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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

विद्वान भगवान के सख्य के लिए संयम करता है

ओउम् | विभ्राजञ्ज्योतिषा स्व रगच्छो रोचनं दिवः |
देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे ||
ऋग्वेद 8/98/3

शब्दार्थ -

ज्योतिषा.............प्रकाश से
विभ्राजन.............विशेष दमकता हुआ
दिवः.................प्रकाशमय लोकों को
रोचऩ्................चमकाता हुआ तू
स्वः..................आनन्द को
अगच्छः..............नित्य प्राप्त है | हे
इन्द्र ................सम्पूर्ण ऐश्‍वय्र्यों के स्वामिन् ! अज्ञान-निवारक परमेश्‍वर !
देवाः.................निष्काम ज्ञानी
ते....................तेरे
सख्याय.............सख्य के लिए, मैत्री के लिए
येमिरे................संयम करते हैं |

व्याख्या -

सूर्य्य-चन्द्रादि में प्रकाश के साथ अन्धकार भी है किन्तु भगवान् में अन्धकार का लवलेश नहीं | जीव को चाहिए निर्धूम प्रकाश, जीव को चाहिए दुःख से असंपृक्‍त आनन्द; वह मिल सकता है भगवान् से | भगवान् की अराधना में जब उसे अनुभूति की उत्तरोत्तर भूमियों से परिचय होता है, तब वह स्वयं अपने इष्‍टदेव से कहता है कि मुझे ज्ञान हो गया है, क्यों साधक तेरी अर्चना, पूजा करते हैं | हमें चाहिए आनन्द और तू है आनन्दमय, तेरे आनन्द का कारण भी हमें ज्ञात हो गया है, तू सदा ज्योतिः से ज्योतिष्मान् हो रहा है | तू केवल स्वयंप्रकाश ही नहीं है, तू दूसरों को भी प्रकाशित करता है | इसी से तू आनन्दघन है, तेरे इसी आनन्द के कारण विद्वान संयम करते हैं | मन्त्र का संक्षिप्त भाव यह है कि -

1. भगवान आनन्दमय है |
2. उसके आनन्द का कारण ज्योतिर्मयता, सर्वज्ञता के साथ सर्वप्रकाशकता तथा सबको ज्ञानदान है |
3. दूसरों को देने के लिए अपने ऊपर संयम करना होता है | भगवान् सबसे बड़ा दाता है, अतः सबसे बड़ा संयमी है | अतएव
4. उसका सख्य प्राप्त करने के लिए संयम करना अत्यन्त आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य्य भी है | ऋग्वेद 3/51/11 में आदेश है -
सुते नियच्छ तन्वम् = ऐश्‍वर्य प्राप्ति के निमित्त शरीर को संयत कर |
वेद और आर्य्यशास्त्र संयम के उपदेशक हैं | उन्हें पूर्ण निश्‍चय है कि - भोगे रोगभयम् भोग में रोग लगा है | रोग पारलौकिक क्रिया तो क्या, लौकिक क्रिया भी नहीं करने देता | संयमी मनुष्य को जो रस मिलता है, उसका शतांश भी विलासी, भोगपरायण को नहीं मिलता |

आश्रम-व्यवस्था संयम की व्यवस्था है | ब्रह्मचर्य्य-दशा में अस्खलितवीर्य्य होने के लिए मनसा, वाचा, कर्म्मणा भोग से पराङ्गमुख रहना होता है; वानप्रस्थ और संन्यास तो हैं ही कठोर संयम के लिए | रह गया जीवन का एक चोथाई भाग गृहस्थ्, उसमें भोग का विधान होते हुए भी संयम का प्रतिबन्ध है |
बल के जितने भी कार्य्य हैं, उन्हें सम्पादन करने के लिए भी संयम की आवश्यकता होती है | उदाहरण के लिए मल्लविद्या = पहलवानी को लीजिए | क्या कोई असंयमी, दुराचारी, विलासी मनुष्य कभी अच्छा मल्ल = पहलवान बन पाया है ? अतः जिसे लोक में सफलता और ब्रह्मानन्द लेना हो, उसे संयमी बनना चाहिए |

स्वामी वेदानन्दतीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)