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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

क्या फसाद की जड़ हैं यह प्रकृति के कण ?

क्या सारे फसाद की जड़ में हैं यह प्रकृति के कण ? यदि सारे फसाद की जड़ यह प्रकृति के कण हैं तो क्या इन पकृति के कणों का बहिष्कार कर दिया जाय ? क्या ऐसा कर पाना सम्भव है ? नहीं | न तो इन‌का बहिष्कार किया जा सकता है, न ही इन्हें नकारा जा सकता है | तो फिर क्या किया जाय ? इन्हें समझा जाय |

आज विभिन्न 2 मत मतान्तर अपने 2 ढंग से सृष्टि की व्याख्या में लगे हैं | तो क्या सबने अपने सिद्धान्तों की खोज की है ? नहीं | किसी ने कोई खोज नहीं की है | की है तो अपने अपने स्वार्थों की खोज और फिर जो ज्ञान उपलब्ध था उसमें उस स्वार्थ को कैसे फिट किया जाय, बस इसकी खोज की है |

अब सबसे पहले समझा जाय कि कौन कौन से स्वार्थ हैं जिनके कारण यह अनर्थ किया गया, किया जा रहा है और किया जाता रहेगा | यह स्वार्थ है लालच, अहंकार और इनकी जड़ में है अज्ञान |

प्रकृति के कणों को कोई माया कह कर पुकारता है | माया भी कोई झूठी माया कह कर इसे नकारने का उपदेश देता है, तो कोई इसे प्रभु की माया बताकर इसी में रंगरलियाँ मनाने की सलाह देता है, तो कुछ ऐसे हैं जो इसी को ही सब कुछ सर्वस्व मानकर मस्त हुए जी रहे हैं, न तो इस माया के इधर या उधर वह कुछ सोचने समझने की आवश्यक्ता समझते हैं |

तो सब माया के मायाजाल में फसे हैं, उसी में उलझे हैं पर कोई यह पता नहीं कर पा रहा कि हो क्या रहा है ? वास्तविक्ता क्या है, क्या है माया, क्या है यह मायाजाल ? देखिये प्रकृति के कण न तो माया है न मायाजाल हैं, वह केवल और केवल उन तीन अनादि वस्तुओं में से एक हैं जो सदा 2 से विद्यमान हैं | यह शरीर , यह मन, इन्द्रियाँ, बुद्धि, अहंकार भी जो हमारे शरीर के अंग हैं इसी के रूप हैं | यह आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी भी इसी के रूप हैं |

तो कैसे प्रकृति के कणों ने हमें बेवकूफ बना दिया, यह विचारने का विषय है | क्या सचमुच हमारे सारे सुखों अथवा दुखों का कारण प्रकृति के कण हैं ?

प्रकृति के कण तो चलते चले जा रहे हैं | जैसे जैसे इन पर शक्ति का प्रयोग होता है वैसे वैसे यह अपनी राह बदलते रहते हैं, अपना रूप बदलते रहते हैं , अपना आकार बदलते रहते हैं | प्रकृति के कण इस अनन्त ब्रह्माण्ड का एक मुख्य अवयव हैं, इस प्रकार हमें उन्हें मानना व स्वीकार करना चाहिए | यह जड़ हैं, चेतनता से परे हैं | यदि इनमें भी चेतनता मान ली जाय तो फिर एक दिन सब कुछ अपने आप ही चलने फिरने, उड़ने, पैदा होने और नष्ट होने लग जाएगा, जैसा 2 कोई प्रकृति का कण चाहेगा | अर्थात सब कुछ अव्यवस्थित होकर नष्ट भ्रष्ट हो जाएगा | बचेगा तो बस फिर धूल मिट्टी और अन्ततः प्रकृति के मूल कण |

अब इस प्रकार यदि हमने इन प्रकृति के कणों को जान लिया, तो यह भी अब हम जान सकते हैं कि ऐसे ही कुछ कणों का एक समुदाय जो एक अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से चल रहा है वह हमें उपलब्ध है अपने तन के रूप में और ऐसे अनन्त समुदाय मिलकर इस सृष्टि में जीवों के रहने के स्थल बन गये हैं, उनकी सम्पती बन गये हैं | यह सम्पत्ती अस्थाय्यी है, यह बदलती रहती है | इस अस्थायी सम्पत्ती को अस्थायी मानकर ही प्रयोग में लाना श्रेयस्कर है, इसे स्थायी मानने की भूल नहीं करनी चाहिए |

