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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'उपासना विषयः' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से (3)

(गतांक से आगे)

(अम्भः) हे भगवन् ! आप सबमें व्यापक, शान्तस्वरूप और प्राण का भी प्राण हैं तथा (अमः) ज्ञानस्वरूप और ज्ञान को देनेवाले हैं (महः) सबके पूज्य, सब के बड़े और (सहः) सबके सहन करनेवाले हैं (इति) इस प्रकार का (त्वा) आपको जान के (वयम्) हम लोग सदा उपासना करते हैं ||12||

(अम्भः) दूसरी बार इस शब्द का पाठ केवल आदर के लिये है | (अरुणम्) आप प्रकाशस्वरूप सब दुःखों के नाशकरने वाले तथा (रजतम्) प्रीति के परम हेतु आनन्दस्वरूप (रजः) सब लोकों के ऐश्वर्य्य से युक्‍त (सहः) (इस शब्द का भी पाठ आदरार्थ है) और सहनशक्‍ति वाले हैं | इसलिये हम लोग आपकी उपासना निरन्तर करते हैं ||13||

(उरु.) आप सब बलवाले (पृथुः) अर्थात् आदि अन्त रहित तथा (सुभूः) सब पदार्थों में अच्छी प्रकार से वर्त्तमान और (भुवः) अवकाशस्वरूप से सबके निवासस्थान हैं | इस कारण हम लोग उपासना करके आपके ही आश्रित रहते हैं ||14||

(प्रथो वरो.) हे परमात्मन् ! आप सब जगत् में प्रसिद्ध और उत्तम हैं, (व्यचः) अर्थात् सब प्रकार से इस जगत् का धारण, पालन और वियोग करनेवाले तथा (लोकः) सब विद्वानों के देखने अर्थात् जानने योग्य केवल आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं ||15||

.....

(युञ्जन्ति.) मुक्ति का उत्तम साधन उपासना है, इसीलिये जो विद्वान लोग हैं, वे सब जगत् और सब मनुष्यों के ह्रदयों में व्याप्त ईश्वर को उपासना की रीति से अपने आत्मा के साथ युक्‍त करते हैं | वह ईश्‍वर कैसा है कि (चरन्तं) अर्थात् सबका जानने वाला (अरुषं) हिंसादि दोषरहित कृपा का समुद्र (ब्रघ्नं) सब आनन्दों का बढ़ाने वाला, सब रीति से बड़ा है | इसी से (रोचनाः) अर्थात् उपासकों के आत्मा सब अविद्यादि दोषों के अन्धकार से छूट के (दिवि) आत्माओं को प्रकाशित करनेवाले परमेश्वर में प्रकाशमय होकर (रोचन्ते) प्रकाशित रहते हैं | इति प्रथ‌मोSर्थः |

अब दूसरा अर्थ करते हैं कि - (परितस्थुषः) जो सूर्य्यलोक, अपनी किरणों से सब मूर्तिमान द्रव्यों के प्रकाश और आकर्षण करने में (ब्रघ्नं) सबसे बड़ा और (अरुषं) रक्तगुणयुक्‍त‌ है और जिसके आकर्ष‌ण के साथ सब लोक युक्‍त हो रहे हैं, (रोचानाः) जिसके प्रकाश से सब पदार्थ प्रकाशित हो रहे हैं, विद्वान लोग उसी को सब लोकों के आकर्षणयुक्‍त जानते हैं | इति द्वितीयोSर्थः |

(युञ्जन्ति.) इस मन्त्र का और तीसरा यह भी अर्थ है कि - सब पदार्थों की सिद्धि का मुख्य हेतु जो प्राण है उसको प्राणायाम की रीति से अत्यन्त प्रीति के साथ परमात्मा में युक्‍त करते हैं | इसी कारण वे लोग मोक्ष को प्राप्त होके सदा आनन्द में रहते हैं |

इन तीनों अर्थों में निघण्तु आदि के प्रमाण भाष्य में लिखे हैं सो देख लेना ||16|| इस मन्त्र के इन अर्थों को नहीं जान के भट्ट मोक्षमूलर साहब ने घोड़े का जो अर्थ किया है, सो ठीक नहीं है | यद्यपि सायणाचार्य्य का अर्थ भी यथावत् नहीं है, परन्तु मोक्षमूलर साहब के अर्थ से तो अच्छा ही है , क्योंकि प्रुफेसर मोक्षमूलर साहब ने इस अर्थ में केवल कपोलकल्पना की है |

(क्रमशः)