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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आद्य स्वामी शंकराचार्यजी को प्रमाण मानने वाले अद्वैतवादी सज्जनों के विचार अर्थ

आद्य स्वामी शंकराचार्यजी को प्रमाण मानने वाले अद्वैतवादी सज्जनों के विचार अर्थः

1."नैकस्मिन्न सम्भवात् ।" (वेदांत दर्शन २.२.३३) । इस सूत्र के भाष्य में आद्य स्वामी शंकराचार्यजी महाराज ने लिखा हैः "न ह्येकस्मिन् धर्मिणि युगपत् सदसत्वादि विरुद्धधर्म-समावेशः सम्भवति शीतोष्णवत् ।" अर्थात् एक ही पदार्थ में एक ही समय में दो परस्पर विरोधी गुण उसी प्रकार नहीं रह सकते हैं, जैसे सर्दी - गर्मी । इस प्रकार से एक ही ब्रह्म में एक ही समय में दो विरोधी गुण (साकारत्व तथा निराकारत्व) उसी प्रकार नहीं रह सकते हैं, जैसे सर्दी होगी तो गर्मी नहीं हो सकती अथवा गर्मी होगी तो सर्दी नहीं हो सकती ।

2.“न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्ग सर्वत्र हि ।" (वेदांत दर्शन ३.२.११) । इस सूत्र के भाष्य में शंकराचार्यजी ने लिखा हैः "न तावत् स्वत एवं परस्य ब्रह्मणः उभयलिङ्गत्वमुपपद्यते । न ह्येकं वस्तु स्वत एव रूपादिविशेषोपेतं तद् विपरीतं चेत्यव-धारयितुं शक्यं विरोधात् ।" अर्थात् ब्रह्म के निराकार व साकार इन दोनों रूपों को बताने वालों का खण्डन करते हुए लिखते हैं कि ब्रह्म के दो रूप कदापि नहीं हो सकते । क्योंकि संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसमें दो विरोधी गुण (साकारत्व तथा निराकारत्व) विद्यमान हों । शास्त्रों में सर्वत्र ब्रह्म का व्याख्यान करते हुए उसे शब्द, स्पर्श, रूप आदि से रहित, अव्यय = विकार रहित ही बताया गया है ।

3.“करणवच्चेन भोगादिभ्यः।" (वेदांत दर्शन २.२.४०) । इस सूत्र के भाष्य में शंकराचार्यजी ने लिखा हैः "स शरीरत्वे हि सति संसारिवद् भोगादिप्रसङ्गाद् ईश्वरस्यापि अनीश्वरत्वं प्रसज्येत् ।" अर्थात् यदि ईश्वर का साकार रूप मानकर उसे शरीरवान् माना जायेगा, तो अन्य सांसारिक जीवों की भांति ईश्वर को भी भोगादि करने वाला मानना पडेगा और उसका ईश्वरत्व ही समाप्त हो जाएगा ।

क्या शंकराचार्यजी के उक्त वचनों से तो यही उपपन्न (सिद्ध) नहीं होता है कि -

ब्रह्म साकार भी हो और निराकार भी हो - ऐसा कभी नहीं हो सकता । या तो वह साकार होगा अथवा निराकार होगा । दोनों में से कोई एक होगा, दोनों नहीं हो सकता ।

ईश्वर को साकार मानने से उसका ईश्वरत्व ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि तब वह अन्य सांसारिक जीवों की तरह भोगादि में प्रवृत्त हो जायेगा ।

ब्रह्म अथवा ईश्वर तो निराकार ही है । सृष्टि में जो कुछ साकार है अथवा जो कुछ शरीरधारी है, वह ब्रह्म अथवा ईश्वर नहीं हो सकता, बल्कि ब्रह्म अथवा ईश्वर से भिन्न पदार्थ (प्रकृति से बनी हुई जड वस्तुएं अथवा शरीरधारी जीव) हो सकते हैं ।

जिसका भोग किया जा सकता है, वह भोग्य पदार्थ ईश्वर (ब्रह्म) एवं जीवों से पृथक् है ।

इस प्रकार कुल तीन अनादि पदार्थ सिद्ध होते हैं - ईश्वर (परमात्मा = परमेश्वर= ब्रह्म), जीव और प्रकृति ।

= भावेश मेरजा

Sh.Bhavesh ji,

Sh.Bhavesh ji,
Adi Shankracharya ji also believes in Nirakar roop Of Ishwar(Parmatama) Then why there is worshiping of idols among Hindus instead they should meditate.Views about Parmatma of Vedant is on the basis of Vedas.This is truth and all vedantis and Sanatani should agree with Teen Anadi Padarth.
Very useful informations
Dhanyavad
Ramesh