अब आत्मा और परमात्मा के संदर्भ में इस पर विचार करते हैं | यदि ऊपर की बात ठीक प्रकार से समझ ली गयी है तो यह मानने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि इन प्रकृति के नन्हे नन्हे समुदायों के साथ जो व्यवहार कर रहा है वह ही हैं चेत्तन आत्मा, और जिसके कारण ही यह प्रकृति कणो के समुदाय भी चेत्तन होकर कार्य करते दिखाई देते हैं | यदि आत्मा इन‌में शिथिल पड़ जाती है तो इनकी चेतनता भी शिथिल पड़ जाती है, और आत्मा जागृत हो जाती है तो इनकी चेतनता भी बढ़ जाती है | तो प्रकृति के इन नन्हे समुदायों को जिन्हें हम जीव कहते हैं, का चलाने वाला है आत्मा और इसमें चलने वाला है प्रकृति के कणो का समुदाय |

अतः प्रकृति के कणों को मैं मानने की भूल हमें नहीं करनी चाहिए | जो जैसा है उसे वैसा ही जानना हमें सुख दे सकता है , विपरीत जानना दुःख का मूल कारण है | अब‌ प्रकृति के कणों में किस प्रकार हम प्यार ढूंढते हैं, यह विचारने का विषय है | प्रकृति के कण प्यार तो कर ही नहीं सकते फिर हम‌ उनसे प्यार की आशा कैसे करते हैं ? प्रकृति के कण चल सकते हैं, इसलिए हम उन्हें चला सकते हैं | प्रकृति के कण रूप र‍ंग आकार ले सकते हैं इसलिए हम उन्हें रूप रंग आकार दे सकते हैं | प्रकृति के कणों का आदान प्रदान हम कर सकते हैं, परन्तु प्रकृति के कणों की अराधना अथवा उनसे प्यार करने से हमें कुछ मिलने वाला नहीं, जब तक कि उनके गुणों के अनुकूल उन से कार्य नहीं लेते | तो प्रकृति को प्रकृति मान कर स्वीकारना चाहिए न अधिक न कम |

अब चलते हैं और कुछ् जानते हैं परमात्मा के बारे में जिसको जाने बिना हमारा ज्ञान, हमारा कार्य, हमारा ध्येय सब अधूरा रह जाएगा | यदि भगवान सृष्‍टि के कण कण में विद्यमान नहीं है , यदि वह निराकार नहीं है, यदि वह सर्वशक्‍तिमान नहीं है, यदि वह ज्ञान का सागर नहीं है, यदि वह आनन्द का स्त्रोत नहीं है तो फिर वह सृष्‍टि की, इन प्रकृति के अनन्त कणों की, इतनी सुन्दर व्यवस्था का इसके उत्तमोतम आनन्द का जनक नहीं हो सकता | अतः उसे भी वैसा ही स्वीकार करें जैसा वह है - सर्वव्यापक, निराकार, आनन्द का स्त्रोत |

अब बच गई आत्माएं, तो क्या बिना आत्माओं के सृष्‍टि चल सकती है ? परमात्मा सृष्‍टि को बना देता है, सृष्‍टि बन कर चलने लगती है परन्तु इसमें फेर बदल इसमें परिवर्तन, इसका प्रयोग कोई कर सकता है तो वह है आत्मा जो चेतन है और जिसे इनकी आवश्यक्ता है | आत्मा एक अल्प चेत्तन शक्ति है और इस प्रकार की आत्माएं भी सृष्‍टि में अनन्त हैं व सर्वत्र विद्यमान हैं | न यह आत्माएं मरती हैं न इन्हें कोई बनाता है | यह सदा सदा से विद्यमान थी, हैं, व रहेंगी वैसे ही जैसे प्रकृति के कण, जैसे परमात्मा | यह सृष्‍टि का तीसरा मुख्य घटक है जो अनादि है |

अब यदि हम अपने आप को आत्मा जानते हुए प्रकृति के मिले हुए कुछ कणों के समूह से अर्थात अपने तन मन से इस प्रकार कार्य लें जैसे वे हैं, इन्हें 'मैं' 'मैं' कहने से बचें व इनकी चाहना से भी बचें तथा इनके स्वतन्त्र प्रवाह को समझते हुए इन्हें अपने साथ बांधनें की मूर्खता न करें तो हम सृष्‍टि का सही सही आनन्द ले सकेंगे | तब यह सृष्‍टि आनन्द के स्त्रोत की प्राप्ति का स्थल बन जाएगी - उस प्रभु की जिसकी आनन्दमयी व्यवस्था से यह जगत आनन्दमय‌ हो रहा है, उसी की प्राप्ति का स्थल | तब यह मानव रूपी, प्रकृति के कणों का समूह, आत्मा व परमात्मा के मिलन का अद्‍भुत केन्द्र, आत्मा को प्रभु के प्रेम से विभोर कर देगा |

माननीय

माननीय श्री आनन्द जी, नमस्ते ।
आपने वैदिक तत्त्व चिन्तन का सुन्दर प्रस्तुतिकरण किया है | धन्यवाद ।
= भावेश मेरजा

आद‌रणीय

आद‌रणीय भावेश जी
नमस्ते
आपका सराहना के लिए अतिशय धन्यवाद |

आनन्द‌