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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Idol Worship - Not Sanctioned by Veda वेद में मूर्तिपूजा निषेध‌

न तस्य प्रतिमाऽअस्ति यस्य नाम महद्यशः।
हिरण्यगर्भऽइत्येष मा मा हिंसीत् इत्येषा यस्मान्न जातऽइत्येषः॥
-यजु. ३२.३

अर्थ -
हे मनुष्यो !
यस्य-जिसका,
महत्‌-पूज्य बडा,
यशः-कीर्ति करनेहारा धर्मयुक्त कर्म का आचरण ही,
नाम-नामस्मरण है, जो
हिरण्यगर्भः-सूर्य बिजुली आदि पदार्थों का आधार,
इति-इस प्रकार,
एषः-अन्तर्यामी होने से प्रत्यक्ष जिसकी,
मा-मुझको,
मा हिंसीत्‌-मत ताडना दे वा वह अपने से मुझको विमुख मत करे,
इति-इस प्रकार,
एषा-यह प्रार्थना वा बुद्धि और,
यस्मात्‌-जिस कारण,
न-नहीं,
जातः-उत्पन्न हुआ,
इति-इस प्रकार,
एषः-यह परमात्मा उपासना के योग्य है।
तस्य-उसकी,
प्रतिमा-प्रतिमा, परिमाण, उसके तुल्य अवधि का साधन, प्रतिकृति, मूर्ति वा आकृति,
न अस्ति-नहीं है।

भावार्थः - हे मनुष्यो ! जो कभी देहधारी नहीं होता, जिसका कुछ भी परिमाण, सीमा का कारण नहीं है, जिसकी आज्ञा का पालन ही नामस्मरण है, जो उपासना किया हुआ अपने उपासकों पर अनुग्रह करता है, वेदों के अनेक स्थलों में जिसका महत्त्व कहा गया है, जो नहीं मरता, न विकृत होता, न नष्ट होता, उसी की उपासना निरन्तर करो। जो इससे भिन्न की उपासना करोगे तो इस महान्‌ पाप से युक्त हुए आप लोग दुःख-क्लेशों से नष्ट होओगे।

Meaning: God is all-perfect, unborn and without form. The repetition of His name is to do His will which is productive of the greatest renown, to do the right and speak the truth. He is the truth. He is the birthplace of the luminaries, the sun, etc. All men pray to Him 'Mayest Thou never punish us'. He is not born from any cause and He never assumes a physical body. He has no 'Pratima' i.e. a representative, proxy, picture, measure, weight, size or image, because He is without an example, a figure, measure or form and is all-pervading.

(सन्दर्भ : महर्षि दयानन्द भाष्य‌)

= भावेश मेरजा

Thanks and so nice of you

Thanks and so nice of you Merjaji for quoting a great vedmantra here .
There are three ways of Upasana told….
1. Raising the hands and surrendering to him as Devotion, the bhaktiyoga .
2. Feeling him inside as Aham Brahmasmi as krsn says that he is the Brahman self but not this krsn as it is vasudeo the one in vrishnis , the gyanyoga .
3. Worshipping him always in physical form as a symbol while performing the worldly duties , karmyoga .

ॐ..i disagree with you sri

ॐ..i disagree with you sri kd gupta ji. Whatever you said is against Maharshi Dayanand's view . Please read SATYARTH PRAKASH carefully. I don't think you are a follower of Maharshi Dayanand. What do you mean by ''raising the hands and surrendering to him''. It's look like you are a so-called VAISHNAV.

subodhkumar मूर्त

subodhkumar
मूर्तिपूजा का आरम्भ अपने में एक मह्त्वपूर्ण प्रश्न है. इस का प्रचलन बौद्ध जैन काल से आरम्भ हुवा बताया जाता है. इस काल मे अष्टांग योग की धारणा द्यान समाधि पक्ष का प्रचलन भी अधिक हुवा जो आज भी बौद्ध उपासना मे महत्व्पूर्ण स्थान रखता है. इसी ध्यान मे कुंडलि जागरण का विषय भी आता है.
ईसाइयों मे भी धारणा ध्यान का महत्व देखने मे मिलता है. मित्रों की जनकारी के लिए ईसाइ धर्म मे स्टिग्मेटा और स्टिमेटिस्ट बडे उच्च कोटि के महापुरुष माने जाते हैं.स्टिमेटा मे ध्यान करने वालों की हथेलियों और पैरो से रक्त स्राव हो जाता है. एक डाक्टरी परीक्षा के बाद प्रमाणित होने पर ही स्टिमेटिस्त को सेंट की पदवी दी जाती है.
यदि किसी अनुभवी गुरु के संरक्षण के बिना कुंडलि जागरण का अनुभव हो जाए तो बडा कष्ट्प्रद और शरीर के लिए हानि कारक सिद्ध हो सकता है. इसी लिए ध्यान को स्वशरीर के किसी भौतिक अंग पर नही लगाने का अदेश दिया जाता है. शरीर मे श्वास आदि पर ध्यान करने को कहा जाता है. यह सुलभ नही रहता. इस के अतिरिक्त स्वशरीर से बाहर इष्ट देव की कल्पना कृत आकृति बना कर उस पर ध्यान केंद्रित करने से कुंडलि जागरण के दुष्परिणामों से बचनेके लिए मूर्ति पूजा एक विकल्प के रूप मे बौद्ध जैन मत से आरम्भ हुवा. जो आज एक भयंकर अभिषाप बन कर हमे परमेश्वर से दूर करके हमारे पतन का कारण सिद्ध हो रहा है.

