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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - द्वितीय वल्ली (4)

संसार के भोग की कामना आदि, जिनका इस लोक में जिक्र है, सामयिक और आल्पकालिक हैं परन्तु ब्रह्मप्राप्ति का सुख चिरकालिक है इसलिए नचिकेता ने इस दूसरे के लिए पहले (सांसारिक सुख) को छोड़ दिया |
पूर्व संदर्भ

(अब गतांक से आगे)

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् |
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं
मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ||1||
एतच्छुत्वा सम्परिगृह्यमर्त्यः
प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य |
स मोदते मोदनीय हि लब्ध्वा
विवृत सद्भ‌ नचिकेतसम्मन्ये ||13||

अर्थ -

धीर:.................. विद्वान्
अध्यात्म-............आत्मा सम्बन्धी
योग-..................योग के
अधिगमेन.............अभ्यास से
तम्....................उस
दुर्दर्शम्.................कठिनता से प्राप्त करने योग्य
गूढ़म्..................सूक्ष्म
अनुप्रविष्टम्............अन्तःकरण और आत्मा में व्यापक
गुहाहितम्.............हृद्याकाश में स्थित
गह्वरेष्ठम्...............दुष्प्राप्य
पुराणम्...............नित्य
देवम्..................प्रकाशमय [परमात्मा] को
मत्वा.................जानकर
हर्षशोकौ..............सुख-दुःख दोनों को
जहाति................छोड़ देता है ||12||

मर्त्यः.................मनुष्य
एतत्................. इस
धर्म्यम्................धर्म से सिद्ध होने योग्य आत्मा को
श्रुत्वा..................सुनकर और
सम्परिगृह्य............अच्छी प्रकार ग्रहण और
प्रवृह्य..................बारम्बार अभ्यास करके
एतत्..................इस
अणुम्.................सूक्ष्म[ब्रह्म] को
आप्य.................प्राप्त हो और
सः.....................इस
मोदनीयम्.............आनन्दरूप को
लब्ध्वा................उपलब्ध करके
मोदते.................आनन्दित होता है - ऐसे ब्रह्म को
नचिकेतसम्...........तुझ नचिकेता के प्रति
विवृतम्...............खुला है
सद्‍ म................द्वार [जिसका ऐसे स्थान के सदृश]
मन्ये..................मानता हूँ ||13||

व्याख्या -

अनेक गुणों से भूषित ब्रह्म को जानकर संसार के द्वन्दमय सुख और दुःख दोनों को धीर पुरुष छोड़, और अभ्यास तथा वैराग्य से उस ब्रह्म को प्राप्त कर लिया करता है - यह ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग नचिकेता के लिए खुला हुआ है ऐसा यम समझता है | विषय-भोग सम्बन्धी सांसारिक सुख भी अन्त में दुःख प्राप्ति का हेतु हुआ करता है इसीलिये आत्मज्ञानी दुःख के साथ इस सुख को भी छोड़ दिया करता है |

(क्रमशः)