It appears that Aadi

It appears that Aadi Shankaracharya ji made some compromise with idolatry and worship of so-called incarnations of God. He didn't denounce in unequivocal terms either of them - idolatry and incarnation theory. Even his followers believed that he was an incarnation of Lord Shiva! In 'Neo-Vedant' (as explained & propagated by him) Brahman (Supreme absolute Power) is different than Ishvar (Lord) who creates universe etc. The Neo-Vedantic concept of God, Soul & Matter (Maya?) etc. is fundamentally different than the Vedic teachings of Arya samaj. I quoted a few statements from his bhashya in order to show that whatever may be the reasons, but he had also expressed the Vedic reality at some places in his books.
= Bhavesh Merja

इँश्वर और

इँश्वर और जीव के योिगक क्या हैं यह दोनों िकस मैटेिरयल से बनें हैं वह पदाथ्ँ क्या है ?

God and Soul - both are

God and Soul - both are unborn and eternal.

They are never produced or created.

They are conscious entities having attributes and actions (Guna and karma).

They are not made at some point of time in past by combination of various material elements.

They have been eternally existing and there has been no material cause of both of them.

Reading of Swami Dayananda's "Satyarth Prakash" (chapter no. 3 and 7 to 9) will be highly beneficial.

= Bhavesh Merja

आदि

आदि शंकराचार्य से सम्बन्धित बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी हेतु आदरणीय भवेश जी , आपका बहुत बहुत धन्यवाद |

जहां माननीय विक्रमादित्य जी ने प्रश्न किया है कि " इँश्वर और जीव के योिगक क्या हैं यह दोनों िकस मैटेिरयल से बनें हैं वह पदाथ्ँ क्या है ?" तो मेरे विचार में इस सम्बन्ध में यह जान लेना भी अवश्यक है कि पदार्थ कि परिभाषा तथा इसी प्रकार कुछ अन्य वैज्ञानिक शब्दों की प‌रिभाषा जो आज के समय में प्रयोग हो रही हैं व जो वैदिक शास्त्रों की परिभाषा हैं, उनमें अन्तर है | जहाँ आज की पदार्थ की परिभाषा यह है कि जिसमें भौतिक गुण अर्थात केवल‌ लम्बाई , चोड़ाई वजन आदि हो वह ही पदार्थ है, वहाँ वैदिक परिभाषानुसार पदार्थ उसे कहते हैं जिसमें कोई भी भौतिक अथवा अन्य‌ गुण हो |अत: ईश्वर व आत्मा आदि भी पदार्थ कहलाते हैं, जिनमें कोई भौतिक गुण नहीं हैं | श्री भावेश जी इसमें कुछ अशुद्धि हो तो कृपया शुद्ध कर दीजिएगा |

[इसी प्रकार आज की परिभाषानुसार अणु = atom है तथा परमाणु = molecule है, अर्थात परमाणु (molecule), अणुओं (atoms)से बना है, जबकि वैदिक परिभाषानुसार अणु वह है जो परमाणुओं से बना है | इस प्रकार वैदिक शास्त्रों का अध्ययन करते समय परिभाषा का ध्यान रखना आवश्यक है | एक और उदाहरण है वैदिक शास्त्रों में पाँच भूत हैं जो मूल प्रकृति से बने व अन्ततः जिनसे यह जगत् बना है | वे हैं पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, जबकि आज की वैज्ञानिक परिभाषानुसार इनमें से तीन को पदार्थ की तीन अवस्थाएं कहा जाता है, ठोस, तरल व गैस, तथा बाकी अग्नि को energy अर्थात शक्‍ति कहा जाता है | अर्थात मोटे तौर पर जहां अग्नि को वैदिक परिभाषा के अनुसार पृथ्वी, जल, वायु व आकाश की तरह ही एक भूत माना गया है वहीं पर अग्नि को आज का वैज्ञानिक, पदार्थ का एक रूप (state) न मानकर उसे शक्‍ति कहता है | देखा जाये तो अग्नि, पदार्थ की तरल व गैस अवस्थाओं के बीच की ही एक स्थिति है अतः उसे भी एक अवस्था अथवा तरल , ठोस व गैस की तरह एक state / भूत मानना उचित लगता है न कि वह इनसे अलग कोई अन्य वस्तु है |]