सत्यार्थ

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानन्द ने लिखा है कि मूर्तिपूजा का प्रचलन जैनों ने किया और क्यों किया इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने लिखा है कि - अपनी मूर्खता (अज्ञान = अविद्या) से किया ।
महर्षि पतंजलि जी ने योग दर्शन में शरीर के अंगों में धारणा करने की बात लिखी है । ध्यान भी उसी स्थान पर होता है, जहाँ धारणा की जाती है ।
कुंडलिनी जागरण का उल्लेख न तो पतंजलि जी ने किया और न तो स्वामी दयानन्द ने किया ।
सत्यार्थ प्रकाश के १२ वें समुल्लास के अनुसार बौद्ध लोग नास्तिक हैं, फिर वे लोग अष्टांग योग से किसकी उपासना करेंगे ?
= भावेश मेरजा

subodhkumar बौध

subodhkumar

बौध धर्म मे ध्यान शून्य पर होता है.
प्रिय भावेश जी internet पर जा कर Stigmatists & Stigmata का ईसाइ धर्म के संदर्भ मे अध्ययन करेंगे तो यह विषय केवल तर्क के स्तर से उठ कर ज्ञान वृद्धि मे सहायक भी होगा.

आर्यगण उपर

आर्यगण
उपरोक्त मन्त्रार्थ का अंग्रेजी में अनुवाद कहीं महर्षि जी के भावों को कुछ पूरी तरंह से स्पष्ट नहीं कर पा रहा है, ऐसा प्रतीत होता है | महर्षि लिखते हैं "जिसकी आज्ञा का पालन ही नामस्मरण है, जो उपासना किया हुआ अपने उपासकों पर अनुग्रह करता है" इसका यह अर्थ निकालना कि केवल "to do the right and speak the truth. He is the truth. " शायद अपर्याप्त होगा | क्योंकि इससे उपासना का उल्लेख स्पष्ट नहीं होता है, कारण यह है कि जब हम उपासना हेतु बैठते हैं तब भी हम मन, प्राण को केन्द्रित कर उन्हें प्रभु के गुणों के स्मरण में लगाते हैं , वेदमन्त्रों के द्वारा प्रभु के बताये आदेशों के अनुसार अर्थात् मन्त्र के जप द्वारा अपने मन , प्राण को प्रेरित होने देते हैं, और अन्त में ओउम् के जप द्वारा सारे तन, मन, प्राणादि को उसी से प्रेरित, उसी में निमग्न हो जाने देते हैं, तभी हम प्रभु के प्रेम में स्वयं भी डूबने लगते हैं, हम प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाते हैं | तो इस प्रकार वास्तव में प्रभु की आज्ञा के पालन का प्रारम्भ ही, हम ध्यान व उपासना द्वारा करते हैं अतः यह ही नामस्मरण की विधि है | और यहां महर्षि का आशय इसी नाम स्मरण से है | यही मेरी अल्प बुद्धि के अनुसार ऋषि का यहां तात्पर्य है |
इसके विपरीत किसी अन्य प्रकार से प्रभु का नाम स्मरण करना, किसी मूर्त्य रूप का ध्यान लगाना , किसी व्यक्तित्व पर ध्यान लगाना आदि का परिणाम महर्षि के कथनानुसार "जो इससे भिन्न की उपासना करोगे तो इस महान् पाप से युक्त हुए आप लोग दुःख-क्लेशों से नष्ट होओगे ।" दुःख व क्लेशों का जनक ही होगा | इनसे उपासना का लाभ नहीं मिल पाएगा , क्योंकि इनमें प्रभु की आज्ञा के पालन हेतु कहीं भी मन अथवा बुद्धि अथवा प्राण को प्रेरणा नहीं मिलती है |

ध्यान हेतु महर्षि ने प्राणायाम पूर्वक प्राणायाम मन्त्र के मानसिक जाप का विधान‌ किया है, जो कि अत्यन्त लाभप्रद है | अतः नित्य सन्ध्या में हमें प्राणायाम का अभ्यास अवश्य ही करना चाहिए |

The English meaning of this

The English meaning of this mantra is taken from the English translation of Rigvedadibhashya-Bhumika by Pt Ghasiram.
= Bhavesh Merja

Namaste subodh kumar ji Your

Namaste subodh kumar ji
Your words are admirable .Air is without pratima , but it is hard to live without inhaling air which must have pratima , I feel .