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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

एक मन्त्र, एक सभा

ओउम् | समानो मन्त्रः समिति समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् |

समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ||
ऋग्वेद 10/191/3

शब्दार्थ -

तुम्हारा, मन्त्रः..................तुम्हारा गुप्तविचार, अथवा मन्त्र = पूजा का मन्त्र
समानः...........................एक हो |
समितिः..........................समिति
समानी...........................एक हो |
एषाम्............................ऐसे तुम लोगों का
मनः सह चित्तम्.................मन के साथ चित्त भी
समानम्..........................समान हो | मैं
वः.................................तुमको
समानम्..........................समान=एक
मन्त्रम्............................वेदोपदेश
अभिमन्त्रये.......................देता हूँ और
वः................................तुमको
समानेन..........................एक जैसी
हविषा............................भोग सामग्री
जुहोमि............................देता हूँ

व्याख्या -

विचार, उच्चार और आचार की समानता के कुछ अन्य साधनों का उपदेश करते हैं -

(1) समानो मन्त्रः = पूजा का या गुरुमन्त्र एक-सा होना चाहिए | भिन्न पूजा साधनों से भेद और आग्रह की वृद्दि होती है | भेद और आग्रह कलह को बढ़ाते हैं |

(2) समितिः समानी = विचार करने की, मन्त्रणा की जगह भी एक होनी चाहिए |

(3) समानं मनः चित्तमेषाम् = मन के साथ चित्त भी एक हो | केवल मनों की एकता से कार्य्यसिद्धि नहीं हुआ करती, वरन जिसके आचार, उच्चार, विचार, मन्त्र, समिति, सभी एक से हैं, यदि उनके मन के साथ उनके चित्त का = हृदय का सहयोग नहीं, तो सफलता संदिग्ध रहती है, क्योंकि हृदय में उल्लास और उत्साह न होने से कार्य्य का सम्पादन उचित रीति से नहीं हो पाता |

ये अब क्यों समान हों, भगवान् इसका हेतु देते हैं -

समानं मन्त्रमभि मन्त्रए वः समानेन वो हविषा जुहोमि

तुम सबको मैंने एक मन्त्र से दीक्षा दी है और एक सी भोग सामग्री दी है |

सृष्टि के आरम्भ में भगवान् ने जीवों के कल्याण के लिए वेदज्ञान दिया है | वह सबके लिए समान है | तभी तो वेद को विश्‍व‌जन्या = विश्‍व‌जन की हितकारिणी वाणी कहा है | सूर्य्य, चन्द्र, भूमि, जल, अग्नि, वायु आदि सभी के लिए दिये हैं | जब सबको ज्ञान तथा ज्ञेय एक से दिये हैं, तो आचार-विचार आदि में भेद क्यों हो ?

अथर्ववेद में इसी जैसा मन्त्र (6/64/2) है, उसके पूर्वाद्ध में मनः के स्थान में व्रतम है | 'व्रत' का अर्थ उद्देश्य होता है | मन्त्र और समिति की समानता तभी हो सकती है, जब 'व्रत' ‍= उद्देश्य = ध्येय = लक्ष्य की एकता हो | देखिये एक शब्द के भेद ने अर्थ में कितना चमत्कार कर दिया है | उत्तरार्द्ध इस प्रकार है -

समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभि संविशध्वम् (6/64/2) तुम सबको समान भोग, सामान देता हूँ, अतः तुम एक चेतः = चित्त में घुस जाओ, अथवा एकचित्तता का अनुभव करो | भगवान के इस उपदेश का गम्भीर भाव है | प्रतीयमान विषमता के अन्दर भी समता है | इसको समझकर तुम एक-सा चिन्तन करो और अन्त में एकचित्तता धारण करो |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती

(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)