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महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' द्वितीय साधनपादः (10/10)किसी आसन पर स्थिरतापूर्वक बैठने के पश्चात मन की चंचलता को रोकने के लिए श्वास-प्रश्वास की गति को विधिपूर्वक, विचार से, यथाशक्ति रोकने स्वरूप जो क्रिया की जाती है, उसका नाम प्राणायाम है | पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1032 (अब गतांक से आगे) बाह्याभ्यान्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ||50|| [बाह्य-आभ्यान्तर-स्तम्भवृत्तिः] बाह्यवृत्ति (= बाह्य विषय), आभ्यान्तर वृत्ति (= आभ्यान्तर विषय), स्तम्भवृत्ति (= स्तम्भ विषय) [देशकालसंख्याभिः] देश, काल तथा संख्या के द्वारा [परिदृष्टः] देखा हुआ, मापा हुआ] (प्राणायाम) [दीर्घसूक्ष्मः] लम्बा तथा हल्का हो जाता है | 1 बाह्यविषय - इसमें प्राणशक्ति को बाहर ही रोका जाता है, 2. आभ्यान्तरविषय - इसमें प्राणशक्ति को अन्दर ही रोका जाता है, 3. स्तम्भवृत्ति - इसमें चाहे प्राण बाहर जा रहा हो अथवा अन्दर आ रहा हो, कहीं पर भी प्राण को जहाँ का तहाँ रोका जाता है | बाह्य, आभ्यान्तर, स्तम्भवृत्ति नामक तीन प्राणायाम देश, काल तथा संख्या के द्वारा मापा हुआ दीर्घ (= लम्बा) तथा सूक्ष्म (= हल्का) हो जाता है | देश से मापा हुआ का तात्पर्य है - नासिका से बाहर और भीतर जितने स्थान तक प्राण का प्रभाव होता है काल से मापने का तात्पर्य है - कितने क्षणों तक रोका गया | संख्या से मापने का तात्पर्य है - कितने श्वास प्रश्वासों तक प्राण को रोका गया | बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ||51|| [बाह्य-आभ्यन्तर-विषयाक्षेपी] बाह्यविषय तथा आभ्यान्तरविषय दोनों प्राणायामों को रोकनेवाला [चतुर्थः] चौथा प्राणायाम होता है | विधि - इस प्राणायाम में प्राणायाम को बाहर निकालकर यथाशक्ति बाहर ही रोकते हैं | जब प्राण अन्दर आने लगता है तो उसे अन्दर नहीं आने देते बल्कि अन्दर बचे हुए प्राण को भी बाहर फैंककर पुनः बाहर ही रोकते हैं | इसी क्रिया को यथासामर्थ्य एक बार-दो बार करते हैं | पुनः प्राण को अन्दर भर कर यथाशक्ति अन्दर ही रोकते हैं | जब प्राण बाहर निकलने लगता है, तो बाहर नहीं निक्क़लने देते बल्कि बाहर से कुछ और प्राण लेकर अन्दर ही रोकते हैं | इसी प्रकार यथासामर्थ्य एक दो बार करते हैं | घबराहट होने पर प्राण को बाहर छोड़ देते हैं | इस प्रकार यह एक प्राणायाम हो जाता है | ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ||52|| [ततः] प्राणायाम के अभ्यास से [क्षीयते] नष्ट होता है [प्रकाश-आवरणम्] ज्ञान को ढकने वाला आवरण (= अज्ञान) धारणासु च योग्यता मनसः ||53|| [धारणासु च] और धारणाओं में (= मन को नासिका, मस्तक, आदि किसी भी स्थान पर स्थिर करने में) [योग्यता] क्षमता बढ़ती है [मनसः] मन की | प्राणायाम के अभ्यास से यह भी फल होता है कि साधक की मन को नासिका, मस्तक आदि स्थानों पर स्थिर करने की योग्यता बढ़ती जाती है | इससे बुद्धि, स्मृति और मन की एकाग्रता में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है | स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपाSनुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहाऱः ||54|| [स्वविषय-असंप्रयोगे] अपने विषयों के साथ सम्बन्ध न रहने पर [चित्तस्वरूपाSनुकार इव] मन के स्वरूप जैसा हो जाना (= रुक जाना) [इन्द्रियाणाम्] इन्द्रियों का [प्रत्याहाऱः] प्रत्याहार कहलाता है | मन के रुक जाने पर नेत्रादि इन्द्रियों का अपने अपने विष्यों के साथ सम्बन्ध नहीं रहता, अर्थात् इन्द्रियाँ शान्त होकर अपना कार्य बन्द कर देती हैं, इस स्थिति का नाम 'प्रत्याहार' है | ततः परमावश्यतेन्द्रियाणाम् ||55|| [ततः] प्रत्याहार की सिद्धि से [परमावश्यता] उत्कृष्ट रूप से अपने में होना [इन्द्रियाणाम् ] इन्द्रियों का | प्रत्याहार की सिद्धि होने से योगाभ्यासी का इन्द्रियों पर सर्वोत्कृष्ट वशीकरण (=अच्छा नियन्त्रण) हो जाता है | वह अपने मन को जहाँ और जिस विषय में लगाना चाहता है, लगा लेता है, तथा जिस विषय से मन को हटाना चाहता है, हटा लेता है | (इति द्वितीयः पादः) [सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित
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sadhuvaad B.S.Sharma
sadhuvaad
B.S.Sharma
बहुत
बहुत उपयोगी साधुवाद
B.S.Sharma