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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वृक्षों में जीव है या नहीं ?

वृक्षों में जीव है या नहीं - यह विषय आर्य समाज में आरम्भ से ही
विवादास्पद रहा है | महर्षि दयानंद जैसे वेदज्ञ योगी महात्मा के ग्रंथों
से उम्मीद तो यही रखी जा सकती है कि ऐसे विषय में हम लोगों में द्विधा या
संशय उत्पन्न नहीं होने चाहिए | फिर भी यह विवाद आज तक विद्यमान है | स्वामीजी के सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रंथों में लिखी बात कि विद्वानों के
विरोध ही ने लोगों को विरोध जाल में फंसा रखा है - यहां कार्यरत दिखलाई
पड़ती है | स्वामीजी के ग्रंथों से तो यही लगता है कि उनकी दृष्टि में
वृक्षों में जीव की सत्ता है | मगर पंडित गंगा प्रसादजी उपाध्याय तथा
स्वामी दर्शनानन्दजी जैसे हमारे उच्च स्तर के पूज्य विद्वानों ने अपने
तर्क-प्रमाणों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वृक्षों में जीव
मानने का विचार ठीक नहीं है | इसलिए आज पर्यंत यह बात अनिर्णीत-सी रही है | अभी आदरणीय डॉ. रघुवीरजी वेदालंकार ने भी अपना अभिमत प्रकट करते हुए कहा है कि वृक्षों में जीव नहीं है | दूसरी ओर श्री राजवीरजी शास्त्री जैसे विद्वान् लोग विपरीत मत की स्थापना करते हैं | शाकाहार के समर्थन तथा मांसाहार के खंडन में भी यह विषय निर्णायक स्थिति की अपेक्षा रखता है | ईश्वर वृक्ष-वनस्पति रचकर क्या क्या प्रयोजन सिद्ध करता है ? - यह प्रश्न पर हमें अधिकाधिक विचार करने की आवश्यकता है | सोचते रहेंगे तो
कुछ न कुछ सार्थक धारणा बन पाएंगी | यह फोरम पर भी चिन्तक लोग इस विषय पर अपने अपने विचारों से सभी को विचार-सामग्री प्रस्तुत कर सकते हैं |
= भावेश मेरजा

ॐ..MUJHE AB LAG RAHA HAI

ॐ..MUJHE AB LAG RAHA HAI KI VRIKSHON MEIN JEEV NAHI HAI. BHAASHA KE VAAKYON MEIN BHI TO HAM "PED-PAUDHE AUR JEEV-JANTU" aisa kahkar dono ko alag maante hain. Yadi Vedon mein kahin bhi isi prakar ka koi vaakya ho arthaat ek hi mantra mein vrikshon aur jeev-jantu ka alag varnan ho to siddh ho sakta hai ki Vrikshon mein jeev nahi hota. Kya maine theek anumaan lagaya?

Sh.Bhavesh ji,Namaste We

Sh.Bhavesh ji,Namaste
We can logically analyse the view of Maharishi Dayanand ji regarding existance of jeev in plants.Do we agree that plant goes through the process of life as in case of human being and birds/animals etc.Is there different type of Jeev existing in universe! Who does control the jeev
-----Plants comes under prakarti
-----Human being/birds/animals guided by Pramatma
Can we define jeev as activated cell!If it is so then i agree with Maharishi Dayanand ji
Aum
Ramesh

Swami Dayanand has defined

Swami Dayanand has defined Individual Soul (jeev) as under:

"The immortal, eternal Principle which is endowed with attraction and repulsion (ichchhaa, dvesh), feelings of pleasure and pain (sukh, dukh), and consciousness (gyaan), and whose capacity for knowledge is limited (alpagya)- even that I believe to be the soul."(Source: Satyarth Prakash, last chapter)

= Bhavesh

स्वामी

स्वामी विद्यानंदजी सरस्वती ने 'दीप्ति' पुस्तक में 'स्थावर (वृक्षों) में जीव विचार' प्रकरण में लिखा है:

"वेद, उपनिषद्, स्मृति आदि धर्मं शास्त्रों के आधार पर ऋषि दयानंद ने स्वरचित ग्रंथों में अनेकत्र इस मत का प्रतिपादन किया है कि कर्मानुसार भोगादि के लिए जीव को स्थावर शरीर भी मिल सकता है |"

