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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Need is felt for a comprehensive critical book on Brahmakumari

In recent times we find everywhere Brahamakumari preachers - especially the women of that sect. They organize various programs in different places under the various fascinating topics. These people have no interest in Vedic scriptures nor in any of India's ancient religious texts. Taking the name of Raja Yoga by them is just to mislead the people - in fact they don’t read, propagate or follow Maharishi Patanjali’s philosophy of Ashtang Yoga. Their ideology (entire theme) is anti-Vedic and without any basis of scripture. For them the founder of their organization Shri Lekhraj Kripalani ('Dada Lekhraj ") is the supreme. They don’t care for Hindu religion or Hindu culture. Their only aim is just to enlarge their community. Peaces of mind, Yoga, World-peace etc. are the interesting topics under which they attract people - especially the educated Hindu people. The words like Shiv Baba, Murli, Param Dham etc. are frequently used to magnetize the innocent people.

In past a few of Arya Samaj scholars wrote and published small booklets (tracts) criticizing Brahamakumari and reviewed its tenets. But today a need is felt for a new efficient, comprehensive and critical book in which Brahamakumari’s actual history (which is not often known to the people) is brought to light; its imaginary ideology is examined in a logical and analytical way. We should therefore pray and recommend the scholars of Arya Samaj to think in this direction so that we may have a sound and effective book as an authentic guide to counter such modern arbitrary sect.

आजकल सर्वत्र हमें ब्रह्माकुमारी का प्रचार करने वाले मिल ही जाते हैं - विशेष रूप से उस संस्था की महिलाएं । वे विभिन्न स्थानों में अलग-अलग आकर्षक विषयों को लेकर अपने कार्यक्रम आयोजित करते हैं । उन लोगों को वैदिक शास्त्रों में कोई रुचि नहीं है । और न ही किसी भारतीय पुरातन धर्म ग्रन्थों में कोई श्रद्धाभाव है । राजयोग का तो नाम मात्र ही लेते है - वास्तव में महर्षि पतंजलि के योगदर्शन में उन लोगों को कोई रस नहीं है । उनकी विचारधारा प्रायः वेद विरुद्ध है । अपनी संस्था के स्थापक श्री लेखराज कृपलाणि ('दादा लेखराज') को ही सर्वस्व मानते हैं । उक्त संस्था को न हिन्दू धर्म से कोई लगाव है, और न ही हिन्दू संस्कृति से । उसे तो बस, अपना समुदाय बढाना है । आजकल मन की शांति, विश्वबंधुत्व आदि रोचक विषयों एवं अन्य कई योग आदि मनोवैज्ञानिक विषयों के नाम से कार्यक्रम चलाकर लोगों को - विशेषकर शिक्षित हिन्दू लोगों को - अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं । शिवबाबा, मुरली, परमधाम आदि का नाम लेकर हमारे भोले - अविवेकी हिन्दू लोगों को अपने सत्य सनातन वैदिक धर्म से दूर न जाने कहां ले जायेंगे ये लोग !

आर्य समाज के ४-५ विद्वानों ने ब्रह्माकुमारी की समीक्षा में लघु पुस्तिकाएं (ट्रैक्ट) लिखकर प्रकाशित की थीं, मगर आज ये पर्याप्त नहीं हैं, और अप्राप्य भी हैं । इस ब्रह्माकुमारी संप्रदाय का वास्तविक इतिहास (कि जिसे प्रायः जनता जानती ही नहीं है) को प्रकाश में लाकर, उसकी काल्पनिक विचारधारा (जिन्हें बडे ही चातुर्यपूर्ण ढंग से, तर्काभास का सहारा लेकर प्रस्तुत किया जाता है) को सशक्त, तार्किक, सप्रमाण ढंग से प्रकट करे ऐसी एक पुस्तक की आवश्यकता है । आर्य समाज के विद्वानों को हमें इस दिशा में प्रवृत्त होने की प्रार्थना करनी चाहिए । जिससे ब्रह्माकुमारी के खण्डन में हमें एक प्रभावोत्पादक ठोस, प्रामाणिक पुस्तक मिल सके और हम ऐसे मिथ्या मतों का दक्षतापूर्वक खण्डन एवं प्रतिवाद कर सकें ।

= भावेश मेरजा