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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्रभु गुणों की छननी

ओं भू, ओं भुव:, ओं स्व: ओं मह:, ओं जन:, ओं तप:, ओं सत्यम् ||
तैत्ति0 प्र0 10.27

कण कण में देख रहे हम
कण कण में ढूंढ रहे हम
सुख के कुछ् सपनों को
पर देख नहीं पाते हम
और जान नहीं पाते हम
आनन्द हिलौरें दे जो
कहीँ छुपा रहता जो
उस अदृष्य शक्ति को
विस्मित कर दे हर पल जो
एक झलक अगर मिल जाए
अन्दर की आँख खुल जाए
पर हो कैसे यह मुमकिन
हम समझ नहीं पाते हैं
लगता हमको नामुमकिन
यह बात असंम्भव सी है
भगवान प्रगट हो जाँए
यह बात नहीं पचती है
फिर भी सबके जीवन में
इक घड़ी तो वह आती है
वह झलक दिखा जाता है
पर लौट के न आता है

गर चाहो सदा बुलाना
ले प्रभु गुणों की छननी
कण कण को छनते जाना
यदि छान सके इक कण भी
दर्शन उसके पा जाओगे
सुख के सपनों को भुलाकर
सुख सागर में खो जाओगे ||