) | और वे सच्चे आर्य समाजी के प्रचार कार्य में बाधा डालते हैं | ऐसी स्थिति में जिसके दिल में आर्य समाज के प्रति बहुत ही श्रद्धा हो और जो अपने सभी लालसाओं की तिलांजलि दे चुका हों ,वह‌ ही कुछ कर सकता हैं |
महात्मा हंसराज के शब्दों में ...........रोटी खाना घर की और गालियाँ खाना समाज की ...............|
जब हम इस प्रकार के बात को हृदयंगम कर लेंगे तभी हम आर्य समाज के लिए कुछ कर पाएँगे | तभी हमारा सुन्दर स्वप्न ........... कृण्वन्तो विश्वमार्यम ...............सफल हो सकेगी |
परम पिता परमेश्वर हमें शक्ति दे कि हम भी आर्य समाज के लिए कुछ कर पाएं |
विभा

subodhkumar जब हम

subodhkumar
जब हम आर्यों के परम धर्म " वेदों का पढना पढाना और सुनना सुनाना " आरम्भ कर देंगे वेदों का पुनरुत्थान और उस के द्वारा समाज कल्याण सम्भव हो सकेगा.
हर शिक्षित व्यक्ति को वेदानुरागी बनना होगा.मुझे तो इस के अतिरिक्त और कोई एक विकल्प नही सूझता.