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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Vedic Theism - वैदिक ईश्वरवाद

वेदों में प्रश्नोत्तर वा शंका समाधान के रूप में ईश्वरवाद का प्रतिपादन किया गया है| नमूने के रूप में ये दो मन्त्रों का अभ्यास करें:

यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरमुतेमाहुर्नैषो अस्तीत्येनम्‌।
सो अर्यः पुष्टीर्विज इवा मिनाति श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्रः॥
-ऋ. २.१२.५

अर्थ:
प्रश्न : (यं स्मा पृच्छन्ति) लोग पूछते हैं (कुह सेति घोरम्‌) वह डराने वाला कहां है ? क्यों व्यर्थ ही ईश्वर ईश्वर कहकर हमको डरा रहे हो ? (उतेमाहुः नैषो अस्तीति एनम्‌) उसके विषय में तो यही कहा जा सकता है कि वह कहीं नहीं। होता तो दिखाई न देता? उत्तर : ऐसा मत कहो। (सः विज इव अर्यः पुष्टीः अमिनाति) वह विरोधी शक्तियों को विवेकमान्‌ के समान नष्ट कर देता है। (श्रत्‌ अस्मै धत्त) उस पर श्रद्धा करो। हे (जनास) लोगों ! (स इन्द्रः) वह ईश्वर है।

अयमस्मि जरितः पश्य मेह विश्वा जातान्यभ्यस्मि मह्ना।
ऋतस्य मा प्रदिशो वर्धयन्त्यादर्दिरो भुवना दर्दरीमि॥
-ऋ. ८.१००.४

अर्थ:
ईश्वर कहता है कि ‍हे (जरितः) स्तुति करने वाले, क्यों सन्देह करता है ? (अयमस्मि) मैं तो यह रहा! तेरे ही पास! (पश्य मा इह) मुझे तू अपने निकट ही देख। (विश्वा जातानि अभि अस्मि मह्ना) अपने महत्त्व के बल से मैं सब संसार पर आधिपत्य रखता हूं। (ऋतस्य प्रदिशः) ऋतु अर्थात्‌ सृष्टिनियम के जानने वाले विद्वान्‌ लोग ! (वर्धयन्ति) मुझको बढाते हैं अर्थात्‌ मेरे यश का प्रचार करते हैं। (आदर्दिरः) संहार करने की शक्ति रखने वाला मैं, (भुवना) सब भुवनों अर्थात्‌ जगत का, (दर्दरीमि) संहार कर देता हूं। अर्थात्‌ ईश्वर सृष्टि का कर्ता भी है, पालक भी है और संहार भी वही करता है।

= भावेश मेरजा