यह पुस्तक 'विजयकुमार गोविन्दराम हासानंद' दिल्ली से प्राप्त किया जा सकता है |

= भावेश मेरजा

महर्षि

महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में स्पष्ट रूप से लिखा है कि वृक्षों में आत्मा है ।
न्याय दर्शन में लिखा है ---
इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख ज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति । १/१/१०
अर्थात --इच्छा ,द्वेष ,प्रयत्न ,सुख ,दुःख,और ज्ञान ये आत्मा के लिंग अर्थात पहचान है ।
जहाँ आत्मा न हो वहां ये लक्षण कदापि नहीं दिखाई दे सकते हैं ।
यह आवश्यक नहीं कि सारे लक्षण एक साथ दिखाई दें । मनुष्य के शरीर में ही कभी एक ,कभी दो या कभी सारे लक्षण दिखाई देते हैं । जानवरों के शरीर में ये सारे लक्षण दिखाई देते तो हैं ,परन्तु मानव शरीर में जितने तीव्र रूप में दिखाई देते हैं उतने तीव्र रूप में नहीं । जैसे मनुष्य शरीर में आत्मा के ज्ञान का प्रकाश अधिकतम होता है । परन्तु पशु शरीर में ज्ञान नाम मात्र को ही होता है ।
इस प्रकार जितनी ही अधम योनी हो ये लक्षण धूमिल होते जाते हैं । परन्तु दिखाई देते हैं अवश्य ।
वृक्ष में इच्छा होती हैं । यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । तभी तो वृक्ष का प्रत्येक पत्ता उस सीमा तक बढ़ना चाहता है जहाँ उसे सूर्य का प्रकाश सीधे मिल सके । वृक्ष में प्रयत्न भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है तभी तो वृक्ष का प्रत्येक पत्ता सूर्य का प्रकाश पाने कि सीमा तक बढ़ने का प्रयत्न करता है ।
यदि वृक्ष में आत्मा नहीं होता तो इच्छा और प्रयत्न भी वृक्ष में नहीं होता ।
वेद , उपनिषद ,स्मृति आदि ग्रंथों में आत्मा होने की बात स्वीकार की गई है ।
हम प्रकृति का निरीक्षण करें --
१.सारे जीवधारी बाहर से भोजन ग्रहण करके उसे अपने अनुकूल बनाकर भोजन को अपने शरीर का हिस्सा बना लेते हैं । वृक्ष भी ऐसा ही करता है । अतः वृक्ष में आत्मा है ।
२. सारे जीवधारी अन्दर से बढ़ते हैं । वृक्ष भी अन्दर से बढ़ता है । अतः वृक्ष भी जीवधारी ही है ।
३. जीवधारियों को यदि कुछ काल तक लगातार भोजन न मिले तो उनका शरीरपात हो जाता है ,वे मर जाते हैं ।
निर्जीव पदार्थों (उदाहरण --मोटर गाड़ी )को यदि भोजन (पेट्रोल )न मिले तो वे कार्य करना बंद कर देते है । महीनों बाद फिर भोजन मिले तो कार्य करने लगते हैं ।
वृक्ष को भी यदि लगातार कुछ काल तक पानी ,हवा ,धूप आदि न मिले तो उसका अंत हो जाता है ।
अतः वृक्ष भी जीवधारी है । उसमें निश्चित रूप से आत्मा है ।
श्री चिंता मणि वर्मा जी कि ओर से ।
विभा वर्मा

Vibha ji, Dhanyabad

Vibha ji, Dhanyabad Sh.Chintamani Verma has explained in brief about existance of Atma in plants and trees etc. So where ever Pran /life exists, Atma also exists.Life process along with other characteristics like hope,intake for life sukh/dukh etc.Fruits or vegetables provided by plants are meant for human being and animals.
Ramesh

Soul - Space - Maya etc:

Soul - Space - Maya etc:

Human Soul is not all-knowing = sarvajya. Only God (Brahman) is all-knowing. Human Soul (in fact any soul = aatmaa = jeevaatmaa) is not an omniscient principle. Hence human soul has to acquire the knowledge of Vedas.

Vedas say that there are 3 fundamental entities: God, Soul & Matter. Among these 3, matter is fundamentally inert - devoid of knowledge or conciousness.

Let us try to understand SPACE:
Space (= void = aakaash) is eternally existing. It is just void, made of nothing. In fact, it is never created. So there is no question of its extinction. It always exists. It remains available even during the time of total dissolution (pralay) of the universe. Because it has no cause. It is uncreated and just for the sake of understanding we can say that the space is 'existing' every where. In strict sense, we even cannot say that it is inert, because it is not an effect of any inert cause. Its only attribute is the capacity to provide space (sthaan) = location to all other existing conscious and unconscious things. The space is imagined or thought or understood only conceptually. It cannot be visualized. All existing substances including God, soul(s) and creation are situated in this space. Without space we cannot imagine any thing existing. Existence of any thing is not possible without space. 'Existence' itself implies that 'existence in space'.

It is also to be noted here that in Vedic philosophy one other type of space (aakaash) is also explained and that is an effect = real created thing. It is created by God using Prakriti = original subtle material cause of the universe. Shabda (word) is its attribute. This space (aakaash) is different from the space explained in the above paragraph.

Phenomenal world is created by God out of matter (Prakriti) and it really exists. God is creator of a REAL universe. We all can experience its presence.

Even scholars who follow Swami Shankaracharya's so-called philosophy of Adwait are not clear on the nature of Maya. If we take Maya as Prakriti = material cause of the universe, it can be easily apprehended.

Most benevolent and merciful God cannot be imagined as a creator of any delusion for us. God guides us; He never misguides us or creates delusions.

= Bhavesh Merja